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शनिवार, 11 नवंबर 2017

ये उन दिनों की बात थी ..







आजकल जो दीवानापन युवाओं का मोटरसाईकिल और युवतियों का स्कूटियों के प्रति और बच्चों की ललक भी स्कूटी दौडाने की और दिखाई देती है , ठीक वैसी ही और वैसी ही क्यूँ , बल्कि उससे कहीं ज्यादा (ये भी मैं बताउंगा कि उससे ज्यादा कैसे और क्यूँ ) उन दिनों में हमें और हमारी उम्र के बच्चों में सायकल के प्रति हुआ करती थी | अरे नहीं , उन दिनों बच्चों की सायकल के नाम पर सिर्फ बहुत छोटे बच्चों वाली ट्राय सायकल का ही चलन था सो , घर में पिताजी की सायकल, जिसकी सीट से बस थोड़ा सा ऊपर हमारी मुंडी पहुंचा करती थी , उसके प्रति हमारा दीवानापन था | और फुर्सत के समय जब कभी वो सायकल बिना ताले के मिल जाती थी समझिये कि वो पल , वो समय यादगार बन जाता था |

उन दिनों सायकल भी अन्य सबकी तरह चुनिन्दा ब्रांड में ही उपलब्ध हुआ करता था , तो वो हुआ करता था एवन , एटलस और हरक्यूलस | और सायकल ही क्यूँ उसके बेकार हो चुके टायर को भी नहीं छोड़ा जाता था , वो हमारा सबसे पसंदीदा दोस्त हुआ करता था , हाथ में छडी लेकर या फिर सीधा हाथ से ही , उस टायर को सडकों गलियों में उसकी पीठ पर शाबासी के अंदाज़ में थपकाते हुए दूर दूर तक दौड़ना और ये इक्का दुक्का नहीं बल्कि पूरी टोली निकला करती थी अपने अपने इकलौते टायर को लेकर | और इस नायाब खेल से हमारा परिचय भी लखनऊ के कैंट एरिया (तोपखाना के आसपास ) वाले फ़ौजी कालोनी में ही हुआ था | पिताजी की पोस्टिंग उन दिनों लखनऊ सेन्ट्रल कमांड के रिक्रूटमेंट सेंटर में हुआ करती थी | मौक़ा मिला और हम सायकल को स्टैंड (बड़ा ही कठिन हुआ करता था उसे स्टैंड से उतारना खासकर वो बीच वाले स्टैंड से ) से उतार कर फुर्र ...|

ऊँचाई और वजन के हिसाब से , वो भी अपनी औकात से बाहर था सो सीट के ऊपर दाहिना कंधे को टिका कर , बीच में पैर घुसा कर विशेष आसन में (जिन्हें उन दिनों हम कैंची स्टाईल कहा करते थे ) उसे पैडल मार कर चलाने की भरपूर कोशिश करते थे और जब सायकल पूरी स्पीड से चल देती थी तो बस कयामत आ जाती थी क्यूँकी ब्रेक मार कर रोकने जैसी उत्तम ड्राईविंग कतई नहीं आती थी सो आजकल जैसे हमारी महिला ब्रिगेड दोनों तरफ अपने पैर फैला कर स्कूटी रोकती हैं , उससे भी कहीं अधिक छितरा के अपनी दोनों टाँगे खोल के सड़क पर घिसटा कर सायकल को रोकने की कोशिश होती थी | और इस बीच यदि सामने से कोई आ गया तो फिर उसकी दोनों टांगों के बीच जाकर इस रोमांचक सायकल ट्रेनिंग का अस्थाई अंत हो जाता था | वापसी में छिले हुए घुटने और कुहनियाँ इस बात का पूरा सबूत होती थीं कि कितनी शिद्दत से मेहनत की जा रही है |

थोड़े और बड़े हुए तो सायकल के कैरियर पर गेंहू की बोरी बाँध कर उसे पिसवाने के लिए आटे चक्की तक ले जाने का कार्यक्रम भी किसी स्टंट से कम नहीं होता था ,जहां से पच्चीस पैसे की वो गुड में मूंगफली के दाने चिपके वाली पट्टी खाते हुई घर वापसी होती थी |थोड़े और वीर हुए तो गैस का सिलेंडर भी पुराने सायकल की ट्यूब से बाँध कर रिफिल कराने का फीयर फैक्टर वाला स्टंट भी बखूबी अंजाम दिया गया | मुझे पूरी तरह सायकल चलाने के लिए दसवीं पास करने के बाद ही मिली थी | और उसके बाद ग्राम जीवन में खेतों की मेड पगडंडी कच्ची सड़कों पर चलाते हुए हम उसके चैम्पियन होते गए |


घर से मधुबनी कुल 14 किलोमीटर आना व् जाना , वो भी पूरे कालेज की पढ़ाई के दौरान , ज़िंदगी के सबसे खूबसूरत सुकून भरे सफ़र जैसे रहे | गाँव की स्वच्छ हवा में हम खुद कब उस सायकल पर हवा से बातें करने लगते थे हमें पता नहीं चलता था | मुझे याद है कि एक मित्र के कहने पर हम सिर्फ 35 मिनट में ये दूरी नाप कर मधुबनी के मिथिला टाकीज में फिल्म "लैला मजनू " देखने जा पहुंचे थे | उन दिनों सायकल का टैक्स भी लगता था जो दो रुपये हुआ करता था और एक लोहे का पत्तडनुमा टुकड़ा सायकल के टायरों में फंसा कर टैक्स भुगतान प्रमाण चिन्ह लगा दिया जाता था ...|


सायकल से मेरी मुहब्बत के साक्षी न सिर्फ मेरे परिवारवाले बल्कि गाँव के संगी साथी भी रहे और मैं अब भी शायद ही कभी ग्राम प्रवास के दौरान सायकल से गाँव से मधुबनी आने जाने का लोभ छोड़ पाता हूँ और सबके लाख मना करने के बावजूद कम से कम एक बार तो सायकल से पूरे शहर का चक्कर लगा आता हूँ ....
ये उन दिनों की बात थी .....हाँ ये उन्हीं दिनों की बात थी ..

रविवार, 23 जुलाई 2017

ज़रा बता कितने दिनों से मिट्टी को नहीं छुआ




रे मिटटी के मानुस आखिर ये तुझे क्या हुआ ,
ज़रा बता कितने दिनों से मिट्टी को नहीं छुआ ...

आज शाम अचानक पैर की एक उंगली हल्की से चोटिल हो गयी , पास पड़े गमले में से मेरे डाक्टर साहब को निकाल कर मैंने वहां लगा लिया ,सो बरबस ही मुझे ये किससे याद आ गए | वैसे मेरा बहुत सारा समय मिट्टी के साथ ही गुजरता है , मैं मिट्टी मिट्टी होता रहता हूँ और पूरी तरह मिट्टी ही हो जाना चाहता हूँ ......


यकीन जानिये मैं गंभीर होकर पूछ रहा हूँ और खासकर हमारे जैसे उन तमाम दोस्तों से जो अपनी जड़ो से दूर , खानाबदोश बंजारे हो कर , इस पत्थर , सीमेंट की धरती वाले जड़(बंज़र) में कहीं आकर आ बसे , सच बताइये आपको कितने दिन हुए , कितने महीने या शायद बरस भी , मिट्टी को छुए महसूसे , मिट्टी में खेले कूदे और मिट्टी की सौंधी सुगंध को अपने भीतर समेटे हुए ......


चलिए जितनी देर आप सोचते हैं उतनी देर तक कुछ पुरानी बातें हों जाएँ , जैसा कि मैं अक्सर कहता रहा हूँ कि , बचपन से ही बहुत सारे दूसरे बच्चों की तरह हम भी पूरे दिन घर से बाहर ही उधम मचाते थे और हर वो शरारत और खेल में शामिल पाए जाते थे जो उन दिनों खेले जाते थे और ज़ाहिर था कि खूब चोट भी खाते थे , बचपन में ही एक नहीं दो दो बार बायें कोहनी में हुआ फ्रेक्चर भी , खेल खेलते ही हुआ था |


मगर मैदान में खेलते हुए जितनी भी बार गिरे , चोटी चोट खाई , छिलन हुई ...उसका तुरंत वाला फर्स्टएड ईलाज और बेहद कारगर था ......धरती की मिट्टी | कोइ बैंडएड कोइ पट्टी कोइ मरहम जब तक आता तब तक तो मिट्टी लगा के मिट्टी के बच्चे फिर मिट्टी में लोट रहे थे | आज के बच्चों के तो कपड़ों पर भी मिट्टी लग जाए तो न सिर्फ बच्चा बल्कि उसके अभिभावक भी एकदम से चिंतित हो जाते हैं , जबकि वैज्ञानिक तथ्य ये कहते हैं कि मिट्टी में कम से कम बयालीस से अधिक तत्व पाए जाते हैं जो मिट्टी के बने इस मनुष्य के लिए निश्चित रूप से लाभकारी होते हैं |



यहाँ देखता हूँ तो पाता हूँ कि शहरों में मानो होड़ सी लगी है ज़मीन को छोड़ कर आसमान की ओर लपकने की , हमारा फैलाव ज़मीन से जुड़ कर नहीं , जमीं से ऊपर उठ कर हो रहा है , गगन चुम्बी अपार्टमेंट अब एक आम बात हो गयी है , यहाँ हम ये भयंकर भूल कर रहे हैं कि जिन पश्चिमी देशों से ये ऊंची ऊंची इमारतों में निवास बनाने की परिकल्पना आयातित की गयी है वे इस देश और इस देश की धरती से सर्वथा भिन्न हैं | इन्सान बार बार ये भूल जाता है कि बेशक जितना ऊपर उड़ ले , आखिर उसे आना इसी मिट्टी में ही और उसे क्या उसके पहले के सभी कुछ को सदियों और युगों या शायद उससे भी पहले से भी यही और सिर्फ यही होता आया है |




रविवार, 16 जुलाई 2017

पुरुष तन के भीतर स्त्री मन ....




कल हमारी बहुत सी मित्र दोस्त सहेलियों ने बड़ी ही मार्के की बात कही , वैसे ऐसा तो वे अक्सर करती हैं , कि सालों साल और लगभग पूरी उम्र हमारी माँ , बहिन और पत्नी की भांति वे सब , घरेलू काम , जिसमें सबसे प्रमुख घर के सभी सदस्यों के पौष्टिक और सुस्वाद भोजन तैयार कर सबको खिलाना , सबसे अहम् , को चुपचाप , बिना किसी पारिश्रमिक , मेहनताने और कई बार तो प्रशंसा भी नहीं , के बिना ही , निरंतर करती जाती हैं | उनका कहना कि , पुरुषों को ये काम करना आना तो दूर इन कामों के किये और करने वाली की कद्र भी नहीं होती , सच है , अक्सर ऐसा देखा भी जता है | ये उनकी नैसर्गिक ड्यूटी मान कर अनदेखा किया जाता है | अपना हाल थोड़ा जुदा है |

पढाई लिखाई के कारण , शायद इंटर कालेज के दिनों में ही माँ बाबूजी और घर से दूर रहने के दौरान , विद्यार्थी जीवन में ही खुद के लिए लगभग हर वो काम , जो गृहणियों के जिम्मे होता है , करने की पहले मजबूरी फिर आदत सी हो गयी | शुरुआत , दाल चावल ,खिचड़ी जैसे आसान विकल्पों से हुई और जाने कितने ही बरस , वही उबला उबली चलती रही |

आज से पूरे बाईस बरस पहले जब दिल्ली पहुंचे तो मामला और आगे बढ़ा ,मगर खेल असली तब शुरू हुआ जब रोटी बनाने की बारी आई | हम सब नए रंगरूटों को हमारे सीनियरों ने पूरे एक सप्ताह तक तो एकदम नई दुल्हन की तरह रखा फिर एक दिन अचानक ही बिना बताये सब गायब हो लिए और सुबह से दोपहर होते होते ,पेट में चूहे दौड़ने लगे | किचन में पूरी सफाई से ,पहले ही हमारी खिचडी का सब रसद गायब , सिर्फ आटा | वहां से शुरू हुई हमारी रोटियाँ बनाने की पूरी ट्रेनिंग | लस्सी , लपसी से होते हुए जल्दी ही हम लोई तक पहुँच गए | फिर तो हम रोटियाँ भी ऐसी बनाने लगे कि सबका सरकमफ्रेंस भी भी नाप के देखा जाता तो एक दम सेम टू सेम :) :) :) :)

इसके बाद तो हममें से सब के सब इतने दक्ष हो चुके थे कि , परीक्षाओं के दिनों में गाँव से आने वाले अपने तमाम दोस्तों के लिए हम खेल खेल में सब कुछ बना लेते थे | मुझे याद है कि , दो घंटे तक बिना रुके मैं सत्तर सत्तर रोटियाँ बना लेता था | आज जब दो संतानों का पिता हूँ तो ,किसी भी कुशल गृहणी को न सिर्फ चुनौती बल्कि हर तरह के भोजन , निरामिष भी ,दक्षिण भारतीय भी और गुलाबजामुन , मालपुए जैसे पकवान भी पूरी दक्षता से बना लेता हूँ |

बिटिया बुलबुल की चोटी गूंथना और उसे तैयार करना जितना मुझे पसंद है ,उससे अधिक बिटिया को पापा से तैयार होना | कढ़ाई , सिलाई , इस्त्री ...छोडिये ..


सौ बात की एक बात ..माँ जो कहती थी ...भोला तेरा मन भीतर से स्त्री है , और मुझे लगता है पुरुष तन के भीतर स्त्री मन होना ही सर्वोत्तम है ....बिलकुल अर्धनारीश्वर हो जाने जैसा है .........

रविवार, 25 दिसंबर 2016

रे लट्ठ गाड़ दूं .....दंगल , दंगल




दंगल - अखाड़े में ,कुश्ती है , और है बेटियाँ ,बेटियों की हिम्मत ,बेटियों की लड़ाई , बेटियों की जीत , बाप की जिद्द ,बाप का संघर्ष ,बाप की जीत भी , देश , समाज , खेल ,खेल की राजनीति ...बस कुछ है इस अखाड़े में ..आमिर खान के साथ जो बात जुडी हुई है और वो यकीनन हठात ही नहीं जुडी है ..,..वो है उनके Mr. Perfectionist का टैग ...इसमें कोइ संदेह नहीं कि जिनकी लड़ाई खुद से होती है और लगातार होती है ..वो फिर लगातार जीतते भी हैं ..आमिर ....जो जीता वही सिकंदर से बहुत पहले ही सिकंदर हो चुके थे ..अब तो वे मस्त कलंदर हैं ..करिश्मा करते हैं जादू बिखरते हैं ...

कुश्ती जैसे देसी खेल में देश का नाम और आन बान बढाने वाले एक बाप को तिरंगे को विश्व पटल पर सबसे ऊँचे लहराते देखने और जन गण मन को स्टेडियम में गूंजते देखने वाले एक शेर बाप की दहाड़ है दंगल | जब बेटियाँ ..मोहल्ले के दो लौंडो को मार के भूत बना देती हैं तब कहीं जाकर चार बेटियों की लाइन में बेटे की चाह में बैठे पहलवान बाप को उसमें ..छोरे बल्कि ..म्हारी छोरियां छोरों से कम हैं के ..दिखती हैं ...उस समय मेरे जैसे हर बाप का कलेजा और चौड़ा हो जाता है ..होना भी चाहिए जब ..बेटियाँ ऐसी हों तो चिंता तो छोरों के बाप को होनी चाहिए ..क्योंकि उलझे तो ..हवा टाईट ..

फिर शुरू होती है एक बाप के विश्ववास , प्रशिक्षण , जिद्द और जुनून के नायकत्व की लड़ाई ....हाँ इस बीच अखाड़े की कुश्ती भी चलती है ....मगर बाप लड़ रहा होता है.. अपने देसी लगन और पैतरों से ..बेटी के भटकाव से उसे वापस खींच लाने के लिए , इस देश की सड़ी गली खेल राजनीति से ...जो आखिर तक उस बाप को ..अपनी वो सीधी कोशिश करने से रोकती है ..जिसके लिए उस बाप का , उसकी बेटी का , उनके जूनून का जन्म हुआ ....खूब सारी कुश्ती के बीच बेहतरीन परिवार , प्यार ,बेशुमार कलाकार .......क्या कहूं ...कुल मिला के .......हारना नहीं है गित्ता...........अभिनय ,गीत , संगीत ,फोटोग्राफी ,संवाद ..सब कुछ करिश्माई है .....सालों में बन पड़ी एक बेहद कमाल की पिक्चर

दंगल दंगल ...दंगल दंगल ...माँ के पेट से मरघट तक है तेरी कहानी

बुधवार, 12 अक्तूबर 2016

डरे डरे V/s हरे भरे RAवण


रावण-दहन
समय :रात्री आठ बजे
स्थान : रामनगर चौक , कृष्णा नगर , दिल्ली
पोस्ट : रिपोर्ट/टिप्पणी /लेख /फोटो
11 .10.2016


इसे अब इत्तेफाक माना जाए या कलियुग की परिणति कि हर साल लोगों द्वारा जलाए जाने वाले रावणों(पुतलों) की लगातार  बढ़ती संख्या और सेना होने के बावजूद ,अब आजकल का रावण बेहद डरा डरा और दुबका लुटा पिटा सा बिल्कुल भीड़ के बीच फंसा, बस ऐसी इल्तजा सा करता हुआ , कि भाई लोगों हर साल तो मुझे फूंकते हो , कर्म खुद मुझ से भी गए बीते करते हो , हैवानियत में ऐसे कि बीच सड़क लडकी को चाकुओं से गोदने में ज़रा नहीं हिचकते , और कमबख्तों , पूरी फ़ौज बना के मेरे अन्दर , बम पटाखे घुसेड घुसेड के पूरा जलसेनुमा आनंद मना मना कर फूंकते हो , हमसे नहीं पूछते अबकी छुट्टी कर लें , जाओ नहीं जलते अबकि , या फिर कि फोम फायर जैसा कुछ delicate और updated वर्जन की मांग को लेकर अबकि हम सारे रावण धरना हड़ताल कर देने का मन बना रहे हैं इसलिए धरने की अमर सफलता के लिए अबकी बार थोड़ी देर एक्सटेंड किया जाए |

मगर अफ़सोस जिस तरह रावण के पोपले बदन में बम पटाखे घुसेड घुसेड देने ( वो भी खुले आम बाईपास से लेकर हाईपास तक और चौक चौराहे तक पर धूप में पेट के बल लिटा के मोहल्ले की पूरी वानर सेना जाने कहाँ कहाँ सवार हो कर ) के बावजूद वो बिचारे चूं चपड़ करने की बजाय , अब फुंक कर जल मरने को ही इंज्वाय करने लगे हैं , नहीं नहीं ऐसा नहीं कि मन से वे ऐसा ही चाहते हैं , असल में इतने सालों से एक ही निश्चित समय पर एक ही Pattern से जल फुंक जाने की continuity की वजह से सारे रावण कुकर्म करने के साथ ही जल फुंक जाने को भी addict से हो गए हैं , अब रावण हैं तो हैं ......कोई कर भी क्या सकता है , खैर.......


मैं अपने आसपास कुछ ऐसे ही पुतलों से मिला , देखिये पहले उन्हें आप | साथ की गली में  ,दोपहर  के  भोजन के तुरंत  बाद  अलसाए  हुए  रावण  को  जगाते  हुए ,हमारे कुछ पड़ोस जन

चहलकदमी करने के दौरान मिले पहले रावण जी एकदम हाईजैक अवस्था में दिखे 

अगले अम्बानी जी की बिजली कंपनी के तारों के जाल बीच अपनी मूंछों समेत फंसे मिले

वही ऊपर वाले थोड़े अलग एंगल से देखें आप  .....धुंए से घबराए हुए 















इसके आगे की कहानी थोड़ी खूबसूरत है , देखता हूँ कि पिछले वर्ष की तरह इस साल भी पांच छ बच्चों ने जैसे तैसे स्टेज तैयार कर खुद राम रावण लक्षमण हनुमान मेघनाद आदि का रूप धर एक छोटा सा स्टेज तैयार करके कुछ स्वांग सा कर रहे थे | शाम का वक्त , दशहरे का दिन , रावण दहन का समय , इससे मुफीद और क्या हो सकता है , विश्व की सबसे अधिक सघन आबादी वाले हिस्से की एक छोटी सी कालोनी के एक मोड पर लोगों को कौतूहलवश रोक देने के लिए , लोग रुकते चले जाते हैं , बच्चों में जोश बढ़ता जाता है......माईक पर जय श्री राम और जय हनुमान का जयकारा भी लगता है ......



                                    



कभी लक्ष्मण मेघनाद युद्ध , कभी रावण हनुमान संवाद , कभी कोई और दृश्य , बच्चे कच्ची पक्की तरह से उसे निभाए चले जाते हैं , सामने खड़े सब लोग और अपनी अपनी Balconies में खड़े लोग , अपने बच्चों को , अपने आस पास के बच्चों को देख खुश को आनंदित होते हैं , शाम और गहराती है और रोशनी के साथ आवाज़ भीड़ के एहसास को दूना करने लगती है  |


नहीं नहीं सिर्फ , ये नहीं कि राम लीला के कुछ अंशों का निरूपण करने का प्रयास करते हैं ये बच्चे , बल्कि अपना एक रावण भी है , ठीक इस स्टेज की बाईं ओर .....................किसी ओर ही अंदाज़ में , पहले इनसे मिलिए ..जिन्हें इन बच्चों की सेना ने आज ठिकाने लगाना है | शाहरुख के पोज़ होने के बावजूद इतने सारे लोगों के बीच यकायक ही फूंके जाने का खौफ साफ़ दिख रहा था इनके मुखड़े पे ....



फायनल सलामी देती श्री राम और लक्ष्मण की जोड़ी और पूरी बाल सेना भी

यूं तो मैं अकड़ ही जाउंगा , रावण यही सोचते हुए ......

रावण को फूंकने से पहले दिखाए जाने वाले पटाखे के डेमो ताकि उसे बिलकुल भी अँधेरे में न रखा जाए कि उसके साथ कहाँ और कितना धमका होना है  

असला सुलग रहा है , रावण का सोचिये कि उसके  सामने  ये  सब  चल  रहा  है 


बेतहाशा आतिशबाजी ,बेतहाशा शोर , और बेतहाशा रौशनी

और ये आखिरकार रावण(पुतले ) पे हुआ सर्जिकल स्ट्राईक ..उनके ठीक नीचे मशाल धर दी जाती है  ,

मित्र प्रदीप गुप्ता  जी  , स्ट्राईक  को  अचूक  बनाते  हुए 

बस इसके आगे ऑडियो विजुएल सब साउंड एंड लाईट शो विद  Thunderbolt धमाका 

धूं धां फूं फां .......



सियापति राम चन्द्र की जय |









इस प्रकार जितने भी डरे  डरे  रावण  दिखे  वो  सब  हर हर गंगे हो लिए  ,मगर घर पहुंचे ही थे कि टीवी खोलते ही , ...

विजय माल्या , किरपा वाले बाबा , टार्च वाले बाबा , तरह तरह के हरे भरे रावण , भरे पूरे , अपने अपने कुकर्मों के सबूतों के साथ मुंह बाए अलग अलग दिखाई देने लगे |

मैं तबसे सोच रहा हूँ कि आखिर उस समय कुछ धमाकों के साथ चीथड़ों में हम जिन्हें उड़ा आते हैं उनसे कई गुना अधिक गन्दा और कसैला शोर तो इन आज के हरे भरे रावणों के कुकर्मों से आता जाता है | एक दिन के कुछ घंटे में खड़े और गड़े इन तमाम डरे डरे रावणों को हमेशा आज के हरे भरे रावण चित पट फूं कर देंगे .....

शुक्रवार, 23 सितंबर 2016

Nirbhaya to Karuna - Murder, Mob and Mockery


pic (courtesy indian express)

The moment she wast thought to be murdered for the first time in the dirty mind, or say weak so much to be treated as human being, 
from that only moment Karuna died, or deteriorated to be get stabbed brutally .

And , Just a second , why for this moment , and why not the moment when judiciary, system, executors, society , media , laws , No One ...and Nothing ...nothing made happened, that the culprit of the most heinous violence and brutal most crime ,which boiled up the mass and state ( although now it can be said that as it was shown so  to us )were not get hanged to death , till date . And the worst one is that one of those bad guys , the so called and declared as juvenile  , must be practising his life as a good citizen . All of us know that , Yupp ! Off course we should believe in good things. 


As we believed then , when we candled , our feeling our outburst , our anger , which compelled the legal fraternity and the governing agencies , law makers to do something concrete prohibition of that crime . But is it going like this or so ??

Arushi , Priyadarshini, Nirbhaya, Karuna ..who knows who or who is not or who else is left , in the home, office, road , cab, cinema, when and where not ? The issue is not that the government , laws , police are not doing or pretending to be done but the question remains always , is the same , that Why does not it making any difference .

While writing an article for a Hindi Journal my studies , I was shocked to be found that one of those articles was based on the latest survey of Female Commandos of American unit that 24% of the female commandos nodded positively to be treated other than a brilliant solider of the United States. I was quite surprised as the commando brigade of the Worlds most powerful defence state are also facing the same dilemma more or less  , the rest of the world .

But , Why , Why the girls let them die so easily , without resisting, without revolting, and most importantly without even complaining many times . This is the the worst social imbalance developed which now wrapped the law , justice , government , no body going to care for no body 


In these condition why not , it be done compulsory for each and every citizen to be trained, polished and crafted in the military training and discipline . Specially NCC, SCOUTS, and NSS like agencies and bodies should be requested to get revived their set ups as soon as possible for which I already have written a letter to PMO Office . 

NIrbhaya and Karuna , Priyadarshini or any girl understand firmly that they have no right to leave the battle without murdering , without deserting and without punishing their culprits. .....then Why , Why .....Why is is going on and on and on .......let us think ..




Next .....Murder ,Mob and Mockery 

शनिवार, 17 सितंबर 2016

रस्साकशी की सरकार




... डर था वही हुआ जैसे ही लोगों ने चिल्लाना शुरु किया और उनकी चिल्लाहट से प्रेरित होकर मीडिया ने उससे ज्यादा आवाज में चीत्कार राग में रिरियाना शुरू किया कि राजधानी दिल्ली के वह तथाकथित कर्ता धर्ता ऐसे विकट समय में जाने प्रदेश से बाहर क्या कर रहे हैं चीख पुकार मचाई गए एलजी साहब सीएम् साहब मंत्री जी अधिकारी जी हर कोइ , किसी ने किसी वजह से राज्य से बाहर है |

भाई बहुत अच्छे है ,यह समझना आम आदमी के बूते के बाहर की बात है कि ऐसे समय में जबकि एक तरफ तो देशभर में स्वच्छता अभियान का ढिंढोरा पीटा जा रहा है वहीं दूसरी तरफ राज्य व केंद्र सरकार के आपसी रिश्तों में कड़वाहट का खामियाजा हम लोगों को अपनी जान देकर भुगतना पड़ रहा है , तो फिर ऐसे में बाहर जाकर अवलोकन विलोकन प्रशिक्षण का कार्यक्रम आगे के लिए क्यों नहीं टाला जा सकता था और वहीं दूसरी तरफ खुद छुट्टियां बिता कर लौटे गवर्नर साहब मानो आते ही रातों रात सुर्खियाँ बटोरने के लिए रात को फैक्स कर बैठे मानो दिल्ली पे हरियाणा ने चढ़ाई कर दी हो ...अच्छा है , देश में सत्तर सालों से राजीनति सेवा से दूकान और फिर दूकान से धंधा बन कर रह गयी है उसकी वजह यही सब है |

  यह तो होना ही था गवर्नर साहब को जबरन दिल्ली बुलाया गया तो ,साहब ने आते ही फोन फैक्स चिट्ठी मनीष सिसोदिया जो कि इन दिनों शिक्षा में सुधार को लेकर के अपने संजीदा प्रयासों को और अधिक समझने व सीखने के लिए फिलहाल विदेश यात्रा पर हैं उन्हें फैक्स भेजकर तुरंत  दिल्ली में उपस्थित होने के लिए कुछ इस तरह के अंदाज में नोटिस भेजा जैसे क्लास का क्लास टीचर मॉनिटर को क्लास से बाहर गया जानकार  भेजता है ,क्योंकि यह दौर फेसबुक ट्विटर प्लस आदि का है इसलिए वहां की पुकार ज्यादा मच जाती है स्वाभाविक भी है ||


अफसोस होता है उस रस्साकशी को देख कर और ऐसा नहीं है कि इसके लिए आप सिर्फ किसी एक निकाय किसी एक संस्था किसी एक राजनीतिक दल या किसी एक व्यक्ति को जिम्मेदार ठहरा सकते हैं हां यह विडंबना है की एक तरफ पिछले 2 वर्षों से देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश में स्वच्छता अभियान को एक मिशन के रूप में देखने मानने व समझने का यत्न  किया और बहुत सारे प्रयास किए  जाते रहे हैं लेकिन उन सब का क्या फायदा यदि राजधानी दिल्ली जैसे महानगरों में भी मलेरिया चिकनगुनिया जैसी बीमारियां महामारी का रुप लेकर प्रशासन व् आम लोगों को पूरी तरह से पस्त कर देती है ||



 शीत ऋतु के प्रारंभ तक यहां यह कहा जाए कि ठंड शुरू होने तक इस तरह कि बरसाती बीमारियों का प्रकोप और अधिक रहने की संभावना सिर्फ इस वर्ष बल्कि पिछले कई वर्षों से लगातार बहती चली आई है सरकार इन मौसम से पहले बड़े-बड़े दावे कर ले अपनी तैयारियों का खुलासा करें मगर जमीनी हकीकत तो यही है कि जब जब ऐसी कोई स्थिति विकराल रूप होकर के आपदा का रूप बन जाती है सरकार के पास संसाधन व्यक्ति वह योजनाओं का इस कदर अभाव रहता है कि वह या तो एक दूसरे पर दोषारोपण का कार्य शुरु कर देते हैं सारी स्थिति जाने के बाद जांच वह मुआवजा देकर अपने कार्य की इति श्री कर देते हैं देखना यह है कि राज्य सरकार व केंद्र सरकार या कहा जाए कि नरेंद्र मोदी और अरविंद केजरीवाल के बीच की रस्साकशी पर दिल्ली की आम जनता कब तक कर्तव्य करती रहेगी....


साथ चलने वाले

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