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शुक्रवार, 23 सितंबर 2016

Nirbhaya to Karuna - Murder, Mob and Mockery


pic (courtesy indian express)

The moment she wast thought to be murdered for the first time in the dirty mind, or say weak so much to be treated as human being, 
from that only moment Karuna died, or deteriorated to be get stabbed brutally .

And , Just a second , why for this moment , and why not the moment when judiciary, system, executors, society , media , laws , No One ...and Nothing ...nothing made happened, that the culprit of the most heinous violence and brutal most crime ,which boiled up the mass and state ( although now it can be said that as it was shown so  to us )were not get hanged to death , till date . And the worst one is that one of those bad guys , the so called and declared as juvenile  , must be practising his life as a good citizen . All of us know that , Yupp ! Off course we should believe in good things. 


As we believed then , when we candled , our feeling our outburst , our anger , which compelled the legal fraternity and the governing agencies , law makers to do something concrete prohibition of that crime . But is it going like this or so ??

Arushi , Priyadarshini, Nirbhaya, Karuna ..who knows who or who is not or who else is left , in the home, office, road , cab, cinema, when and where not ? The issue is not that the government , laws , police are not doing or pretending to be done but the question remains always , is the same , that Why does not it making any difference .

While writing an article for a Hindi Journal my studies , I was shocked to be found that one of those articles was based on the latest survey of Female Commandos of American unit that 24% of the female commandos nodded positively to be treated other than a brilliant solider of the United States. I was quite surprised as the commando brigade of the Worlds most powerful defence state are also facing the same dilemma more or less  , the rest of the world .

But , Why , Why the girls let them die so easily , without resisting, without revolting, and most importantly without even complaining many times . This is the the worst social imbalance developed which now wrapped the law , justice , government , no body going to care for no body 


In these condition why not , it be done compulsory for each and every citizen to be trained, polished and crafted in the military training and discipline . Specially NCC, SCOUTS, and NSS like agencies and bodies should be requested to get revived their set ups as soon as possible for which I already have written a letter to PMO Office . 

NIrbhaya and Karuna , Priyadarshini or any girl understand firmly that they have no right to leave the battle without murdering , without deserting and without punishing their culprits. .....then Why , Why .....Why is is going on and on and on .......let us think ..




Next .....Murder ,Mob and Mockery 

शनिवार, 17 सितंबर 2016

रस्साकशी की सरकार




... डर था वही हुआ जैसे ही लोगों ने चिल्लाना शुरु किया और उनकी चिल्लाहट से प्रेरित होकर मीडिया ने उससे ज्यादा आवाज में चीत्कार राग में रिरियाना शुरू किया कि राजधानी दिल्ली के वह तथाकथित कर्ता धर्ता ऐसे विकट समय में जाने प्रदेश से बाहर क्या कर रहे हैं चीख पुकार मचाई गए एलजी साहब सीएम् साहब मंत्री जी अधिकारी जी हर कोइ , किसी ने किसी वजह से राज्य से बाहर है |

भाई बहुत अच्छे है ,यह समझना आम आदमी के बूते के बाहर की बात है कि ऐसे समय में जबकि एक तरफ तो देशभर में स्वच्छता अभियान का ढिंढोरा पीटा जा रहा है वहीं दूसरी तरफ राज्य व केंद्र सरकार के आपसी रिश्तों में कड़वाहट का खामियाजा हम लोगों को अपनी जान देकर भुगतना पड़ रहा है , तो फिर ऐसे में बाहर जाकर अवलोकन विलोकन प्रशिक्षण का कार्यक्रम आगे के लिए क्यों नहीं टाला जा सकता था और वहीं दूसरी तरफ खुद छुट्टियां बिता कर लौटे गवर्नर साहब मानो आते ही रातों रात सुर्खियाँ बटोरने के लिए रात को फैक्स कर बैठे मानो दिल्ली पे हरियाणा ने चढ़ाई कर दी हो ...अच्छा है , देश में सत्तर सालों से राजीनति सेवा से दूकान और फिर दूकान से धंधा बन कर रह गयी है उसकी वजह यही सब है |

  यह तो होना ही था गवर्नर साहब को जबरन दिल्ली बुलाया गया तो ,साहब ने आते ही फोन फैक्स चिट्ठी मनीष सिसोदिया जो कि इन दिनों शिक्षा में सुधार को लेकर के अपने संजीदा प्रयासों को और अधिक समझने व सीखने के लिए फिलहाल विदेश यात्रा पर हैं उन्हें फैक्स भेजकर तुरंत  दिल्ली में उपस्थित होने के लिए कुछ इस तरह के अंदाज में नोटिस भेजा जैसे क्लास का क्लास टीचर मॉनिटर को क्लास से बाहर गया जानकार  भेजता है ,क्योंकि यह दौर फेसबुक ट्विटर प्लस आदि का है इसलिए वहां की पुकार ज्यादा मच जाती है स्वाभाविक भी है ||


अफसोस होता है उस रस्साकशी को देख कर और ऐसा नहीं है कि इसके लिए आप सिर्फ किसी एक निकाय किसी एक संस्था किसी एक राजनीतिक दल या किसी एक व्यक्ति को जिम्मेदार ठहरा सकते हैं हां यह विडंबना है की एक तरफ पिछले 2 वर्षों से देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश में स्वच्छता अभियान को एक मिशन के रूप में देखने मानने व समझने का यत्न  किया और बहुत सारे प्रयास किए  जाते रहे हैं लेकिन उन सब का क्या फायदा यदि राजधानी दिल्ली जैसे महानगरों में भी मलेरिया चिकनगुनिया जैसी बीमारियां महामारी का रुप लेकर प्रशासन व् आम लोगों को पूरी तरह से पस्त कर देती है ||



 शीत ऋतु के प्रारंभ तक यहां यह कहा जाए कि ठंड शुरू होने तक इस तरह कि बरसाती बीमारियों का प्रकोप और अधिक रहने की संभावना सिर्फ इस वर्ष बल्कि पिछले कई वर्षों से लगातार बहती चली आई है सरकार इन मौसम से पहले बड़े-बड़े दावे कर ले अपनी तैयारियों का खुलासा करें मगर जमीनी हकीकत तो यही है कि जब जब ऐसी कोई स्थिति विकराल रूप होकर के आपदा का रूप बन जाती है सरकार के पास संसाधन व्यक्ति वह योजनाओं का इस कदर अभाव रहता है कि वह या तो एक दूसरे पर दोषारोपण का कार्य शुरु कर देते हैं सारी स्थिति जाने के बाद जांच वह मुआवजा देकर अपने कार्य की इति श्री कर देते हैं देखना यह है कि राज्य सरकार व केंद्र सरकार या कहा जाए कि नरेंद्र मोदी और अरविंद केजरीवाल के बीच की रस्साकशी पर दिल्ली की आम जनता कब तक कर्तव्य करती रहेगी....


रविवार, 28 अगस्त 2016

सर्पीले रास्ते , बर्फीली नदी , गर्मजल कुंड ...और मणिकरण की यात्रा


इस यात्रा  वृतांत  की  ये  अंतिम  कड़ी  है ,इससे पहले की कड़ियाँ आप यहाँ ,यहाँ और यहाँ पढ़ सकते हैं तो जैसा कि मैंने आपको पिछले पोस्ट में बताया था कि मनाली के क्लब हाउस  से  निकलने  के बाद  हमारा अगला और शायद इस यात्रा  का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव की ओर बढ़  चलना स्वाभाविक ही था | लेकिन उस समय  मुझे और मित्र अरविन्द जीको  हीपता   था  कि  अब  जिस  सफ़र  और  जिस  रास्ते  की  ओर हम बढ़ने वाले हैं वो देश हीनहीं  विश्व के कुछ बेहद दुर्गम और कठिन रास्तों में से एक है  | श्रीमती जी को खाई और साथ उफनती व्यास नदी की ओर न बिठा कर दूसरी  और  बिठाया  गया  | बच्चे  फोन  और  कैमरों  में  मस्त  होने  की  तैयारी  में  था और  मैंआदतन ..पहाड़ों ,वनस्पतियों ,रास्तों ,मिट्टीकोभांपताऔरपरखता चल रहा था |शायद इसलिए भीकि जाने फिर कभी जीवन में इन रास्तों पर दोबाराआने का कोइ बहाना मिले न मिले  |

रास्ते  वाकई  बहुत  जगह  पर  बहुत  ही  संकरे  और  डराने वाले  थे  ऐसे  ही एक मोड  पर  रुके  हुए  हम | यहाँ इन रास्तों  पर  सबसे  अधिक कठिन बात   होती  है  रिवर्स गियर  में  गाडी  का  संचालन ,देखिये एक बानगी आप  भी 

मनाली  से  मणिकरण  साहब  के  लिए  जाने  वाली  सड़क  का  एक  नज़ारा , चित्र कार  की  अगली  सीट  से  

खैर ऐसा नहीं था कि पूरे  रास्ते सिर्फ  डरने और  डराने  वाले  दृश्य  ही देखने को  मिले ,सड़क के बिलकुल साथ साथ  उफनती उछलती व्यास नदी बहुत से मोड़ों पर बहुत ही खूबसूरत और मनमोहक नज़ारे उत्पन्न कर रही थी |एक ख़ास क्षेत्रके आसपास तो कालेज के विद्यार्थियों के जाने कितने ही   समूह राफ्टिंग कैम्पिंगआदि के लिए डेरा जमाये बैठे थे  |हम आगे बढ़ते जा रहे थे  |




मनाली  से  आगे  बढ़ते  हुए  ही वनस्पति  में  भी बदलाव  महसूस  हुआ था | अब  फलदार पेड़  पौधों की बहार थी | जाने कितने ही तरह  के  कमाल के फल  फूल और पौधे भी  लद्द्दम लद्द ...हालांकि मालूम  चला  कि अभी इनके  पकने  में समय  है | सच कहूँ तो धरती पर अमृत बिखरा हुआ है और ज़हर तो उसमें हमने भरा है , बूँद बूँद करके यदि प्रकृति की अमरता का स्वाद चखना हो तो इन्ही वन आच्छादित प्रदेशों का विचरण करना चाहिए | बहरहाल हमारे लिए तो वहां दिखने मिलने वाले हर पौधे और उन पर लदे फदे फल सब तिलस्म सरीखे थे | आखें और मन जुराता जा रहा था



ये नीचे बब्बू गोशे के नन्हे नन्हे फल ..देखिये कितने खूबसूरत लग दिख रहे हैं | कार को बीच बीच में रोक कर मैं और मित्र अरविन्द जी , छू सहला कर परखते भी जा रहे थे ......



अब थोड़ी सी भूख सी लगने लगी थी लिहाजा सड़क के ठीक साथ बना हुआ हुआ एक छोटा सा रेस्तरां नुमा चाय की हट्टी देख गाडी को ब्रेक लगाया गया | हाथ मुंह धो कर और कुछ नाश्ते पानी के साथ चाय के लिए कह कर अपनी आदत के अनुसार मैं कौतूहलवश आसपास टहलने लगा | पास के ही मकान में ये चल रहा था | जी हाँ आलू बुखारों की पैकिंग का काम चल रहा था |

बात करते हुए पता चला  कि यहाँ से पैक करके अधिकांश माल को सीधे दिल्ली की आजाद पुर सब्जी मंडी के लिए भेजा जाता है , आजाद पुर मंडी कहते हैं कि एशिया की सबसे बड़ी मंडी है और दिल्ली समेत पूरे उत्तर भारतीय राज्यों की फल व् सब्जी की लाईफ लाइन भी | तो बातचीत के दौरान मुझे जो सबसे रोचक बात  पता चली वो ये कि , यदि यहाँ के निकटतम बाज़ारों जैसे चंडीगढ़ या और कोइ भी तो उन बाज़ारों को भी आपूर्ति सीधे यहाँ से नहीं बल्कि दिल्ली की उसी आज़ादपुर सब्जी मंडी से ही की जाती है | इसके भी बड़े ही रोचक और वाजिब तर्क बताये इन्होंने | मैं काफी देर तक बैठ कर उनके काम काज और उन्हें समझने की कोशिश करता रहा |


आलूबुखारों की पैकिंग

और अपने काम में लगे हुए स्थानीय निवासी


खैर इन सबसे गुजरते हुए हम अब मणिकरण साहब गुरूद्वारे तीर्थ स्थल पहुँच चुके थे | गुरु मणिकरण साहब गुरूद्वारे का मुख्य प्रवेश द्वार और शायद एक अनोखी दुनिया का प्रवेश द्वार भी | व्यास नदी अपने पूरे उफान पर और जड़ जैसी ठंडी , वेग से उछलती हुई शोर मचाती हुई ...उसी के  ऊपर बना हुआ ये छोटा सा पुल जिसके उस पार जाने कौन सी जादू की दुनिया बसी हुई थी ..आइये दिखाते हैं आपको

गुरुद्वारा मणिकरण साहब का मुख्यद्वार और आते जाते श्रद्धालुजन



छुट्टियों के कारण स्थानीय और पड़ोसी लोगों की भरमार थी | पंजाब , हरियाणा , हिमाचल , दिल्ली और उससे भी दूर दूर से लोग इस पवित्र स्थल पर पहुंच रहे थे | मैं देश में स्थित बहुत सारे गुरुद्वारों का दर्शन कर चूका हूँ मगर इन सबमें मुझे मणिकरण साहब गुरुद्वारा समिति द्वारा संचालित व्यवस्था सबसे कमज़ोर लगी | पहले निर्णय किया गया कि मणिकरण साहब के प्रांगण में रात गुज़ार कर सुबह दर्शन के बाद वापसी शुरू की जायेगी | मगर थोड़ी ही देर में बच्चों की परेशानी को देखते हुए पुनः निर्णय किया गया कि अरविन्द जी से कहा जाए कि कोइ ठिकाना तलाशें | और शायद ये न होता तो हम उस पार की उस अनोखी दुनिया से वंचित ही रह जाते | गुरुद्वारा साहिब की भीतर से जाने वाली सुरंग के अन्दर से निकल कर उस पार की बस्ती में पहुँचते ही मन आनंदित हो गया |


ये एक अलग दुनिया  है , अलग अनुभव आपको धरती  के  भीतर  पल रहे आग पानी की  ताकत  का  एहसास कराता है ,जिस रस्ते से होकर मैं अपने इस आज रात के ठिकाने की  तरफ बढ़  रहा था उसके नीचे बह रही  नालियों  और  पानी  पहुंचाने  वाली  पाईप लाइनों में गंधक मिश्रित खौलता उबलता हुआ पानी और  उस सर्द मौसम में कई फीट ऊपर  उठता भाप का गुबार , कुल मिला कर कमाल का  अनुभव और नज़ारा  सामने  था 




व्यास नदी का  कल कल पानी  जब  गंधक की चट्टानों  से  टकराता  है  तो  गर्म भाप के  धुंए यूं दीखते  हैं 

चित्र को बड़ा करने  पर  गंधक से  गली हुई  पानी  की  पाईप को  देखा  जा  सकता  है 

तीव्र भाप 


आयुष , बुलबुल और श्रीमती जी 
गंधक की  गर्म चट्टानों के ऊपर  बसी  ये  धार्मिक सामाजिक दुनिया का अर्थ तंत्र भी  इन कारकों से जुडा हुआ  है  यहाँ  पर | भक्तों द्वारा स्थान स्थान पर बनाए  गए ऐसे  गर्म कुण्डों में चावल , आलू , आदि उबालने के अतिरिक्त वहां के स्थानीय  निवासियों द्वारा भी  इन गर्म पानी के कुंड का  प्रयोग खाना बनाने के अलावा और  भी अन्य कार्यों में  किया  जाता है  जिसमें से सबसे ख़ास  है  गर्म कुण्ड या  गंधक मिश्रित पानी में  स्नान | 

ऐसा  ही  गर्म कुंड जिसमें शायद  चावल पकाने  के लिए  रखा  गया  है 

गुरूद्वारे के प्रांगण में स्थित गर्म पानी का  सरोवर और उसमें स्नान करते श्रद्धालु जन |




इसके अलावा यहाँ के स्थानीय छोटे छोटे होटल व रिहायशी स्थानों पर  घरों के  अन्दर भी ऐसे  ही  कुण्ड स्नानघरों में बना  कर  गर्म पानी से स्नान का  आनंद लिया  जा  सकता  है  है | हमारे उस  छोटे  से  होटल  में  बना  हुआ  ऐसा ही एक स्नानागार





मणिकरण के छोटे से बाजार में आपको पहाडी जडी  बूटियाँ बहुतायत में  मिलती हैं बशर्ते कि आपको असली  की  पहचान हो 

कलकल करती  हुई  बर्फ से भी  ठंडी  व्यास  नदी 

सुबह सुबह का  मनोरम दृश्य 

मंगलवार, 29 दिसंबर 2015

माता हिडिम्बा देवी मंदिर , क्लब हाउस मनाली -हुस्न पहाड़ों का (शिमला यात्रा-III)




पिछली गर्मियों की छुट्टीयों में अचानक ही पहाड़ों की सैर का बना कार्यक्रम कैसे आगे बढ़ रहा था ये आप इन और इन पोस्टों में पहले ही पढ़ देख चुके हैं | शिमला , कुफरी आदि के बाद स्वाभाविक रूप से अगला पड़ाव था मनाली | बुलबुल की तबियत अब ठीक हो चुकी थी और श्रीमती जी के ऊपर घुमावदार रास्ते की घबराहट पूरी तरह हावी थी | खैर अभी तो हमें अगले तीन दिनों तक ऐसे ही या कहूं कि इससे भी अधिक दुरूह रास्तों और वाकयों से गुजरना था | मित्र अरविन्द जी के साठ अगली सीट पर बैठ कर उन घुमावदार रास्तों पर हम बहुत सी सीधी और घुमावदार बातें किये चले जा रहे थे | 


जैसा कि मैं अपनी पिछली पोस्टों में कई बार कह चुका हूँ कि पहाड़ों में घूमने का एक आनंद यह भी है कि जितनी खूबसूरत आपको अपनी मंजिल यानी कोइ पहाडी ,शहर , गाँव या कस्बा दिखाई देता है उससे कई गुना खूबसूरती उन तक पहुँचने वाले रास्तों के दोनों और और आसपास बिखरी रहती है | बस आप उसे अपने भीतर कितने भीतर तक बसा और समा पाते हैं ये देखने वाली बात होती है | रास्तों से मेरी दोस्ती वैसे भी बहुत पुरानी है सो मेरी नज़र सामने और आसपास के रास्तों पर थी और कान मित्र अरविन्द जी के बातों पर ....देखिये रास्तों की खूबसूरती की एक बानगी  






 पहाडी रास्तों पर चलते हुए जिस एक बात की आशंका सबसे ज्यादा रहती है वो है पास की पहाड़ियों से शिलाओं , चट्टानों और पथ्थरों के खिसक कर सड़क पर कभी भी आ जाने की संभावना और उस स्थिति में सड़क पर चलते वाहनों के लिए बचने की कोइ गुंजाईश नहीं रहती | हालांकि प्रदेश सरकार , स्थानीय एजेंसियों व् सभी सम्बंधित लोगों को शुक्रिया कहा जाना चाहिए क्योंकि अधिकांशत: सड़क अच्छी स्थति में मिली हमें अभी तक तो .......
सड़क किनारे बना हुआ छोटा सा शिव मंदिर 
 हम मनाली पहुँच चुके थे और मनाली पहुँचते ही जो दो बातें एक साथ पता चली वो ये कि एक तो यहां शिमला से कहीं अधिक भीड़ होने के कारण होटल मोटल आदि में बहुत मारा मारी वाली स्थिति थी ऐसे में हमारे मित्र अरविन्द जी द्वारा पहले ही किया गया इंतजाम बेहद काम आया | मगर दूसरी और सबसे बड़ी समस्या जो पूरे पहाड़ों में सभी जगह कम या ज्यादा मगर मिली सब जगह वो रही पार्किंग की समस्या ,उसे भी अरविन्द जी ने अपने स्तर पे निपटा ही दिया ...

मनाली में ठिकाना रहा यहाँ 

मैं घुमक्कड़ी करते हुए बहुत सारे स्थानों पर जा चूका हूँ और उनमें निश्चित रूप से बहुत से पहाडी स्थल भी थे , किन्तु अब चूंकि पूरी फुर्सत में पहाड़ों को जानने  और समझने ही गया था सो सब कुछ बहुत ध्यान से देख और समझ रहा था | लगभग एक सी जीवन शैली , एक ही जैसी दुकानें , एक ही जैसी जरूरतें और एक सी आदतें , कुछ कुछ को छोड़कर सबमें एक वही एक सी बात मगर वो एक सी बात का सम्मोहन भी अजब था और हमेशा से रहा होगा  , तभी पहाड़ शुरू से देव और मनुष्यों को अपनी ओर खींचते रहे थे | 



मनालीहाट की एक दूकान 

हिडिम्बा मंदिर की और मुड़ने वाले मार्ग पर आधुनिक सलून 

सूचना ,दिशा व् दूरी प्रदर्शक बोर्ड 
 मनाली में सबसे पहले पर्यटक हिडिम्बा मंदिर ही देखने जाते हैं मैंने भी बचपन से लेकर अब तक इसकी विशेष बनावट के कारण ध्यान में बस गए मंदिर के बारे में बहुत पढ़ा देखा सुना था |हिडिम्बा , दुसरे नंबर के पांडू पुत्र महाबलशाली भीम की पत्नी स्थानीय भील युवती थीं | पूरा मंदिर परिसर एक कमाल की शान्ति और सुकून की चादर ओढ़े हुए था | बहुत ही मनमोहक और आकर्षक 
हिडिम्बा मंदिर परिसर के खूबसूरत पेड़ों के बीच हम सब 

                   महाभारतकालीन प्राचीन हिडिम्बा मंदिर में कतारबद्ध श्रद्धालु                                                    
वहां खूबसूरत खरगोशों और मेमनों के साथ खेलने का आनंद 

मंदिर परिसर के अहाते में बैठा एक पेशेवर चित्रकार 

मंदर की बाईं और के नीचे रास्ते के पास लगा हुआ छोटा सा बाजार 
यहीं इस बाज़ार के साथ छोटे छोटे कई रेस्तरां मिल गए जिनमें और कुछ मिले न मिले मगर हम सबके सदाबहार पसंद आलू के पराठे मिल गए जिन्हें उदरस्थ किया गया वो भी लस्सी के बड़े ग्लास के साथ |

हिडिम्बा मंदिर से आगे निकले तो क्लब हाउस की तरफ बढ़ चले | एक छोटा सा सुन्दर सा पिकनिक व् खरीददारी स्पॉट , यहाँ बच्चों को बहलाए रखने के लिए बहुत सारे ताम झाम हैं , बोटिंग शोटिंग है सो अलग से | यहाँ बच्चों की मम्मी को अपने सबसे पसंदीदा काम की याद बहुत ज़ोरों से हो आई क्योंकि सामने ही इम्पोरियम से झांकती झिलमिलाती चमकदार वस्तुएं उन्हें बुलाने लगी थीं | सो वे चली उनकी ओर और हम बच्चों समेत उनके खेल कूद वाले क्षेत्र की तरफ 
मनाली क्लब हाउस 
अहाते में गोलू और बुलबुल 
 बहुत छोटे थे तब शायद लखनऊ में परिवार के साथ कभी बोटिंग का आनंद लिया था बस यही याद था थोडा थोडा | बुलबुल की मम्मी जी जितना पहाड़ों से डरती थीं उससे ज्यादा पानी से सो उनके होते हमें ये इजाज़त भी शायद ही मिलती मगर मौके का फायदा उठा हम गंगा नहा लिए , मतलब बोटिंग कर आये | बुलबुल को ये शिकायत रही कि उसके पाँव उन पैदलों तक क्यों नहीं पहुँचते 

बच्चों के साथ बोटिंग का आनंद 

दोपहर ढलने लगी थी और इससे पहले कि हम और थक कर चूर होते विश्राम का समय हो चला था | अब आगे हमें मनाली से मणिकरण साहिब की ओर निकलना था , जिसके बेहद खतरनाक और भयावह रास्तों का हमें लेश मात्र भी अंदाज़ा नहीं था और यदि होता तो बकौल श्रीमती कभी भी यहाँ नहीं फटकते ..मगर नहीं आते तो ताउम्र अफ़सोस ही रहता ....

मणिकरण के किस्से अगली पोस्ट में 


रविवार, 27 सितंबर 2015

हुस्न पहाड़ों का -----घुड़सवारी , कुफरी की कहानी



इस सफ़र की शुरुआत और पहले पड़ाव तक पहुंचे की कहानी आप पढ़ चुके हैं | वहां पहुँचते ही सबसे पहले जो बात सबके मुंह से निकली वो ये कि जोरों की भूख लगी है सो पहले पेट पूजा की जाए | शिमला में प्रवेश करते करते बारिश की फुहारों ने भी स्वागत करते हुए जता और बता दिया था कि अब अगले एक सप्ताह तक हमें इस भीगे भीगे मौसम का साथ मिलने वाला है |




फ़टाफ़ट ही गर्म पानी से स्नान करके सब थोड़े तरोताजा हुए और इसका दूसरा प्रभाव ये पड़ा कि भूख और ज्यादा तेज़ हो गयी , सुबह से हलके फुल्के नाश्ते और फल वैगेरह खाए होने के कारण अब भरपूर खाने की जरूरत महसूस हो रही थी | मित्र अरविन्द जी का साथ ऐसे समय पर काफी उपयुक्त रहा और श्रीमती जी के पंजाबी खाने के स्वाद को जानते हुए उन्होंने सामने ही दिख रहे इकलौते ढाबेनुमा छोटे से रेस्तरां की तरफ कूच किया | यहाँ ये बता दूं कि पहाड़ों में जाते समय आप अपनी जीभ और स्वाद को या तो वहां उपलब्ध होने वाले कम मसालेदार भोजन के लिए अभ्यस्त कर लें या फिर उन्हीं फास्ट फ़ूड पर निर्भर हो जाएँ जो शहरों में पेट और सेहत  का कचरा किये हुए हैं , क्योंकि यहाँ हर तीन रेस्तरां में से एक पर आपको पंजाबी ढाबा , पंजाबी होटल जैसा लिखा हुआ कुछ दिख जाएगा मगर बकौल श्रीमती जी , इनमें वो स्वाद कहाँ | खैर हमारा तो ये मानना है कि जब भूख लगे तो जो सामने मिले वही अमृत है ...और खाने पीने में हमारी कोइ विशेष आदत या परहेज़ भी नहीं है जैसा देश वैसा भेष |




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उसी ढाबे से लिया गया एक चित्र




अगली सुबह शिमला के एक सबसे पसंदीदा प्वाइंट कुफरी जाने का कार्यक्रम बना | बकौल अरविन्द जी वहां कुछ पल तो आनंदायक रूप से मनाये जा सकते थे | लेकिन तब ये अंदाजा नहीं था कि आनंददायक होने के अलावा वे पल ताउम्र के लिए यादगार भी बन जाने वाले थे | नियत स्थान पर पहुँच कर ज्ञात हुआ कि कुफरी के उस दर्शनीय प्वाईंट तक सिर्फ घोड़े बैठ कर जाया जा सकता था | हालांकि बाद में जब उस रास्ते पर चले तो हकीकत महसूस करते भी देर नहीं लगी | मैं चूंकि फ़ौजी परिवार में पला बढा हुआ था इसलिए , घुड़सवारी , तैराकी , आदि में सिद्धहस्त था किन्तु बच्चे और उनसे भी अधिक बच्चों की मम्मी ने वहीं सत्याग्रह ठान दिया कि चाहे जो भी हो वे घोड़े पर नहीं बैठेंगी | खैर जैसे तैसे मनाया गया , और सवारी चल दी कुफरी के उस टेलीस्कोप प्वाइंट की ओर|

 


रास्ते में जो मैंने स्पष्टतः महसूस किया कि कम सौ सवा सौ घोड़ों पालने पोसने वाले कुछ लोगों  ने  जानबूझकर  रास्ते को न सिर्फ  संकरा  बल्कि कहीं और लाई गयी कीचडनुमा मिट्टी से इतना अधिक दुर्गम और खतरनाक बना  दिया था कि  वे  जो कुछ  लोग  घोड़े  पर  बैठकर  जाने  को  तैयार  नहीं  हुए  और  जिन्होंने  ये  कोशिश की   भी   उनके  लिए  ये   ज्यादा  बड़ी  सिरदर्दी  साबित  हुई | मुझे  लगता  है  कि सरकार  व् प्रशाशन  को इस बात   की   पूरी  जानकारी भी होगी | पूछने पर इस  बात  से साफ़ इनकार करते हुए  राईस  थामे मदन जी ने  बताया  कि क्या  करें  बाबू साहब , आखिर  हमारी  कमाई का ज़रिया  और कोइ  है भी तो नहीं || श्रीमती जी और इनकी  पूरी बिरादरी   यानी ..महिला ब्रिगेड ...चीत्कार ..मारते हुए , कई बार इतनी जोर से ..खुद घोड़े भी हैरान परेशान होकर सोचने लगते थे कि आखिर हम कर तो कुछ भी नहीं रहे फिर ये महिलाएं हमें डरा क्यूँ रही हैं |

घोड़े पर सवारी गांठते गोलू और बुलबुल

श्रीमती जी की भाव भागिमा देख कर आप खुद अंदाजा लगा सकते हैं 




आगे जो नज़ारा आखों के सामने था , वो आप भी देखिये ....




 


 फिलहाल के लिए इतना ही , पोस्ट लम्बी हो जायेगी और आप हो जायेंगे  बोर इसलिए ..आगे की यात्रा अगली पोस्ट में ....

शनिवार, 11 जुलाई 2015

हुस्न पहाड़ों का -----एक मैदानी सैलानी की नज़र से


चांदी की छत



बहुत समय से कहीं  बाहर निकल पाने का अवसर आते हुए भी कहीं न कहीं कुछ न कुछ ऐसी वजह निकल ही आती थी की ठीक आखिरी वक्त पर भी वो स्थगित हो जाया करता था | पिताजी के फ़ौजी जीवन के कारण पहले ही पूरा बचपन यायावरी रहा सो देश के बहुत सारे भागों के बहुत सारे खूबसूरत शहरों ,नगरों को मैं अपने विद्यार्थी जीवन में ही देख चूका था | जो रही सही कसर थी वो अपनी प्रतियोगिता परीक्षाओं के दौर में पूरी हो गयी |वैसे जब भी घूमने फिरने की बात होती है मैं अक्सर एक बात मित्रों को कहता हूँ की इंसान की जितनी उम्र है कम से कम उतनी जगहों को देखने का अवसर तो उसे जरूर मिलना चाहिए और इंसान को भी उनका लाभग उठाना चाहिए |

लगभग सात वर्षों पूर्व जब सपरिवार डलहौजी और खजियार गए थे तो श्रीमती जी को गोल गोल चढ़ाई उतराई वाले पहाडी रास्तों ने  काफी डरा दिया था | इस बीच मित्र अरविन्द जी ने बताया कि उनका शिमला , मनाली , होते हुए मणिकरण साहिब की  तरफ जाने का कार्यक्रम बन रहा है और यदि हमारा भी निश्चित हो जाए तो वे अभी ही चलेंगे | बच्चों की जिद और ललक के आगे तो मम्मी जी भी बेबस सो तय हो गया की हम सब मित्र अरविन्द जी के साथ उनकी मारुती डिजायर में एक सप्ताह की यात्रा पर निकलेंगे | सभी स्थानों पर हमारे ठहरने आदि की व्यवस्था अरविन्द जी ने पहले ही कर दी |


सुबह पांच बजे तडके ही निकल जाने का लाभ ये रहा की हम ग्यारह बजे तक चंडीगढ़ से आगे निकल कर शिमला की और बढ़ चुके थे | बच्चे अपनी मम्मी के साथ पिछली सीट पर बैठ कर तेज़ी से आसपास से निकलते शहरों , सड़कों, दुकानों को देखते हुए चले जा रहे थे | आगे हम और मित्र अरविन्द जी जो हमारे साथ ही आगे चालक की सीट पर बैठे थे उनके साथ विमर्श  चलता रहा | कभी उनके टूर ट्रेवेल्स ले अनुभव तो कभी सामने आ रहा योग दिवस , कभी राजनीति , कभी धर्म , कभी बीत रहा शहर |कार का पहिया घूमता रहा और घड़ी की सुई भी .............हम अब फिर भीड़ भाड से बाहर थे ......श्रीमती जी एकदम साफ़ सुथरी सड़कें देख कर कम से कम दो बार टोल टैक्स दिए जाने की वकालत कर चुकी थीं ..वैसे अब तक सडकें वाकई अच्छी थीं ...


मैं अपने जीवन में इतनी बार और इतने विविध परिवहन माध्यमों से सफ़र करता  रहा हूँ की सफ़र , विशेषकर  यदि यात्रा सपरिवार करनी हो तो और ज्यादा आवश्यक हो जाता है , के लिए की जाने वाली तैयारी , आपात समय के लिए सामान दवाई आदि , मानचित्र , मयूर जग , और दो मोबाइल के संग  एक कैमरा और , डोरी , टार्च वैगेरह को मैं इस बीच सिलसिलेवार निपटा चूका था | वहां के मौसम और पिछले एक सप्ताह के मानसून का हाल भी देख चूका था |


कहते हैं पहाड़ों का सौन्दर्य सबसे ज्यादा पहाडी रास्तों पर ही देखने को मिलता है और यकीनन ये सच ही है | एक मैदानी सैलानी के रूप में अगले एक सप्ताह तक हम सब पहाड़ों से मुलाक़ात और जान पहचान करने वाले थे | बिटिया बुलबुल थोड़ी असहज सी होने लगी थी और बार बार उल्टियां करने लगी थी .................

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देखिए   कुछ फ़ोटोज़ .....................

शिमला के लिए प्रवेश मार्ग पर





रास्ते का दृश्य




गिरते टूटते पहाड़ और रास्ते



मनमोहक नज़ारा ..है न



फ़िल्मी से दृश्य



रास्ते हैं प्यार के


हरी भरी धरती और बाग़ बगीचे

बादलों को चूमते पहाड़




सफ़र के पहले ठिकाने पर


साथ चलने वाले

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