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मंगलवार, 30 दिसंबर 2008

आप हिन्दी में ब्लॉग्गिंग कर रहे हैं तो ख़ास हैं, और इस खासियत को समझें

जी हाँ, मैं पूरे संजीदगी से ये बात कह रहा हूँ। आप शायद ये कहेंगे की ये क्या बात हुई भला और ये बात अभी यहाँ क्यों कह रहा हूँ। कारण तो है , वाजिब या गैरवाजिब ये तो नहीं जानता। दरअसल जितना थोडा सा अनुभव रहा है मेरा, उसमें मैंने यही अनुभव किया है की सब कुछ ठीक चलते रहने के बावजूद हिन्दी ब्लॉगजगत में अक्सर कुछ लोगों द्वारा चाहे अनचाहे किसी अनावश्यक मुद्दे पर एक बहस शुरू करने की परम्परा सी बंटी जा रही है। हलाँकि ऐसा हर बार नहीं होता और ऐसा भी जरूरी नहीं है की जो मुद्दा मुझे गैरजरूरी लग रहा है हो सकता है दूसरों की नजर में वो बेहद महत्वपूर्ण हो। मगर मेरा इशारा यहाँ इस बात की और है , की कभी एक दूसरे को नीचा, ओछा दिखने की होड़ में तो कभी किसी टिप्प्न्नी को लेकर, कभी किसी के विषय को लेकर कोई बात उछलती है या कहूँ की उछाली जाती है बस फ़िर तो जैसे सब के सब पड़ जाते हैं उसके पीछे , शोध , प्रतिशोध, चर्चा, बहस सबकुछ चलने लगता है और दुखद बात ये की इसमें ख़ुद को पड़ने से हम भी ख़ुद को नहीं बच्चा पाते, और फ़िर ये भी की क्या कभी किसी निष्कर्ष पर पहुँच पाते है ?

मुझे पता है यहाँ पर जो लोग इस दृष्टिकोण से देखते हैं की यदि ब्लॉग्गिंग में यही सब देखना और सोचना है तो फ़िर ब्लॉग्गिंग क्यों और भी तो माध्यम हैं न। मैं उन सब लोगों को बता दूँ और अच्छी तरह बता दूँ की आप सब जितने भी लोग हिन्दी और देवनागिरी लिपि का प्रयोग कर के लिख रहे हैं वे बहुत ख़ास हैं विशिष्ट हैं, सिर्फ़ इतने से ही जानिए न की करोड़ों हिन्दी भाषियों में से आप चंद उन लोगों में से हैं जो हिन्दी में लिख पा रहे हैं, और हाँ गए वो दिन जब आप अपने लिए लिखते थे। आपकी जानकारी के लिए बता दूँ आज कम से कम हरेक हिन्दी का अखबार हमारी लेखनी को पढ़ रहा है, उस पर नजर रखे हुए है, उसे छाप भी रहा है और हमारे आपके विचार समाचार पत्रों के माध्यमों से न जाने कितने लोगों तक पहुँच रहा है।

तो आपको और हमें ही ये सोचना है की हम अपनी लेखनी और शब्दों को इस बात के लिए जाया करें की
गाली का मनोविज्ञान कहाँ से शुरू होकर कहाँ तक पहुंचा या कुछ सार्थक सोचे और लिखें .............
यदि कुछ ज्यादा कह गया तो परिवार का सदस्य समझ कर क्षमा करें.

आप हिन्दी में ब्लॉग्गिंग कर रहे हैं तो ख़ास हैं, और इस खासियत को समझें

जी हाँ, मैं पूरे संजीदगी से ये बात कह रहा हूँ। आप शायद ये कहेंगे की ये क्या बात हुई भला और ये बात अभी यहाँ क्यों कह रहा हूँ। कारण तो है , वाजिब या गैरवाजिब ये तो नहीं जानता। दरअसल जितना थोडा सा अनुभव रहा है मेरा, उसमें मैंने यही अनुभव किया है की सब कुछ ठीक चलते रहने के बावजूद हिन्दी ब्लॉगजगत में अक्सर कुछ लोगों द्वारा चाहे अनचाहे किसी अनावश्यक मुद्दे पर एक बहस शुरू करने की परम्परा सी बंटी जा रही है। हलाँकि ऐसा हर बार नहीं होता और ऐसा भी जरूरी नहीं है की जो मुद्दा मुझे गैरजरूरी लग रहा है हो सकता है दूसरों की नजर में वो बेहद महत्वपूर्ण हो। मगर मेरा इशारा यहाँ इस बात की और है , की कभी एक दूसरे को नीचा, ओछा दिखने की होड़ में तो कभी किसी टिप्प्न्नी को लेकर, कभी किसी के विषय को लेकर कोई बात उछलती है या कहूँ की उछाली जाती है बस फ़िर तो जैसे सब के सब पड़ जाते हैं उसके पीछे , शोध , प्रतिशोध, चर्चा, बहस सबकुछ चलने लगता है और दुखद बात ये की इसमें ख़ुद को पड़ने से हम भी ख़ुद को नहीं बच्चा पाते, और फ़िर ये भी की क्या कभी किसी निष्कर्ष पर पहुँच पाते है ?

मुझे पता है यहाँ पर जो लोग इस दृष्टिकोण से देखते हैं की यदि ब्लॉग्गिंग में यही सब देखना और सोचना है तो फ़िर ब्लॉग्गिंग क्यों और भी तो माध्यम हैं न। मैं उन सब लोगों को बता दूँ और अच्छी तरह बता दूँ की आप सब जितने भी लोग हिन्दी और देवनागिरी लिपि का प्रयोग कर के लिख रहे हैं वे बहुत ख़ास हैं विशिष्ट हैं, सिर्फ़ इतने से ही जानिए न की करोड़ों हिन्दी भाषियों में से आप चंद उन लोगों में से हैं जो हिन्दी में लिख पा रहे हैं, और हाँ गए वो दिन जब आप अपने लिए लिखते थे। आपकी जानकारी के लिए बता दूँ आज कम से कम हरेक हिन्दी का अखबार हमारी लेखनी को पढ़ रहा है, उस पर नजर रखे हुए है, उसे छाप भी रहा है और हमारे आपके विचार समाचार पत्रों के माध्यमों से न जाने कितने लोगों तक पहुँच रहा है।

तो आपको और हमें ही ये सोचना है की हम अपनी लेखनी और शब्दों को इस बात के लिए जाया करें की
गाली का मनोविज्ञान कहाँ से शुरू होकर कहाँ तक पहुंचा या कुछ सार्थक सोचे और लिखें .............
यदि कुछ ज्यादा कह गया तो परिवार का सदस्य समझ कर क्षमा करें.

हसीना हसीन हुई , और बेगम हुई गमजदा

पड़ोसी देश बांग्लादेश में आम चुनाव सात साल के बाद हुए। इस बीच वहां क्या-क्या हुआ और होता रहा , कहने bataane kee जरूरत नहीं। इस बार भी चुनाव से ठीक पहले और बाद में भी दोनों प्रमुख दल अवामी लीग और बांग्लादेश नेस्नालिस्ट पार्टी, यही अंदेशा व्यक्त कर रहे थे की चुनाव परिणाम मनोनुकूल न रहे तो pooree चुनाव प्रक्रिया पर प्रश्न चिन्ह खडा कर देंगे। लेकिन लगता है की आम मतदाता ये नहीं चाहता था।

चुनाव परिणाम आए और ऐसे आए की शेख हसीना और भी हसीन होकर उभरी । दूसरी तरफ़ बेगम खालिदा जिया का जिया तोड़ते हुए आम लोगों ने उन्हें इस कदर हाशिये पर दाल दिया की वे बेगम न रह कर गमजदा बन कर रह गयी। अब जबकिशेख हसीना पूरे दमख़म और भारी जनमत से सरकार बनाएंगी तो उनसे यही अपेक्षा रहेगी की वे अपने वीजन २०२० (जिसमें युवाओं से २०२० तक देश में संचार क्रान्ति लाने का वादा किया गया था ) को पूरा करने के अलावा अपने पिता को पुनः बांग्लादेश का राष्ट्रपिता घोषित करना, गरीबी, बेरोजगारी आदि से निपटने के कारगर उपाय करेंगी। इन सब कामों के अलावा भारत के साथ पिछले दिनों आयी कड़वाहट भी घटेगी , हम तो यही उम्मीद करेंगे ।


हाँ, अंत में बेगम जिया के लिए भी एक सलाह हैआपका असली वोट बैंक तो हमारे यहाँ घुसपैठिया बन कर गया हैयहाँ पड़े पड़े ऐसे ऐसे कारनामों में लिप्त है कि क्या कहें. देखिये अब भी वक्त है आप इन्हें वापस ले जाएँ, वरना हमारी आदत आप नहीं जानतीहमारे किसी पारखी नेता ने इन्हें अपना वोट बैंक मान लिया तो बस कल से ही आन्दोलन शुरूइन्हें आरक्षण दो, नौकरी दो, घर दो, अल्पसंख्यक दर्जा दो, दोहरी नागरिकता दो, उफ़ हे भगवान्, नहीं नहीं आप तो अपना ये अनमोल खजाना वापस ही ले जाओ.

सोमवार, 29 दिसंबर 2008

डायरी का एक पन्ना

अभी वर्षांत पर जबकि मन और मष्तिष्क दोनों ही बोझिल से हैं, और सच कहूँ तो बस इस साल के बीतने के इन्तजार में हैं, तो ऐसे में तो यही अच्छा लगा की जिस डायरी को मैं yun ही उलट रहा था उसके एक पन्ने पर उकेरे कुछ पंक्तियों को आपके सामने रख दूँ।

बसर हो यूँ की हर इक दर्द हादसा न लगे,
गुजर भी जाए कोई गम तो वाकया न लगे।
कभी न फूल से चेहरे पे गुर्दे यास जामे,
खुदा करे उसे इश्क की हवा न लगे॥
वो मेहरबान सा लगे इसकी कुछ करो तदबीर,
खफा भी हों आप तो खफा ना लगें॥

वो सर बुलंद रहा और खुद्पसंद रहा,
मैं सर झुकाए रहा और खुशामदों में रहा
मेरे अजीजों, यही दस्तूर है मकानों का,
बनाने वाला हमेशा बरामदों में रहा

मैं इन्तजार करूँगा आपका हर पल यारों,
आप आयेंगे, तभी मेरे रूह का दफ़न होगा,
हो सके हाथ में फूल के दस्ते नहीं , न सही,
खुदा के नाम पे , काँटों का तो कफ़न होगा॥

तुम्हारे ख़त में नया इक सलाम किसका था,
वो रकीब न था तो वो नया नाम किसका था।
वो कत्ल करके मुझे हर किसी से पूछते हैं,
ये किसने किया, ये काम किसका था॥

कुछ इस तरह से सताया जिंदगी ने हमें,
हंस-हंस के रुलाया जिंदगी ने हमें,
मौत आवाज देती रही बार- बार,
न इक बार बुलाया जिंदगी ने हमें।

मैं नहीं जानता इन्हें किन लोगों ने लिखा, मैं सिर्फ़ इतना जानता हूँ की वे बड़े काबिल लोग होंगे..........

डायरी का एक पन्ना

अभी वर्षांत पर जबकि मन और मष्तिष्क दोनों ही बोझिल से हैं, और सच कहूँ तो बस इस साल के बीतने के इन्तजार में हैं, तो ऐसे में तो यही अच्छा लगा की जिस डायरी को मैं yun ही उलट रहा था उसके एक पन्ने पर उकेरे कुछ पंक्तियों को आपके सामने रख दूँ।

बसर हो यूँ की हर इक दर्द हादसा न लगे,
गुजर भी जाए कोई गम तो वाकया न लगे।
कभी न फूल से चेहरे पे गुर्दे यास जामे,
खुदा करे उसे इश्क की हवा न लगे॥
वो मेहरबान सा लगे इसकी कुछ करो तदबीर,
खफा भी हों आप तो खफा ना लगें॥

वो सर बुलंद रहा और खुद्पसंद रहा,
मैं सर झुकाए रहा और खुशामदों में रहा
मेरे अजीजों, यही दस्तूर है मकानों का,
बनाने वाला हमेशा बरामदों में रहा

मैं इन्तजार करूँगा आपका हर पल यारों,
आप आयेंगे, तभी मेरे रूह का दफ़न होगा,
हो सके हाथ में फूल के दस्ते नहीं , न सही,
खुदा के नाम पे , काँटों का तो कफ़न होगा॥

तुम्हारे ख़त में नया इक सलाम किसका था,
वो रकीब न था तो वो नया नाम किसका था।
वो कत्ल करके मुझे हर किसी से पूछते हैं,
ये किसने किया, ये काम किसका था॥

कुछ इस तरह से सताया जिंदगी ने हमें,
हंस-हंस के रुलाया जिंदगी ने हमें,
मौत आवाज देती रही बार- बार,
न इक बार बुलाया जिंदगी ने हमें।

मैं नहीं जानता इन्हें किन लोगों ने लिखा, मैं सिर्फ़ इतना जानता हूँ की वे बड़े काबिल लोग होंगे..........

विकास बनाम विध्वंस - तय ख़ुद हमें करना है

आज विश्व समाज जिस दो raahe पर खड़ा है उसमें दो ही खेमे स्पष्ट दिख रहे हैं। पहला वो जो किसी भी कारण से किसी ना किसी विध्वंसकारी घटना, प्रतिचातना, संघर्ष, आदि में लिप्त है । दूसरा वो जो विश्व के सभी अच्छे बुरे घटनाक्रमों , उतार चढाव , राजनितिक, सामाजिक और आर्थिक परिवर्तनों के साथ अपने विकास के रास्ते पर अपनी गति से बढ़ रहा है। आप ख़ुद ही देख सकते हैं कि , एक तरफ़, अमेरिका, इंग्लैंड, जापान। यूरोप, चीन, भारत, फ्रांस और कई छोटे बड़े देश अपनी अपनी शक्ति और संसाधनों तथा एक दूसरे के सहयोग से ख़ुद का और पूरे विश्व का भला और विकास करने में लगे हुए हैं। वहीँ एक दूसरा संसार जिसमें पाकिस्तान, इरान, अफगानिस्तान, कई अरब और अफ्रीकी देश, आदि जैसे देश हैं जो किसी न किसी रूप में अपने पड़ोसियों और एक हद तक पूरे विश्व के लिए अनेक तरह की परेशानियाओं का सबब बने हुए हैं। या कहें तो उनका मुख्या उद्देश्य ही अब ये बन गया है कि अपने नकारात्मक दृष्टिकोण और क्रियाकलापों से पूरे विश्व का ध्यान अपनी उर लगाये रखें ।

ये जरूर है कि जो देश बिना किसी अदावत के अपने विकास और निर्माण में लगे हैं , वे ही आज दूसरे विश्व जो कि विध्वंसकारी रुख अपनाए हुए हैं, उनके निशाने पर हैं, कभी आतंकवादी हमलों, तो कभी अंदरूनी कलह के कारण से उनके पड़ोसी यही चाहते हैं कि किसी न किसी रूप में वे भी भटकाव का रास्ता पकड़ लें। लेकिन ये तो अब ख़ुद उस समाज को ही तय करना होगा कि उसे किस रास्ते पर चलना है, वर्तमान में जबकि भारत और पकिस्तान के बीच बेहद ख़राब रिश्तों की, या कहें कि युद्ध की स्थिति की बातें चल रही हैं तो ऐसे में तो ये प्रश् और भी महत्वपूर्ण हो जाता है । क्योंकि इतना तो तय है कि आप एक साथ चाँद पर कदम रखने और दुश्मनों के साथ युद्ध में उलझने का काम नहीं कर सकते, खासकर तब तो जरूर ही, जब आपके सामने अमेरिका का उदाहरण हो। जिस अमेरिका ने ११ सितम्बर के हमले की प्रतिक्रयास्वरूप पहले इराक़ और फ़िर अफगानिस्तान का बेडा गर्क किया उसे देर से ही सही, आज भारी आर्थिक मंदी का सामना करना पर रहा है।

आज विश्व सभ्यता जिस जगह पर पहुँच चुकी है उसमें तो अब निर्णय का वक्त ही चुका है कि आप निर्माण चाहते हैं या विनाश, और ये भी तय है कि जिसका पलडा भारी होगा, आगे वही शक्ति विश्व संचालक शक्ति होगी इन सारे घटनाक्रमों में एक बात तो बहुत ही अच्छी और सकारात्मक है कि आतंक और विध्वंस के पक्षधर चाहे कितनी ही कोशिशें कर लें मगर एक आम आदमी को अपने पक्ष में अपनी सोच के साथ वे निश्चित ही नहीं मिला पायेंगे। और यही इंसानियत की जीत होगी। अगले युग के लिए शुभकामनायें......

शनिवार, 27 दिसंबर 2008

पप्पू कांट फाइट साला

पप्पू कांट फाइट साला :-
जी अब तो चारों तरफ़ यही चर्चा जोरों से चल रही है , देश विदेश , स्वदेश , परदेश, दिल्ली लन्दन तक में हमारे पप्पुपने की और पप्पू के फाइट नहीं कर पाने की ही बातें चल रही हैं। सुना तो ये भी है की इस साल के अंत में जो , लोगों ने पार्टी वैगेढ़ के लिए प्लानिंग कर राखी है तो वे सोच रहे हैं की सरकार से कहें की थोड़ी देर के लिए अपने बोफोर्स तोप और सुखोई जहाज भाड़े पर ही दे दें ताकि कम से कम उससे कुछ काम तो लिया जा सके।

अजी दूसरों की क्या कहें, ख़ुद अपने लोग ही कई तरह के जुमले , फिकरे कसने लगे हैं। कल ही कुछ ब्लू लाइन बसों ( यहाँ दिल्ली से बाहर के पाठकों को बता दूँ की दिल्ली परिवहन व्यवस्था में ब्लू लाइन बसें बिल्कुल लाईफ लाइन, अरे नहीं डेड लाइन की तरह हैं ) के चालाक आपस में बातें कर रहे थे, बताओ यार पता नहीं लदी से क्यों डर रहे हैं, जबकि आधे पाकिस्तान को तो हम ही कुचल कर मार सकते हैं, हमने अब तक अपने लोगों का शिकार किया है तो क्या दुश्मनों का नहीं कर सकते ? सुना है की कुछ किन्नरों को भी इस बात का गुस्सा है की जब पूरे देश का चरित्र किन्नर जैसा ही है तो फ़िर आज tअक उनकी उपेक्षा क्यों की गयी, वैसे उन्होंने भी कहा है की हमें ही बॉर्डर पर भेज दो ताली मार मार कर सबको भगा देंगे। और तो और सब कह रहे हैं की हाल फिलहाल में प्रर्दशित हुई पिक्चर गजनी में अपने परफेक्ट खान की बोदी देख कर दो बातें बिल्कुल स्पष्ट हैं पहली ये की कम से कम एक आध पाकिस्तानी पलटन को तो वे १५ मिनट वाली याददाश्त में निपटा ही देंगे, और दूसरी ये की जिस तरह से हमारे लोग कुछ ही दिनों में चार, छ, और आठ पैक वाली बोडी तैयार कर रहे हैं उसे देख कर पाकिस्तान को अक्ल आ ही जानी चाहिए।
इस मुद्दे से ही सम्बंधित एक और बात सुनने में आ रही है एक मशहूर सेना के सेनापति ने राज खोलते हुए बताया की , जी हमें तो इस लड़ाई वैगेरेह के पचडे में नहीं पढ़ना, हमारी सेना तो सिर्फ़ देश वासियों को उनकी भाषा और जगह के हिसाब से ठिकाने लगाती है, महाराष्ट्र की नाम से तो हम मार काट कर सकते हैं मगर राष्ट्र के नाम से नहीं।
खैर फिलहाल तो स्थिति यही है की हम पप्पू बने हुए हैं, वैसे जहाँ तक मेरा अपना विचार है की वर्तमान में जो भी परिस्थियां हैं उसमें भारत जैसे देश को जो निरंतर विकास की राह पर बढ़ रहा है उसे युद्ध से यथासंभव बचना ही चाहिए, मगर सर बचना, डरना नहीं। आज दोनों देश परमाणु संपन्न हैं, और फ़िर जो लोग भारत को अमरीका बनने की सलाह दे रहे हैं, वो शायद भूल रहे हैं की अफगानिस्तान और इराक़ का मामला अमरीका को कहाँ और कितना भारी पड़ रहा है, राजनितिक, सामजिक और आर्थिक रूप से भी। मुझे तो लगता है की पाकिस्तान जैसा देश कभी नहीं चाहेगा की भारत जैसा उसका पड़ोसी धीरे धीरे विकसित होकर विश्व शक्ति बन जाए। मगर इस सारे घटनाक्रम में जो बात मुझे कतई पसंद नहीं आ रही है वो है चीन , अमेरिका और लन्दन आदि के सामने अपने दुखडा रोने वाली बात। एक अन्तिम सच ये की युद्ध से कोई मसला हल नहीं होता, मगर उससे बड़ा सच ये की यदि कायरता और लड़ाई में से किसी एक चुनना है तो फ़िर बन्दूक जिंदाबाद.

शुक्रवार, 26 दिसंबर 2008

तन्हाइयां बोलती हैं

अभी मन और मष्तिष्क ने रफ़्तार नहीं पकडी है, सो फ़िर कुछ हल्का फुल्का :-

दीवारों-दर से उतर के परछइयां बोलती हैं,
कोई नहीं बोलता जब तन्हाइयां बोलती हैं

परदेश के रास्तों, रुकते कहाँ मुसाफिर,
हर पेड़ कहता है किस्सा, कुस्स्वाईयाँ बोलती हैं

मौसम कहाँ मानता है तहजीब की बंदिशों को,
जिस्म से बाहर निकल के अंगडाइयां बोलती हैं

सुनने की मोहलत मिले तो आवाज हैं पत्थरों में,
गुजरी हुई बस्तियों में आबादियाँ बोलती हैं

कहीं बहुत पहले पढा था, अफ़सोस की लेखक का नाम याद नहीं, मगर उन्हें पूरी श्रद्धा के साथ नमन.

तन्हाइयां बोलती हैं

अभी मन और मष्तिष्क ने रफ़्तार नहीं पकडी है, सो फ़िर कुछ हल्का फुल्का :-

दीवारों-दर से उतर के परछइयां बोलती हैं,
कोई नहीं बोलता जब तन्हाइयां बोलती हैं

परदेश के रास्तों, रुकते कहाँ मुसाफिर,
हर पेड़ कहता है किस्सा, कुस्स्वाईयाँ बोलती हैं

मौसम कहाँ मानता है तहजीब की बंदिशों को,
जिस्म से बाहर निकल के अंगडाइयां बोलती हैं

सुनने की मोहलत मिले तो आवाज हैं पत्थरों में,
गुजरी हुई बस्तियों में आबादियाँ बोलती हैं

कहीं बहुत पहले पढा था, अफ़सोस की लेखक का नाम याद नहीं, मगर उन्हें पूरी श्रद्धा के साथ नमन.

जूते जूते पर लिखा है खाने वाले का नाम

जूते जूते पर लिखा है खाने वाले का नाम :-
जी हाँ, गया वो ज़माना जब ये कहावत चलती थी की दाने दाने पर लिखा है खाने वाले का नाम, और हो भी क्यों न, जब विश्व का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति भी जूते खाने लगे तो यही कहावत तो चलन में आयेगा। और फ़िर ये बात तो ख़ुद बुश साहब ने ही बताई है, क्या कहा आप नहीं जानते, लीजिये ये खाकसार बताता है न। दरअसल हाल ही में बुश साहब ने एक पत्रकार वार्ता की, अरे वो जूतों वाली ऐतिहासिक वार्ता के बाद, इस बार उन्होंने ये वार्ता जूते प्रूफ़ केबिन ( पिछली वार्ता के बाद उन्हें लग गया था की बुल्लेट प्रूफ़ से ज्यादा उन्हें जूते प्रूफ़ केबिन की जरूरत है ) , में की थी और एहतियात के तौर पर सबको नंगे पाँव आने को कहा गया था। आप सोच रहे होंगे इस बात की ख़बर कहीं भी नहीं देखी, अरे आप देखेंगे कैसे, जब सबे तेज से लेकर सबसे धीरे चैनल तक वाले हमसे ही फुटेज की भीख मांग रहे हैं, खैर।
बुश साहब ने आते ही पत्रकारों से शिकायत शुरू कर दी, ये क्या भाई, आप लोगों तो उस घटना को इस तरह से देखा और दिखाया की जैसे ये yugon में एक बार ghatne वाले big बैंग की घटना हो। आप लोगों ने न तो उस वार्ता के विषय, न ही मेरे विचार, न ही मेरी इराक़ यात्रा , के बारे में कुछ लिखा , आप सब तो बस जूते के पीछे पड़ गए। आप लोगों ने जूते का रंग, उसका वजन, उसका नंबर, फैंकने का एंगल, आदि पर इतना सब कुछ पेश किया, मेरी काबिलियत, जिससे मैं एक नहीं बल्कि दोनों यानि पोर जोड़ी जूते के निशाने में आने से ख़ुद को बचा गया, इस बारे में कहीं कुछ नहीं लिखा , यार मेरा भी कुछ टैलेंट है या नहीं। मैं तो इतना तैयार था की यदि उस दिन सभी पत्रकार अपने फूटे चप्पल खींच कर मारते तो भी मैं निशाने में आने से बच जाता।
वैसे भी किसी के कुछ करने से कुछ नहीं होता, क्योंकि मैंने कहीं सुना पढ़ा था की , जूते जूते पर लिखा है खाने वाले का नाम, और न तो उस जूते पर जोर्ज लिखा था न ही बुश ।

अंकल , पाकिस्तान से आप कहो :-
देखिये हम कितने अमन पसंद, सहनशील और प्यारे लोग हैं, इतना कुछ हो जाता है हमारे साथ और होता ही रहता है। लेकिन वह रे हम, चुपचाप सब कुछ बर्दाश्त करते हुए पूरे विश्व समुदाय के सामने अपनी हालत की जानकारी रखते हैं, बेशक वे कुछ न करें, कुछ भी न देख्जें सुने, मगर हम तो अपनी कोशिश करते हैं न। पहले हमने अपने बड़े अंकल अमेरिका को कहा की देखो अंकल आपके होने के बावजूद ये पकिस्तान हमारे साथ यही करता आ रहा है, मानता ही नहीं। हमने देखा की पाकिस्तान पर तो अमेरिका अंकल के ओहदे और पावर का कोई फर्क ही नहीं पड़ रहा, हम कहाँ मानने वाले थे, हमने बिना देरी किया, फटाक से चीन अंकल से भी शिकायत कर दी। और हम पाकिस्तान को साफ़ बता देते हैं , की हम भी हारने वाले नहीं हैं, अम्रीका से लेकर, चीन, फ्रांस, गरमानी, इंग्लैंड, पोलैंड, बरमूडा, चेकोस्लोवाकिया, और कीनिया तक से आपकी शिकायत कर देंगे, फ़िर सबको कहेंगे की सब आपसे कुट्टी कर दें, क्यों मनमोहन जी हम यही करेंगे न ?

बहन जी सत्यानाशी पार्टी ( पा ) ने नरबली दी :-
क्या कोई सोच सकता है की आज के दौर में जब हम चाँद सूरज को छूने को तैयार हैं, ऐसे में भी एक महँ राजनितिक दल ने अपने नेता के जन्मदिन के अवसर पर नर बलि की तैयारी की और उसके एक सेनानी ने ; बहादुरी से पुरे अस्त्र शाश्त्रों के साथ एक बुद्धिमान, काबिल इंसान की नरबली दी। दरसल जब नरबली के लिए विचार चल रहा था तो पहले सेनानी बोले की माता क्यों ने किसी ग्रामीण अनपढ़ की नरबली दे दें, माता जी ने कहा, नहीं अब हमरी पार्टी बेहद मजबूत और बहुत बड़ी हो गयी है, अब तो कौनो अफसर, कौनो डाक्टर, कौनो इंजिनियर की बलि दो तभी हमारा जन्मदिन सार्थक होगा। और देखिये कितना सार्थक रहा सब कुछ, इसी को तो बहुजन के लिए समाजवाद कहते हैं, हाथी मतवाला होता ही है जी.

गुरुवार, 25 दिसंबर 2008

बदले हैं अब दस्तूर ज़माने के

आज लगभग डेढ़ महीने बाद ब्लॉग पर लौटा हूँ, पिछले दिनों के लिए सिर्फ़ इतना की वे मेरी जिंदगी के कुछ बेहद कठिन दिनों में से कुछ दिन रहे, मन में कुछ भी नहीं हैं न ही मस्तिष्क में इसलिए कुछ हलकी फुलकी पंक्तियाँ आपको पढ़वाता हूँ जो मैंने कहीं बहुत पहले पढी थी, यदि मेरी याददाश्त ठीक है तो लेखिका का नाम था , सुश्री रीता यादव।:-

बदले हैं अब दस्तूर ज़माने के इस कदर,
अपना कोई बनना ही गंवारा नहीं करता

पागल भी नहीं लोग की माने नसीहत,
जो मान ले गलती वो दोबारा नहीं करता

अपने लिए तो जीते हैं , मरते हैं सभी लोग,
औरों के जख्म कोई दुलारा नहीं करता

जाते हैं बिखर आज, गुलिश्ते बहार के,
जिनको कोई माली भी संवारा नहीं करता

ऐसे तो मुकद्दर को कोई बदल सका,
फ़िर भी सिकंदर है , जो हारा नहीं करता

तूफानों से लड़ के जिन्हें मिल जाए किनारा,
वो ही कभी औरों को पुकारा नहीं करता

तारे भी तोड़ लाने का जो रखता है जिगर,
वो शख्स फटेहाल, गुजारा नहीं करता

बदले हैं अब दस्तूर ज़माने के

आज लगभग डेढ़ महीने बाद ब्लॉग पर लौटा हूँ, पिछले दिनों के लिए सिर्फ़ इतना की वे मेरी जिंदगी के कुछ बेहद कठिन दिनों में से कुछ दिन रहे, मन में कुछ भी नहीं हैं न ही मस्तिष्क में इसलिए कुछ हलकी फुलकी पंक्तियाँ आपको पढ़वाता हूँ जो मैंने कहीं बहुत पहले पढी थी, यदि मेरी याददाश्त ठीक है तो लेखिका का नाम था , सुश्री रीता यादव।:-

बदले हैं अब दस्तूर ज़माने के इस कदर,
अपना कोई बनना ही गंवारा नहीं करता

पागल भी नहीं लोग की माने नसीहत,
जो मान ले गलती वो दोबारा नहीं करता

अपने लिए तो जीते हैं , मरते हैं सभी लोग,
औरों के जख्म कोई दुलारा नहीं करता

जाते हैं बिखर आज, गुलिश्ते बहार के,
जिनको कोई माली भी संवारा नहीं करता

ऐसे तो मुकद्दर को कोई बदल सका,
फ़िर भी सिकंदर है , जो हारा नहीं करता

तूफानों से लड़ के जिन्हें मिल जाए किनारा,
वो ही कभी औरों को पुकारा नहीं करता

तारे भी तोड़ लाने का जो रखता है जिगर,
वो शख्स फटेहाल, गुजारा नहीं करता

साथ चलने वाले

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