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शुक्रवार, 31 दिसंबर 2010

अलविदा वर्ष २०१० , अब अगले साल से नए अड्डे पर मिला करेंगे ......अजय कुमार झा


जी हां आज जब इस ब्लॉग पर ये पोस्ट लिखने बैठा हूं तो समझ ही नहीं पा रहा हूं कि मन कैसा सा हो रहा है । नहीं इसलिए नहीं कि अब इस वर्ष की ब्लॉग की पढाई लिखाई और टिपाई भी तो हो गई ..अब चलें देखें कि अगले बरस क्या नया , और क्या पुराना ही नए चेहरे के साथ सामने आता है । हां फ़िलहाल जिस दौर से हिंदी ब्लॉगजगत गुज़र रहा है उम्मीद की जानी चाहिए कि आने वाला समय इस समय से जरूर ही बेहतर होगा । और देखिए न जिस तरह से जरूरत रास्ता खुद ब खुद बना लेती है । आज हिंदी ब्लॉगजगत के पास कोई भी ऐसा एग्रीगेटर नहीं है जो हिंदी ब्लॉग पोस्ट को अपने आप पाठकों के पास ले आए । मगर फ़िर भी पाठक पढ रहे हैं , और क्या खूब पढ रहे हैं कुछ भी आसामान्य नहीं लग रहा है । लेकिन जरूरी नहीं कि सबके साथ ही ऐसा हो लेकिन बहुत जल्दी ही आप इस समस्या से भी पार पा ही लेंगे या तो एग्रीगेटर्स पुन: आ जाएंगे , पुराने न सही नए ही सही ....या फ़िर बुरी से बुरी परिस्थितियों में क्या होगा ..आपको तलाश तलाश कर पढने की आदत लग जाएगी ।

इस बीच कई मित्रों के ब्लॉग्स के गायब होने की सूचनाएं भी आने लगीं , शुक्र ये था कि ये ज्यादा नहीं हुआ और बात आराम से संभल ही गई । मगर शायद होनी ने इसी समय के लिए ये तय कर रखा था कि मैं पिछले काफ़ी समय से टालते आ रहे एक काम को अब अंजाम तक पहुंचा दूं । जी हां मेरी निर्माणाधीन साईट पर अपने सभी ब्लॉग को ले जाने का तथा भविष्य में वही अड्डा जमाने का । बीच में सोने पर सुहागा ये हुआ कि , पाबला जी के दिल्ली प्रवास ने इस योजना को अमली जामा पहनाने में और भी त्वरित कर दिया । और फ़िर मेरे सभी हिंदी ब्लॉग पोस्टों को टिप्पणी समेत यहां पर पहुंचाने का काम शुरू हुआ । अगले कुछ दिन मुझे इन पोस्टों को कैटेगराईज़्ड करना था , जो अब तक चल ही रहा है । और इसके साथ ही अपनी पोस्टों को वहां न सिर्फ़ प्रकाशित करना था बल्कि पाठकों को वहां तक पहुंचाना भी । इस काम में मेरी मदद की मेरे सोशल नेटवर्किंग साईट ने जहां मैं इनकी
जानकारी देता रहा और अब भी दे रहा हूं इसके अलावा सभी एग्रीगेटर्स से इस साईट को जोडने का कार्य भी ।


ब्लॉगर से अपने डोमेन पर पहुंचने के पीछे कोई एक ही मकसद गिना दूं तो शायद ठीक नहीं होगा । दिमाग में नित नए पनपते विचारों ने ब्लॉग्स की संख्या एक दर्जन तक पहुंचा दी थी पहले ही , तिसपर दिक्कत ये कि अभी तो ये आधा भी नहीं हुआ था जितना मैंने सोचा था देने की । तो फ़िर ज्यादा सामग्री एक ही स्थान पर समेटने का इससे बेहतर और कोई उपाय मुझे नहीं दिखा । फ़िलहाल तो ब्लॉगिंग सैक्शन पर ही काम चल रहा है । इसके बाद अभी तक की योजना के अनुसार तो एक फ़ोटोग्राफ़ी सैक्शन जिसमें अपने द्वारा खींची गई फ़ोटोस लगाने का मौका मिलेगा , एक ऑनलाईन उपन्यास , जिसका एक पन्ना रोज़ पाठकों के लिए आएगा , एक पॉड्कास्टिंग सेक्शन , अपनी ही आवाज़ में अपनी ही पंक्तियां सुनवाऊंगा , विधि की जानकारियों के लिए एक पन्ना ....और जाने क्या क्या जो अभी नहीं सोच पाया हूं। तो ये तो लगभग तय है कि अब लेखन के लिए मैं इसी मंच का प्रयोग करूंगा । उम्मीद करता हूं कि जब वर्ष २०११ की आखिरी तारीख को जब मुड कर देखूंगा तो बहुत कुछ मिलेगा इसमें से मुझे भी ।

इसलिए सबसे पहले तो आप सबसे यही आग्रह करूंगा कि , मेरे इस नए पन्ने पर पहुंचे और उसके साथी (फ़ौलोवर ) बन कर अपनी अंतर्जालीय पसंद में स्थान देने की कृपा करें , ताकि कम से कम आप मुझे अपने डैशबोर्ड पर सीधे ही पा सकें ।फ़िलहाल तो इसी आग्रह के साथ यहां से विदा चाहता हूं कि , इस पगडंडी तक आने के बाद आप उस कच्चे रास्ते पर चले ही आएंगे ..आएंगे न ??


आप सबको नव वर्ष के शुभआगमन पर बहुत बहुत शुभकामनाएं ।

सोमवार, 20 दिसंबर 2010

ब्लॉगवाणी के नाम .. एक लव लेटर...झा जी की तरफ़ से



हां पूछने वाला पहला सवाल तो यही करेगा कि ब्लॉगवाणी के नाम लव लेटर ..क्यों भाई ..आखिर लव लेटर ही क्यों और वो भी किस हैसियत से । कमाल है अब ये भी आपको बताना पडेगा क्या ..कमाल है ब्लॉगर हैं तो खुद बखुद समझिए न कि ...एक पोस्ट माशूका है तो पाठक उसका आशिक और इन दोनों को एक साथ मिलाने वाले को दिल खोल कर लव लेटर न लिखा जाए तो क्या लिखा जाए । तो इसी हैसियत से ..। खैर सबसे पहले तो उनके लिए कुछ बातें , जिनके लिए ये लव लेटर लिख रहा हूं ।

प्रिय सिरिल जी एवं मैथिली जी ,आप लोगों को कभी नहीं देखा , कभी मिला भी नहीं , मगर मुझ सहित हर ब्लॉगर जिसे ब्लॉगवाणी ने अपने अंक में समेटे रखा , सजाए रखा उसने यकीनन मेरी तरह ही कभी न कभी ये जरूर महसूस किया होगा कि ..यार यदि अंतर्जाल पर ये पन्ना न होता तो फ़िर होमपेज किसे बना कर रखते । और दीवानगी तो देखिए हमारे जैसों कि अब तक मोस्ट व्हयूड पेज में भी रोज ब्लॉगवाणी ही दिखाता है ..और अब तो ये कुछ कुछ उस तरह का नौस्टेलियाजिक सा लगता है जैसा ..बरसों पहले सुन कर होता था ...ये आकाशवाणी है अब आप देवकी नंदन पांडे से समाचार सुनिए । और मुझे तो अब भी लगता है कभी कभी कि , किसी दिन सुबह अचानक जब मैं रोज की आदत के अनुसार ब्लॉगवाणी का पन्ना खोलूंगा तो ...सीता की दुविधा खत्म हो चुकी होगी ...। माना कि सीता ने त्रेता, द्वापर , से होते हुए कलियुग तक का जीवन जी ही लिया इस दुविधा में ही रहते हुए ..खैर विषयांतर नहीं करूंगा ।

मैं कह रहा था कि आज जब आप ये पत्र पढें, तो बस इतनी सी कृपा जरूर करें कि इसे एक ब्लॉगर बन कर पढें , संकलक बन कर नहीं । मुझे पूरा यकीन है कि बात ठीक ठीक आप तक पहुंच जाएगी । तो सुनिए , हिंदी ब्लॉगिंग के , हिंदी के ब्लॉगर्स से , उनकी मानसिकता से , उनकी हरकतों से ...और जितने भी ...से हैं उन सभी से आपसे बेहतर भलीभांति परिचित हैं ही .....वो तो हम पाठक ही पसंद नापसंद , हॉट कूल आदि का खेल खेलने के बावजूद पर्दे में रह जाते थे ..मगर पर्दे के पीछे से आप तो उस हमाम को देख ही रहे थे न ..तो यदि आज मैं या कोई और या और भी बहुत सारे और ....एक एक करके ब्लॉगवाणी को याद कर रहे हैं तो सिर्फ़ इसलिए कि आज बहुत से ब्लॉग्स ने अपने ड्राफ़्ट में एक सुसाईड नोट लिखे बैठे हैं ..जो धीरे धीरे अपने आप पब्लिश भी होते जा रहे हैं ...हालांकि उन्हें उम्मीद रहती है कि ..शायद कोई पत्र तो दिख जाएगा ब्लॉगवाणी पर और सब दोस्त आकर उसे बचा लेंगे खुदकुशी से । अब पाठक ही न पढेंगे पोस्टों को तो फ़िर ..इन बातों को उकेरने का फ़ायदा ही क्या ??? वैसे भी कोई कमाने धमाने तो आया नहीं हिंदी ब्लॉग्गिंग में ..जो कुछ कमा गया वो बस टिप्पणियां ही थीं और अब भी हैं ।

तो मैं कह रहा था कि इस सबके बावजूद ..आप आ जाईये , । न न न न ...बिल्कुल नहीं मैं कुछ बातें अभी ही स्पष्ट कर दूं कि मैं ये बिल्कुल भी नहीं कहूंगा कि इस बार आप जब वापस आएंगे तो सब कुछ बदल चुका होगा ......अजी लानत है जो कुत्ते की पूंछ और ब्लॉग्गर की उंगली करने वाली आदत ..बरसों बाद भी सीधी मिले ..तो आप बिल्कुल तैयार होकर आईये इस बात के लिए ..कि कुछ ज्ञानी लोग जिन्होंने इस बीच शायद कोई और पोस्ट नहीं लिखी होगी वे आपके आते ही अपना दिव्य ज्ञान पधारने आ जाएं ..तो आप अब बस ये करिएगा कि ..वो जो आपका ब्लॉगवाणी वाला ब्लॉग है न उस पर लिख कर हमारे हवाले कर दीजीएगा ..और फ़िर भी बात न बने तो सीधा गेट आऊट वाला रास्ता है ही । अब रही दूसरी बात ....तो सबको मालूम है कि न तो किसी धनाभाव के कारण ये बंद हुआ था न ही आगे अब ऐसी कोई समस्या है ...और वैसे भी यदि होती भी न तो मैं पहले ही बता दे रहा हूं कि ..बेशक आज एक मिनट को सब के सब ..वो मेज थपथपा के पास होता है न कोई विधेयक ..एकदम उसी स्टाईल में हां के साथ एक हां फ़्री सेवा चला रहे हों ...मगर जल्दी ही रोना गाना शुरू हो जाएगा ..फ़लान बताईये ..ढिमकाना हिसाब दीजीए ..अरे होता है महाराज तो इसलिए पैसा लेकर एंट्री देने ब्लॉग शामिल करने टाईप की योजना पर तो आप खुदे फ़ैसला करिएगा ..मगर आ जाईये ..फ़ौरन से पेश्तर आ ही जाईये ।

चलिए अब चलते चलते एक बात झाजी स्टाईल वाली भी बता ही दूं आपको ..देखिए मान जाईये आप ..वर्ना ऐसा न हो कि हम दिल्ली ब्लॉगर्स की मंडली सीधा आपको जादू की झप्पी देने पहुंच जाए ...हा हा हा फ़िर न कहिएगा कि ...पंगा ले लिया ....

शनिवार, 11 दिसंबर 2010

दिल्ली ब्लॉगर्स करेंगे धमाल ...वो भी इसी वर्षांत पर .....कैसे .....jha ji end note



जी हां , अब तो मुझे लगने लगा है कि पिछले कुछ वर्षों से वर्षांत पर यकायक ब्लॉगर मिलनों की जो सिलसिला सा बनता जा रहा है वो अब धीरे धीरे एक परंपरा का रूप लेता जा रहा है । मित्र ब्लॉगर्स के आने के बहाने , तो कभी किसी और बहाने से मिलने मिलाने का दौर शुरू होता है तो फ़िर बस यादों की धरोहर का ऐसा खजाना जुडता है हिंदी अतंरजाल पर कि इसका आकर्षण तो भविष्य में आने वाले ब्लॉगर ही भली भांति समझेंगे । बस कल्पना कीजीए कि आज से दस साल बाद यानि सन दो हजार बीस में ..हमारे नए ब्लॉगर्स की पूरी ऐसी ही या इससे बहुत बडी मंडली किसी ब्लॉगर मिलन की चर्चा करते दिखेंगे और लिखेंगे कि देखिए आज से दस साल पहले भी ऐसी ही ब्लॉग बैठक आयोजित की गई थी तो सोचिए ..बस एक बार कल्पना करके देखिए कि कैसा अनुभव करेंगे आज के सभी मित्र ..है न दिलचस्प ।

तो चलिए सबसे पहले तो आपको ये बता दूं कि इसी सप्ताहांत पर दिल्ली ब्लॉगर फ़िर आपस में मिल बैठने वाले हैं .....हा हा हा जी हां इतने झमेले बवेले के बावजूद ...अब दिल तो दिल है सरकार ..जो अड गया दीदारे यार को तो फ़िर कहां मानता है बंदिशें और तोहमतों की फ़िक्र भी नहीं करता । अभी दिन और समय न ही स्थान कुछ भी तय नहीं हो पाया है ....बहुत सारे जुगाड भिडा कर कोशिश की जा रही है कि कम से कम जगह तो फ़ोकट की मिल ही जाए ...अन्य भत्ते तो वहां यूं ही निपटा लिए जाएंगे ....लेकिन बहुत जल्दी ही ये बता दिया जाएगा ...तो वहां पर एक ब्लॉग बैठकी का आयोजन होगा और हां विमर्श से लेकर बतकुच्चन तक के लिए पर्याप्त समय भी रहेगा सुबह ग्यारह बजे से शाम चार बजे तक का । खूब बैठे के बोल बतिया करेंगे ....और खींचेंगे ढेर सारी यादें सहेजने के लिए ।

अब दूसरी बात ...मैंने कई स्तरों पर ये प्रयास शुरू कर दिए हैं कि अगले वर्ष दिल्ली के विभिन्न विद्यालयों , और कॉलेजों में जाकर हिंदी ब्लॉगर्स की टीम बच्चों युवाओं को हिंदी ब्लॉगिंग के बारे में न सिर्फ़ बताएंगे बल्कि ज्यादा से ज्यादा ब्लॉगर्स बनें ये प्रयास करेंगे ...होगा क्या ....अजी सोचिए न जब ये पंद्रह हजार लोगों का स्वर पंद्रह लाख के रूप में उभर कर निकलेगा ...होगा जी ..यकीनन होगा । अभी तक के प्रयासों के प्रस्तावों पर जो प्रतिक्रिया मुझे मिली है मुझे लगता है कि प्रयास यकीनन परिणामदायक निकलेगा ।


अब एक और खबर भी सुन ही लीजीए , इस साल आप एग्रीगेटर को ढूंढते रहे , जबकि अमूमन तौर पर अन्य भाषाओं में एग्रीगेटर्स खुद ब्लॉगर्स को ढूंढते हैं एक अकेली हिंदी ब्लॉगिगं ही ऐसी है जिसमें ब्लॉगर्स एग्रीगेटर ढूंढते नज़र आते हैं । लेकिन कोई बात नहीं अगले साल, यदि मेरा अनुमान गलत नहीं तो हिंदी ब्लॉग पाठकों के लिए अगले साल कम से कम पांच नए , बढिया , तेज , नए तेवरों और शैली वाले एग्रीगेटर्स उपस्थित होंगे और स्थापित भी हो जाएंगे । चर्चाओं की रफ़्तार बढेगी और कई और प्रयोग अभी आपके सामने आएंगे । एक तो नए मौलिक और सिर्फ़ ब्लॉग खबरों पर आधारित ब्लॉग आपके बीच आएंगे जिनमें से एक मैं खुद लाऊंगा और नाम होगा ," ब्लॉगर बोला ब्लॉग से "। चलिए फ़िलहाल इतना ही । अगली पोस्ट में मैं ये बांटने की कोशिश करूंगा कि झा जी ने कैसा देखा हिंदी ब्लॉग्गिंग का २०१० ???

रविवार, 5 दिसंबर 2010

कुछ भी कभी भी ..पर छ: सौ पोस्टों का सफ़र पूरा ...कुल दर्जन ब्लॉग ..लगभग सोलह सौ पोस्टें ..तीन सौ पचास फ़ौलोवर्स ...हा हा हा कोई कहता है कि मैं ब्लॉग्गिंग का दीवाना हूं तो कहता रहे ...jha ji ..a report ca





आज अचानक देखा तो पाया कि डैशबोर्ड पर कुछ भी कभी भी कि छ: सौ पोस्टों का आंकडा दिखा रहा था ,हालांकि अभी तो जाने कितनी ही ड्राफ़्ट का चादर ओढे दुबकी बैठी हैं । यूं तो मुझे इन आंकडों ने कभी न तो आकर्षित ही किया न ही मेरा ध्यान बंटा पाए हैं , मगर आज अचानक डैशबोर्ड पर एक साथ ...ठेले पर पडे एक दर्जन केले के गुच्छे की तरह अपने ब्लॉग्स भी दिख गए । आम तौर पर मैं सीधे नीचे पहुंच कर नई पोस्टों की जानकारी लेता हूं , उन्हें देखता पढता हूं ..पहले ही बता चुका हूं कि लगभग छ: सौ ब्लॉग्स को फ़ौलो करने के कारण एक छोटा मोटा एग्रीगेटर तो मेरा डैशबोर्ड ही है । तो देखा तो ये पाया जो आपको ऊपर शीर्षक में बताया है ।

मैं जब किसी से मिलता हूं , और अब तो ये न सिर्फ़ ब्लॉग मित्रों के साथ मुलाकात पर बल्कि तो अब मीडिया मित्र और साथ के सहकर्मी तक मेरी बातों के होने के कारण सभी कहने लगे हैं कि ..यार झाजी आप तो लगता है कि हिंदी ब्लॉग्गिंग के दीवाने हो । और एक बेसाख्ता मुस्कुराहट मेरे अंदर जन्म लेती है और दिल सोचता है ..क्या बात है झाजी ..घर से बाहर भी वही बात ...तो हैं तो हैं ..। जी हां ब्लॉग्गिंग के दीवाने हैं हम तो । और इसके बाद पूछने का मन करता है ..वही उसी स्टाईल में ..कोई शक ..??


अपने पिछले तीन सालों के ब्लॉग सफ़र को देखता हूं तो लगता है कि अब तो इतने दिलचस्प किस्से रोज बनते बिगडते से दिख रहे हैं कि बहुत जल्दी ही मुझे शायद "blogobiography " न शुरू करनी पड जाए ......हा हा हा ये तो गोया एक और ब्लॉग की तैयारी कर ली झाजी ने ..आप यही सोचेंगे न ..। इस आभासी दुनिया में लाने का श्रेय भी आभासी ही रहा ...जी हां कादम्बिनी के एक अंक संभवत : सितंबर २००७ का था , ने ही हमें हिंदी ब्लॉगिंग से हमारा परिचय करवाया । और क्या दिन थे वे भी चिट्ठाजगत पर कुल चिट्ठों की संख्या पांच सौ भी नहीं थी , और वो कैफ़े में बैठ कर ब्लॉगिंग करना ,, सिर्फ़ लिखना भर ही आता था और कुछ भी नहीं । खैर अब तो ये सफ़र दिनों दिन हजारों लाखों किलोमीटर स्नेह और ज्ञान के माईलस्टोन को छू लेता है । अब तो लगता है कि उफ़्फ़ दिन में चौबीस ही घंटे होते हैं उसमें भी नहाने , खाने , और इन जैसे कई गैरजरूरी कार्यों को करते हुए एक नुकसान ये है कि आप ब्लॉगिंग नहीं कर पाते । पहले छुट्टियों का इंतज़ार उतनी शिद्दत से कहां रहता था , जितना कि अब रहने लगा है । पहले लिखना पढना उतना दिलचस्प कहां होता था लगता था जितना अब लगने लगा है ।

और सच कहूं तो पहले वो शहर अनजाने से लगते थे जिनका नाम सुनते ही अब जो पहली बात जेहन में आती है वो ये होती है कि , ओह यहां तो वो रहते हैं न ब्लॉगर , जिनका ब्लॉग है .......। है न कमाल ब्लॉग्गिंग का । ब्लॉगिंग को लेकर जब कोई सवाल पूछता है या ये जानने की कोशिश करता है कि , ब्लॉग्गिंग को लेकर मेरे मन में क्या चल रहा है तो मैं उससे यही कहना चाहता हूं कि , मैं चाहता हूं बल्कि कहूं कि जानता हूं कि आने वाले समय में सबके ब्लॉग्स पर टिप्पणी आएगी ..मैं फ़लाना राज्य का मुख्यमंत्रा लिख रहा हूं आपने बहुत सुंदर लिखा है मेरे प्रांत के विषय में बहुत अच्छा लिखा है ...या कि सलमान शाहरूख और अमिताभ बच्चन की टिप्पणी आती है ..आप हमारी फ़लाना पोस्ट भी पढें और आने वाली पिक्चर भी देखिए न । हां मानता हूं कि अभी ये दूर की कौडी है , मगर दिल तो चाहता है कि और मानता भी है कि ये होगा तो जरूर बेशक हमारे जाने के बाद ही हो । एफ़ एम रेडियो पर जिक्र होगा कि आज फ़लाना ब्लॉग पर ये लिखा गया और जिस पर ये दिलचस्प टिप्पणी की गई ...ब्लॉग का पता है .......फ़लाना फ़लाना । वाह वाह क्या ख्यालात है ..क्या सपना है ..।

अब जहां तक मेरी अपनी बात है तो अपना क्या कहूं ...सुना है , देखा है और जाने कितने ही सर्वेक्षणों में भी देखा है कि ब्लॉग्गिंग आपकी कायापलट कर सकता है ..हां कर तो सकता है ..देखिए अब हमारी खुद ही काया कैसे पलटती जा रही है ..सच कहें तो ब्लॉगिंग तो खुद के साथ साथ हमें भी जवान किए जा रही है भाई ...









मंगलवार, 30 नवंबर 2010

जब हनुमान जी घर मेरे आए ....पंजाब यात्रा संस्मरण -५..jha ji on ride










इससे पहले आप मेरी पंजाब यात्रा में इन पोस्टों पर पढ चुके हैं कि मैं कहां कहां कैसे कैसे घूमा । आज मैं आपको मिलवाता हूं हनुमान जी से ..अरे नहीं नहीं यूं तो भारत में हनुमान जी से मुलाकात ..अपने किसी परिचित अंजाने से मुलाकात से ज्यादा आसान है ...क्योंकि उसके लिए आपको किसी फ़्लैट नंबर , किसी ब्लॉक नंबर , किसी गली आदि की पहचान की जरूरत नहीं है ..हर जगह से समान रूप से अवेलेबल हैं ..। खैर हम , तो आज आपको मिलवा रहे हैं साक्षात हनुमान जी से । जी हां पंजाब होशियारपुर में दशहरे की एक प्रचलित प्रथा । पंजाब के होशियारपुर में प्रचलित रिवाज़ के अनुसार ..उन दस दिनों में शहर में मौजूद कम से कम चालीस हनुमान दल ..आम लोगों के ..अपने भक्तों के घर जाते हैं ..वहां कीर्तन भजन करते हैं और फ़िर सबको आशीष देते हुए चले जाते हैं फ़िर अगले बरस आने के लिए । और हां ये हनुमान दल कोई आम कीर्तन दल की तरह नहीं होता है । इसमें हनुमान बने युवक को चालीस दिनों तक कठिन उपवास रखने के अलावा एक बहुत लंबा और बहुत ही भारी मुकुट पहनना होता है तथा पूरे श्रद्धा और विश्वास से भक्ति में लीन रहना होता है । और फ़िर शिव जी की बारात की तरह तमाम गण उपगणों के साथ हनुमान जी का दल भक्तों के घरों में जाते हैं । इसके लिए बाकायदा हनुमान जी को अपने घर पर आमंत्रित करना होता है । तो ऐसे ही एक हनुमान जी से मिले हम अपने साढूं साहब के घर पर ..आप भी मिलिए



सबसे पहले घर को अच्छी तरह से झाड पोंछ कर स्वच्छ किया जाता है , उसके बाद कीर्तन की तैयारी होती है ...देखिए बुलबुल को कीर्तन स्थल पर धमाचौकडी करते हुए


और फ़िर कीर्तन के लिए जुटे आस पडोस के लोग

कीर्तन जम रहा है ...........



और ये पहुंचा हनुमान दल , खूब ढोल नगाडे बजाते हुए


स्वागत की तैयारी भक्त के घर द्वार पर


लीजीए हनुमान दल तो आ ही पहुंचा नजदीक


और ये एक बाल हनुमान का रूप धरे हुए बच्चा


अपनी कला का प्रदर्शन करता हुए दल के युवक


और देखिए ..

और ये लंबे मुकुटधारी हनुमान जी भी आ पहुंचे



घर के अंदर विश्राम करते हुए हनुमान जी और दल कीर्तन करता हुआ


सब हनुमान जी से आशीष लेते हुए ...


शुक्रवार, 26 नवंबर 2010

अब जरा ये भी पढ ही डालिए कि रोहतक तिलियार ब्लॉगर्स बैठक में हुआ क्या था .....a last report by ...jha ji ...







वैसे तो रोहतक तिलियार की ब्लॉगर बैठक के बारे में , उस दिन ब्लॉग बैठक में हुई बातचीत , विमर्श के अलावा बांकी सब कुछ आप पढ ही चुके हैं , अरे बल्कि इतना पढ चुके हैं कि ...बस एक पेशेवर ब्लॉगर ही इतना झेल सकता है ..वरना टहलुआ ब्लॉगर तो दूर से ही बिदक के निकल लिया होगा ...ये सोच कर अबे छोडो ..तिलियार झील का नाम सुन के तो अब आत्महत्या करने को कर रहा है ...खैर ये उनकी राय हो सकती है । मगर मुझे लगा कि इस ब्लॉग बैठक की सभी रिपोर्टों को अब तक पाठकों को वो सब पता चल गया जो कि सुबह ११ बजे से पहले और शाम चार बजे के बाद हुआ था , मगर बीच में ब्लॉगर क्या कहते सुनते रहे ये नहीं पता चल पाया है तो इसके बावजूद कि ब्लॉगर बैठक की एक और रिपोर्ट ...उफ़्फ़्फ़्फ़्फ़ नहींईईईईईई ....लीजीए पढ जाईये । लेकिन एक बात बताईये ...ब्लॉगर ब्लॉग की बात नहीं करेगा तो दूसरा उसकी बात कैसे करेगा और जब ब्लॉगर ..ब्लॉग की बात करेगा तो ब्लॉगर बैठक की बात भी करेगा और जब ब्लॉगर बैठक की बात करेगा तो रिपोर्ट तो लिखनी ही पडेगी न ..



जहां तक मुझे याद है कि उस दिन जब हम वहां पहुंचे तो भाई ललित शर्मा जी ने , अंतर सोहिल जी ने , नीरज जाट जी और अन्य मित्रों ने बडी ही गर्मजोशी से हमारा स्वागत किया और हम बढ चले इस सेमिनार हॉल की तरफ़ .
..बताईये किसी ने बताया दिखाया आपको कि सेमिनार हॉल में ही ब्लॉगर बैठक हुई थी , इसके बाहर जो भी हुआ वो कम से कम किसी ब्लॉगर बैठक का हिस्सा नहीं था , क्योंकि मुझे याद है कि खुद कम से कम तीन बार ...लघुशंका हेतु बाहर गया था ..और मेरे ख्याल से शायद डॉ प्रवीण जी मुझे वहां दिखे थे ...। तो सेमिनार हॉल में हमें राज भाटिया जी , डॉ अकेला , और अन्य मित्रगण बैठे मिले , सभी ब्लॉगर मित्रगण एक दूसरे को अपना नाम बता कर आभासी रिश्ते को महसूस कर रहे थे ।

रास्ते में ही हमें सूचना मिल चुकी थी कि भाई राजीव तनेजा जी भाभी संजू तनेजा जी , प्रख्यात ज्योतिषविद ब्लॉगर संगीता पुरी जी और ब्लॉग जगत पर अपने स्नेह की छाया बिखेरती निर्मला कपिला जी बस पहुंचने वाले हैं और भाई अलबेला जी हवा में टंग के उतरने के बाद रास्ते में कहीं टंगे पडे हैं । सबसे पहले शाहनवाज भाई ने लपक कर लैपटॉप के अंदर करंट छोड दिया ताकि वो फ़ौरन उर्जावान हो जाए । और खुशदीप भाई जो कार से उतरते हुए आस्तीन समेटी थी उसका कारण मुझे तब समझ में आया जब खुशदीप भाई ने लैपटॉप की आत्मा को बस पलक भर के लपलपाते देखा कि फ़ट से जम गए और कहा कि यार ये टाईपिंग करते हुए ये आस्तीनें बहुत तंग करती हैं ....और बस वो पहली वाली रिपोर्ट तो याद है न ..नुक्कड पे अरे इस पोस्ट के साथ एक और मजेदार बात हुई थी ...पहला कमेंट करने के लिए निर्मला कपिला जी को पकडा दिया गया ..अब चूंको खुशदीप भाई ऑलरेडी लॉगिन थे इसलिए ..जब वो टिप्पणी छपी तो लिखा हुआ या ...बेटा ये ब्लॉग बैठक ...और ऐसा ही कुछ ...टिप्पणीकार कौन ...खुद भाई खुशदीप ...हा हा हा हा हा । बस फ़ौरन से पेशतर खुशदीप भाई ने लैपटॉप लिया ..और देशनामा को गोद में ही लिए रहे ..पूरे ब्लॉग बैठक के दौरान ।

मगर एक और खूबसूरत बात उन्होंने ये की कि , किस ब्लॉगर ने क्या कहा ये लिखने नोट करने की जगह उसे टाईप करना शुरू कर दिया ..अजी छोडिए छोडिए ..कोई ब्लॉग सेवा नहीं चल रही थी ...ये थी वो दूसरी पोस्ट ...खुशदीप भाई के देशनामा पर ।


सबसे पहले बैठे हुए थे डॉ अकेला , जिन्होंने बताया कि उनका ब्लॉग सफ़र अभी उतना लंबा नहीं है और जो कुछ उन्होंने लिखा था अब तक वो अनछुआ सा है और अब जाकर वे उसे दोबारा हमारे बीच ले कर आएंगे । इसी बीच उधर से खुशदीप भाई ने सबके लिए एक एक शर्त रख दी कि सबको अपनी एक कमजोरी भी बतानी होगी .मैं सोच रहा था कि यदि ..किसी ने जानना चाहा कि क्या उन्हें छापा जाएगा .....तो मैं फ़ौरन ही कहूंगा ..अमां कमाल है यार ....वे तो हाईलायटेड स्टफ़ होगा भाई पाठको के लिए ...उधर से अगली सलाह हमारे मुंह से टपक पडी कि ....आपने ब्लॉग्गिंग में आने से पहले और अब आने के बाद किस तरफ़ का अंतर महसूस किया है ...कोई जरूरी नहीं है कि खुद महसूस किया हो ....कई बार तो जबरन महसूस कराया गया ..बाई गॉड सच्ची यार ...हालांकि मैं तो बस इस ख्याल से ये विचार दे बैठा था कि ...यार कोई तो होगा जो ...ब्लॉग्गिंग के चक्कर में घर में ..बीवी के जूते ..मेरे से ज्यादा खाता होगा ..जो भी मिल गया ,उसी दिन से ..उसकी रीडरशिप सबस्क्राईब ...हर पोस्ट पर पहली टिप्पणी का बॉड भर के दे दूंगा ....आदि आदि टाईप के सारे जज्बात उडॆल दूंगा ...। तो बस सभी ने उसका उत्तर दिया । सबसे पहले खुशदीप भाई ने अपनी कमी बता दी ..अब मैं समझ गया कि सोचा होगा ..अबे चलो ये वाली कमी मैं ही बता देता हूं ..फ़र्स्ट फ़र्स्ट ...इत्ता बडा सर्कल बना हुआ है इन ब्लॉगर्स का ..क्या पता मेरी वाली कमजोरी कोई पहले ही बता दे ..अपना नंबर आने तक क्या पता सारी फ़ेवरिट वाली कमजोरियां हाथ से ही निकल जाएं ..सो दन्न से बोले कि ..हमे अपनी पोस्ट पर जब कोई टेढी टिप्पणी करता है तो हमारा भी खोपडा भन्ना जाता है फ़िर तो ..अबे चलो ..इत्ती मेहनत के बाद ..ऐसी बात ...तो मतलब कि ...गुस्सा आ जाता है ....ये तो सबकी कमी मानी जाएगी ..कसम से ब्लॉगर्सली (युनिवर्सली टाईप ) कमजोरी हो गई ये । हालांकि अभी मुझे सबकी बताई कमी ध्यान भी नहीं है कसम से ..अरे कुछ भूलूंगा भी कि नहीं ...

अब भाई नरेश सिंह राठौड जी का नंबर आ गया और उन्होंने ब्लॉगिंग में अपने आने का जो अनुभव सुनाया सुनकर शायद आपके रोंगटे खडे हो जाएं । उन्होंने बताया कि , कुछ वर्षों पहले वे नौकरीपेशा थे । एक दिन काम के दौरान उन्हें कंप्यूटर संबंधित कोई काम सौंपा गया , उन्होंने अपने समझ के मुताबिक उसे ठीक करने की कोशिश की । जाने कैसे भूलवश उसके कारण , अचानक शनिवार को काम रुक गया और फ़िर अगले दिन रविवार होने के कारण ठ्प्प पडा रहा । उन्हें अपरोक्ष से बताया कि पिछले डेढ दिनों में वहां उस बंदी के कारण हुए नुकसान का कारण उन्हें माना समझा जा रहा है और उसके बाद उन्होंने वो नौकरी छोड दी । उनका कंप्यूटर तकनीक से लगाव और उसके बाद ब्लॉग्गिंग में आना इसके बाद का ही किस्सा है । मैंने अपना नाम बताने के बाद अंत में ही कुछ कहने का आग्रह किया । इसके बाद ललित जी ने मोर्चा संभाला उन्होंने सबसे पहले बताया कि वे पिछले दिनों कोटा श्री दिनेश राय द्विवेदी जी , श्री अखतर खान अकेला जी से मुलाकात करते हुए ." वरिष्ठ बजकर्मी " इंदु पुरी जी के पुत्र के विवाह में सम्मलित हो कर यहां पधारे हैं । उन्होंने बताया कि , ब्लॉगिंग विशेषकर हिंदी ब्लॉग्गिंग एक वैश्विक परिवार की तरह से हो गया है । जिस अपनेपन और स्नेह से इंदु पुरी जी मिलीं उसका गवाह तो वो आंसू का कतरा थे जो चार जोडी नेत्रों से बह निकले थे । ललित भाई ने बताया कि , इंदु पुरी जी ने ब्लॉगर बारातियों के लिए अलग से ही ब्लॉगर ठिकाना ही बना दिया था ...यहां तक कि सीढीयां और दीवारें तक ब्लॉगर्स के स्वागत में बिछी हुई थीं
इंदु पुरी जी के घर का दृश्य ..पद्म सिंह सी जी के बज से उडाई गई एक फ़ोटो

...बताईये देखा था अब तक आपने ये दीवानापन ....गौर से पढियेगा ...उनसे खास गुजारिश है जिन्हें ब्लॉगर बैठकों में सार्थकता नहीं मिल पाती ...। इसके बाद उन्होंने बताया कि बहुत जल्दी ही वे छत्तीसगढ में ब्लॉगर और मीडिया को आमने सामने लाने जैसा कोई सम्मेलन आयोजित किए जाने का विचार बना रहे हैं । संगीता पुरी जी ने बताया कि वे ब्लॉगजगत में अपने विषय को लेकर गंभीरता से लिखती हैं और अपने पिताजी द्वारा सीखे गए गत्यात्मक ज्योतिष को अंतर्जाल पर रख रही हैं । संगीता जी ने बताया कि अब किसी भी शहर लगता है कि एक आध ब्लॉगर से मुलाकात तो हो ही जाएगी इसलिए अब कोई शहर अनजाना नहीं लगता ।

भाई राजीव तनेजा जी और भाभी संजू तनेजा ने भी अपने अपने अनुभव बांटे । इसके बाद निर्मला कपिला जी ने बताया कि उन्हें सबसे ज्यादा दिक्कत ब्लॉग्स को पढने में आती है , जब से ब्लॉगवाणी बंद हुआ है उन्हें काफ़ी दिक्कत आई है । यहां मैं एग्रीगेटर्स और ब्लॉग पढने लिखने के विषय में कुछ कहा जो मैं आखिर में ही एक साथ बताता हूं । उन्होंने बताया कि उनके दामाद जी इसमें उनकी बहुत मदद करते हैं । हमने मन ही मन सोचा कमाल है ..एक हमारी सास है ब्लॉग्गिंग में हमारी सहायता लेना तो दूर घर पर आती हैं ..तो कंप्यूटर को देखते हुए ...आंखों ही आंखों में ये कहती हैं ...अच्छा तो ये है मुंई वो मुन्नी ..जिसके लिए ..दामाद जी हमारी ..बिटिया रानी को ...दरकिनार किए रहते हैं ..नाम क्या है DELL.....हुंह ...अंग्रेज मुईं ।इसके बाद डॉ अरुणा कपूर ने भी अपने अनुभव बांटे और बताया कि जायका के नाम से वे टिप्पणी करती रही हैं ।

इसके बाद भाई संजय भास्कर और भाई हरदीप राणा ने अपनी अपनी बात कही । अब सामने थे योगेन्द्र मौदगिल जी ,उनका परिचय दिया भाई सतीश सक्सेना जी ने , वो चार जादुई पंक्तियां आप बहुत बार सुन ही चुके हैं और फ़िर उनसे आग्रह किया कि वे कुछ सौगात हमें भी दें अपनी कविताओं गज़लों का , उन्होंने कहा कि परिचय के इस दौर के खत्म होने के बाद वे जरूर ये फ़रमाईश पूरी करेंगे । इसके बाद सतीश भाई ने भी अपने अंदाज़ में अपनी बातें कहीं । इसके बाद डा प्रवीण चोपडा जी ने भी अपने ब्लॉगिंग के अनुभव को साझा किया और उन्हीं कठिनाईयों का जिक्र किया । इसके बाद केवल राम जी ने बताया कि उनका विषय भी हिंदी ब्लॉग्गिंग है और वे बडी ही बारीकी से इसकी सभी गतिविधियों पर नज़र रखे हुए हैं ।

अंतर सोहिल ने बडी ही दिलचस्प बात कहते हुए कहा कि अब ब्लॉग्गिंग में आने के कारण वे सार्वजनिक से हो गए हैं इसलिए हठात कोई बुरा काम करने से खुद को बचा लेते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि उनके बारे में तो सबको पता है फ़िर ..है न दिलचस्प बात । इसके बाद राज भाटिया जी ने अपने शुरूआती अनुभवों को बांटा और सबके स्नेह से गदगद हो गए ।जहां तक मेरी बात है तो मैंने जो बात कही वो ये कि मैं ब्लॉग पोस्ट पढने के लिए सबसे ज्यादा डैशबोर्ड का ही इस्तेमाल करता हूं । और मेरे ख्याल से हम सबके लिए सबसे ज्यादा जरूरी है कि ज्यादा से ज्यादा पाठकों तक अपनी बात को पहुंचाया जाए इसके लिए वर्तमान में मौजूद एग्रीगेटर्स पर खुद को पंजीकृत करना चाहिए ताकि कल को यही एग्रीगेटर मजबूत विकल्प के रूप में उभर कर सामने आएं । इसके बाद योगेन्द्र जी ने जो समां बांधा तो फ़िर तो सेमिनार हॉल ठहाकों से गूंज उठा ।इसके बाद भोजन का समय हो गया और सब शुरू हो गए ।

भोजन के दौरान और उसके बाद भी सब छोटे छोटे गोले में बैठ कर विचार विमर्श करते रहे ।

हमारा मोबाईल बीच बीच में तार द्वारा शाहनवाज भाई के लैपटॉप से गठबंधन करता रहा ताकि खुशादीप भाई द्वारा तैयार पोस्ट में फ़ोटुएं भी आपको दिखाई जाएं । भोजन के उपरांत सबने थोडी हल्की फ़ुल्की बात की और राज भाई के आग्रह पर तिलियार झील परिसर घूमने निकल गए ।
निर्मला जी ने कहा कि वे इतनी दूर तक नहीं चल सकेंगी क्योंकि उनके पैरों में दर्द था । हम सब घूमते निहारते रहे ।







कौन कहता है कि ताऊ नहीं थे वहां , पूरे दलबल के साथ थे




बीच में राजीव भाई के फ़ोन पर संदेश आया और हम चल दिए वापसी की ओर ।

वापसी में योगेंद्र जी ने अपनी अपनी गज़लों और गीतों का संग्रह अंधी आंखें गीले सपने की प्रति सप्रेम हमें भेंट की

। हम सतीश भाई की कार से डा. दराल सर के घर की ओर चल दिए ...

तो ये थी तिलियार की एक वो रिपोर्ट जो अब तक आप तक नहीं पहुंची थी ....चलिए कल से फ़िर पुराने सफ़र पर लौट सकूंगा ..

इस बैठक की सबसे शानदार फ़ोटुएं ..सतीश भाई ने अपने कैमरे से खींची थी और बहुत सी तो ऐसी कि ब्लॉगर प्रोफ़ाईल पर लगाई जा सके ..यहां देखिए न

मंगलवार, 23 नवंबर 2010

हिंदी पोस्टों/ ब्लॉगर्स के प्रति केवल एक नॉन ब्लॉगर ही निष्पक्ष रह सकता है ...दिल्ली से तिलियार ..एक कार सफ़र विमर्श ..रिपोर्ट नं १


इस बार , वर्षांत पर लगता है ब्लॉगर्स का मेला लगा ही रहेगा अभी । पिछले रविवार को ही समीर लाल जी उर्फ़ उडनतश्तरी जी के सान्निध्य में सभी को उन्हें जानने बैठने का मौका मिला था । अब अब राज भाटिया जी ने इस रविवार यानि परसों सभी को रोहतक बुला भेजा । मेरे लिए तो इन सम्मेलनों में हिस्सा लेना ऐसी बैठकों में शिरकत करने का आदेश उसी तरह से होता है जैसे कि एक फ़ौजी को फ़्रंट पर पहुंचने के लिए आदेशित किया जाता है । हालांकि इधर कुछ दिनों से कार्यालय और घर पर भी व्यस्तता का आलम कुछ ऐसा बना हुआ है कि समझ ही नहीं आ रहा कि कब सुबह हो रही है और कब शाम । तो इससे पहले कि मैं इस बैठक की रिपोर्ट की तरफ़ बढूं , कुछ और सूचनाएं भी आपको देता चलूं । संभावना है कि अगले महीने किसी तारीख को एक और कार्यक्रम दिल्ली में ही आयोजित किया जाए अभी कुछ भी तय नहीं हुआ है होते ही सूचना दी जाएगी । और एक निजि सूचना मेरी तरफ़ से ये कि मैं इस साल के अंतिम दिनों में शायद छत्तीसगढ की पवित्र भूमि के दर्शन कर सकूंगा ।खैर, ये सब तो भविष्य की बातें हैं अभी तो आप रोहतक झील चलिए मेरे साथ ।

इस कार्यक्रम की सूचना मिलते ही सभी वहां पहुंचने की तैयारी में लग गए थे । इससे संबंधित कई मजेदार बातें हुईं जो मैं आपको इस रिपोर्ट की आखिरी किस्त में बताऊंगा । आखिरकार हुआ ये कि मुझे खुशदीप भाई ने आदेश दिया कि मैं , उनके और सतीश सक्सेना जी के साथ चल रहा हूं और मैं शनिवार शाम को उनसे बात कर लूं । मगर किन्हीं कारणों से मेरी बात नहीं हो पाई सतीश जी से । सुबह सुबह जब फ़ोन पर देखा कि सतीश जी की टिप्पणी ब्लॉगवार्ता पर आई है तो मुझे पता चल गया कि वे जगे हुए हैं और कंप्यूटर पर हैं , पूछने पर पता चला कि वे बस निकलने वाले हैं । मुझे अभी समय लगने का अंदेशा था सो उनसे आगे बढने को कहा । मगर उन्होंने और खुशदीप भाई ने कहा कि वे कुछ देर प्रतीक्षा कर लेंगे , मेरे बताए किसी स्थान पर । अब मैं फ़टाफ़ट तैयार होकर निकलने की तैयारी में लग गया । घर पर गांवे से आये कुछ मेहमान और बच्चे सभी सो रहे थे । नहाने धोने के बाद आलमारी से कपडे निकालने के बजाय मुझे अभी दो दिन पहले निकाला और शादी समारोह में पहना गया अपना सूट दिख गया मैं भी बिना सोचे उसे टांग कर चलता बना । मुझे क्या पता था कि इन कपडों के चक्कर में मेरी तगडी खिंचाई होनी है बाद में ।

मैंने खुशदीप भाई और सतीश सक्सेना जी को जिस स्थान पर रुकने के लिए कहा था जरा उस स्थान के बारे में भी जान लें । दिल्ली के गीता कॉलोनी के पास स्थित ..शमशान घाट के पास । अब मैंने सोचा कि शमशान घाट ही वो स्थान है जिसे ढूंढना ज्यादा मुशकिल नहीं होता ..(.यदि आप न भी ढूंढें तो किसी न किसी दिन तो पहुंच ही सकते हैं ) और जब सतीश जी ने देखा कि वो कौन सी जगह है तो बेसाख्ता हंस पडे । अगली सीट पर खुशदीप भाई और सतीश सक्सेना जी विराजमान थे और पिछली सीट पर देखा तो ...अरे ये तो अपने शाहनवाज़ भाई निकले ..वो भी अपने लैपटॉप और नेट के साथ । बस अब हम निकल चले । जहां चार यार ....चार ब्लॉगर्स हों और वहां ब्लॉगिंग की बात न हो ऐसा भला हो सकता है क्या ? हालांकि हमारी बातचीत शुरू हुई , पिछले कुछ दिनों से ब्लॉगर साथियों के निजि जीवन में घट रही दुखद घटनाओं से हुई और फ़िर सबने ये महसूस किया कि अब भी जो सामाजिक अपनापन , जो आपसी स्नेह , जो सहभागिता छोटे गांवों , कस्बों में देखने समझने को मिलती हैं अब वो बात शहरों में कहां ??

यहां बात बात में खुशदीप भाई ने जिक्र किया अपने होनहार भतीजे करन के बारे में । उन्होंने उसकी काबलियत और खूबी के बारे में बताते हुए बहुत सी ऐसी जानकारियां दीं जो न सिर्फ़ मेरे लिए बल्कि हम सभी के लिए नई और अनोखी थी ।


उनका होनहार भतीजा ..carbon credit ..विषय पर मास्टर्स डिग्री ले रहा है । हमारे लिए ये शब्द ही बिल्कुल नया था । जब जानना चाहा तो सतीश सक्सेना जी और खुशदीप सहगल जी ने बताया कि , पर्यावरण प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए जो वैश्विक उपाय अपनाए जा रहे हैं उनमें से एक है carbon credit ..| असल में ये कार्बन क्रेडिट एक तरह का बोनस प्वाइंट जैसा है ,,यानि जो भी औद्योगिक , रिहायशी ईकाई ग्रीन हाऊस गैसों के उत्सर्जन में कमी लाएंगी , जितनी भी कमी वे ला सकेंगे उसके अनुसार उन्हें ये कार्बन क्रेडिट दिया जाएगा और इन वैश्विक क्रेडिट को बाद में आर्थिक फ़ायदे में बदला भी जा सकता है यानि जिसके पास इन क्रेडिट की कमी है उन्हें ये क्रेडिट प्वाइंट बेचा जा सकेगा । इसका मतलब ये हुआ कि भारत सहित तमाम विकासशील और पर्यावरण में संतुलित देश इस कार्बन क्रेडिट से बहुत कुछ पा सकेंगे । है न कमाल की बात । इससे आगे , इसके बारे में भाई खुशदीप सहगल ही अपनी किसी पोस्ट में बताएं तो बेहतर होगा ।

इसके बाद बात घूमफ़िरकर मेरे ऊपर आ गई और सतीश सक्सेना जी ने फ़िर टिप्पू चाचा को याद किया । उन्होंने बडे ही विश्च्वास के साथ कहा कि मैं मानूं या न मानूं मगर लोग अब भी मानते हैं कि टिप्पू चाचा नाम का आभासी चरित्र मैं ही थी । और मुझे पुन: विस्तार से बताना पडा कि किस तरह से मुझे टिप्पू चाचा के साथ जुडने का आमंत्रण मिला और फ़िर बाद में किन परिस्थितियों में उनका वो साझा ब्लॉग छोडना पडा क्योंकि मुझे नकाब के भीतर बैठे किसी ब्लॉगर से कोई शिकायत नहीं , तब तक , जब तक कि उसकी मंशा नकारात्मक न हो । चाहे वो जलजला हों , अम्मा जी , उस्ताद जी हो , या फ़िर कि आजकल दिख रही मुन्नी बदनाम हो । मैंने दो बातें कहीं जो मैंने अब तक ऐसे अनुभवों से जान व महसूस कर चुका था , पहली बात ये कि , इन तमाम मुखौटों के पीछे कोई न कोई पके पकाए खांचे ही थे , वर्ना ऐसा कम ही हुआ था कि , कोई मासूम आते ही मासूमियत से भरा हुआ चेहरा लेकर पूरे ब्लॉगजगत की पोस्टों का उद्धार करता फ़िरे । दूसरा और ज्यादा दमदार निष्कर्ष ये कि कोई लाख गंगा जमुना में घुसकर कहे , चाहे सच का सामना की गद्दी पर बैठ कर बोलता हो कि ....हम तो निष्पक्ष हैं .....मगर यदि वो खुद ब्लॉगर है तो ...........तो ये हो ही नहीं सकता , जैसा कि कई लोग बाग दावियाते देखे पाए गए हैं । वैसे यहां मुझे एक बात समझ नहीं आई कि , दिखाने वाले देर सवेर यहां , अपनी पोस्टों, टिप्पणियों से अपनी औकात दिखाने वाले सभी जब अपने चेहरे के साथ ही ये सब कर लेते हैं , पा लेते हैं तो फ़िर अब इससे कितने ज्यादा के लिए मुखौटा पहनते हैं , । और इसी कारण से फ़िर एक दिन मुझे मजबूर होकर टिप्पू चचा नामक जिनियस ( जी हां इतना तो एहसास है मुझे कि वो कोई न कोई जिनियस ही था, या कि है )से अपनी साझेदारी को हटाना पडा क्योंकि मैं उन दिनों वहां लिखी जा रही कई टिप्पणियों का साझेदार नहीं बनना चाहता था । और इन सब बातों के बीच हम रास्ता नापते रहे ..बीच में पडे ..अरे कहां पर ..अरे क्या था यार वो ...हां बहादुरगढ ...में मशहूर बिल्लू के पकौडे भी स्क्रिप्ट में आने के हकदार हो रहे थे ।



हम तिलियार के करीब पहुंचने को थे .......................अरे आज नहीं कल पहुंचते हैं न ....






हम रिपोर्ट तैयार करने का मूड बनाते हैं









साथ चलने वाले

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