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शुक्रवार, 25 जून 2010

नदिया के पार , एक जीवन को जीती पिक्चर , चंद जुडी यादें .....





आजकल चारों तरफ़ ही काईट्स, राजनीति .के रिव्यू , और आम पाठकों /दर्शकों की प्यारी प्यारी राय जानकर उन फ़िल्मों के प्रति ऐसा वैराग्य जाग गया कि टीवी पर उनके प्रोमो देख कर मन में यही बात उठ रही थी कि , बेटा , दिखाओ दिखाओ , जितना भी तडक भडक दिखाना है , असलियत अब सामने आ गई है , अब तो बेटा हम धेला भर भी नहीं खर्च करेंगे । वैसे भी काईट्स तो कट के फ़टाक से किसी चैनल पर आ रही है , राजनीति को भी देर सवेर किसी न किसी चैनल पर ठौर मिल ही जाएगा । टीवी पर आजकल थोडा बहुत समय तो हमें भी मिल ही जा रहा है , फ़ुटबाल विश्व कप के बहाने से । श्रीमती जी भी मना नहीं कर पा रही हैं कि कम से कम इसी बहाने कुछ देर तो स्क्रीन का सूरत बदलेगा , कंप्यूटर न सही , टीवी ही सही । मगर उन्हें निराशा तो है ही कि हमें साधना के मरने ( सीरीयल बिदाई , स्टार प्लस ) से ज्यादा अच्छा ब्राजील का मैच लगता है । वैसे इससे ज्यादा उन्हें हमारी उस राय से है जो इन सीरीयलों के प्रति हमारी है कि , या तो इन सीरीयलों में कोई न कोई समारोह हो रहा होता है या फ़िर कोई न कोई स्यापा । खैर इस सबके बीच ही लोकल केबल पर अचानक एक चैनल पर पहुंच कर ठिठक गया ।

गुंजा , चंदन , ओंकार , रज्जो ,बलिहार ................जी हां .नदिया के पार,पिक्चर , आ रही थी । बस उसके बाद तो हम एक तरफ़ और पूरा घर एक तरफ़ । हमने भी उस दिन ठान ही लिया कि अब तो चाहे जो हो अब तो ये मोर्चा हम नहीं छोडने वाले हैं । दूसरी पार्टी , जिसमें ऐसे समय में अक्सर हमारा पुत्र बडे आराम से मां का साथ गठबंधन सरकार बना लेता है ताकि बाद में दोनों बदल बदल कर अपने सीरीयल और कार्टून देखते रहें , भी जल्दी ही समझ गई और दूसरे टीवी की तरफ़ खिसकना ही मुनासिब समझा ।ओह एक एक दृश्य मुझे जाने कहां खींचे ले जा रहा था । उन दिनों जब हम शहरों में रहा करते थे , मगर गर्मियों की छुट्टियों में अनिवार्य रूप से गांव जाना तय रहता था । कुल दो महीने की छुट्टी । एक महीना दादा दादी के पास तो अगला एक महीना नानी के गांव में । नाना जी और मामा जी , नहीं थे हमारे और नानी भी शुरू से ही हमारी मौसी के यहां रहीं , क्योंकि उनके ससुराल में कोई नहीं था । सो कुल मिलाकर ननिहाल वही रहा हमारा क्योंकि इकलौती मौसी और नानी वहीं रहते थे हमारे । तो दो महीने में एक एक महीने का कोटा होता था दोनों जगहों का ।

पिक्चर देखते जा रहे थे और उन लम्हों को जीते जा रहे थे । याद आ गया वो जमाना , रेल की बिना आरक्षण वाली यात्राएं , और तब सफ़र में सुराहियां चलती थीं जी । अजी लाख ये कूलकिंग के मयूर जग और बिसलेरी की बोतलें चलें मगर सुराही और छागल के ठंडे मीठे पानी का तो कोई जवाब ही नहीं था । थकान भरी यात्रा के बाद सुबह सुबह ही स्टेशन पर उतरना और फ़िर वहां से तांगे पर निकलती थी सवारी । आज जिस सफ़र को कार और जीप में सिर्फ़ कुछ मिनटों में ही नाप जाते हैं उस कच्चे पक्के रास्ते को तय करने में उन दिनों कम से कम तीन चार घंटे लगते थे और उससे अधिक आनंद तो आता था रास्ते में पडने वाले उन दृश्यों को निहारने का । बीच में पडने वाले दस पंद्रह गांव , सडक किनारे बने हुए चौक चौराहे , उन पर कुछ गुमटियां , ज्यादातर पान की , पोखर तालाब , आम के बगीचे , जो उन दिनों इतने लदे फ़दे होते थे कि बस देखते ही बनते थे । कहीं कोई ट्रैफ़िक नहीं कोई चिल्ल पों नहीं । रास्ते में आते जाते तांगे और वही बैल गाडियां ।

नदिया के पार का वो गाना याद है आपको , सांची कहे तोहरे आवन से हमरे ...वो गेंहू का ढेर याद आया जिस पर लेट कर सचिन गाते हैं , अनधन के लागे भंडार भौजी । बस वैसे ही धान गेंहू के ढेर ढेरियां हर आंगन में दिखाई देती थीं । दादी के पास खूब मन लगता था , वहां पापा अपने काम में व्यस्त , मम्मी ससुराल में पस्त ..और हम बच्चे मस्त ही मस्त । मगर असली मजा तो नानी यानि हमारी मौसी के गांव में आता था । मौसा जी की कटही बैलगाडी (कटही इसलिए कि उसके टायर भी लकडी के होते थे जी ) वही नदिया के पार में ..कौन दिसा में लेके चला रे बटोहिया वाले .....को लेकर ..उसे अपने ही मजबूत बैलों के जोडे से हांकते हुए मौसेरे भाई लोग लेकर पहुंचते थे । उसके ऊपर बेंत को बांध कर ओहार लगाया जाता था धूप से बचने के लिए । और बस हम लोग लद जाते थे ..बा पेटी बक्से सहित ।

रास्ते में जो उधम मचता था , उसे क्य वर्णन किया जाए । गन्ने के खेत में से गन्ने उडाए जा रहे हैं , तो जहां तहां आम के पेडों को ढेलियाने का क्रम चल रहा है । बीच बीच में जो गांव पड रहे हैं , उनमें बहुरियांए निकल के मानो अंदाज़ा लगा रहे हैं कि कौन जा रहे हैं , एक आध बुढऊ बीच बीच में पूछ भी रहे हैं ..की यौ ..कत के सवारी छैक ..( क्या जी , कहां की सवारी है ) और जो यात्रा दादी के गांव से सुबह शुरू होती थी वो देर शाम तक खत्म होती थी , मौसी के गांव जाकर । इन नियमित यात्राओं के अलावा , शादी ब्याह पर जाना , और जाने कितने ही त्यौहारों को मनाया जाना । वो गाना याद है ....जोगीरा सारारारारा ........बस होली में वही धूम मचती थी ..गांवों में ......। किसी अपने ही साथी को या नाटक नौटंकी वाले को लडकी बना के (नटुआ ) उसे ही बीच में नचा के ...जोगीरा सारारा .....। ये पिक्चर अक्सर मुझे बहुत रुलाती है ।

बच्चे बीच बीच में आते हैं और देख रहे हैं । मम्मी से पूछते हैं ..आज पापा को क्या हुआ है चिपक कर बैठ गए हैं टीवी से .....मम्मी ये ...भौजी ..क्या होता है , मम्मी पापा बीच बीच में हंस भी रहे हैं । और मैं सबसे बेखबर ....एक जीवन को जीने में लगा होता हूं ....क्योंकि जानता हूं कि ....अब शायद उस गुजरे हुए जीवन को फ़िर दोबारा उस तरह तो नहीं ही जी पाऊंगा ।

22 टिप्‍पणियां:

  1. मैं सबसे बेखबर ....एक जीवन को जीने में लगा होता हूं ....क्योंकि जानता हूं कि ....अब शायद उस गुजरे हुए जीवन को फ़िर दोबारा उस तरह तो नहीं ही जी पाऊंगा ।
    क्या बात कही झा जी आपने!!
    नदिया के पार --- और कॉलेज जीवन की याद गुत्थम-गुत्था हो गये हैं, छूट ही नहीं रहे। छूट जाएं तो फिर आऊंगा टिप्पणी देने।

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  2. "नदिया के पार" बाद में देखी थी, इससे पहले इस कहानी पर बनी "हम आपके हैं कौन" देख चुका था।
    इसलिये इसे देखकर मुझे तो बचपन याद ही नहीं आया।

    प्रणाम

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  3. अच्छी फिल्म थी हालाँकि बचपन में नहीं देखी बहुत बाद में देख पाए.

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  4. हम भी पढकर भावुक हो गये. !!!!!!!!!!
    कुछ हँसे कुछ रोये कुछ उदास कुछ....
    अविस्मरणीय फिल्म थी. !!!!!!!!!!!!
    दर्जनों बार देखी है, पर हर बार एक नवीनता पायी है.
    (एक आध बुढऊ बीच बीच में पूछ भी रहे हैं ..की यौ ..कत के सवारी छैक .) ये कहाँ की बोली है !!

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  5. बस यही फिल्म नहीं देखी हमने । लेकिन इस तरह की सारी जिंदगी तो जी है ।
    पर क्या हुआ जो वो दिन फिर नहीं आते , आगे भी इक सुनहरा ज़माना है ।

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  6. @ राजीव जी ये , मैथिली है । बहुत ही मीठी और सरल । ढेरों ब्लोग्स भी हैं इसी मंच पर ।

    ललित जी की टिप्पणी वाया बज :-

    ललित शर्मा - gajb ki film thi "nadiya ke par -- bhauji abhi tak yad aati hai" aapne achchhi yad dila di.

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  7. सच्चाई यही है। बढ़िया लेख। आभार्………

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  8. बहुत पहले यह फ़िल्म देखी थी, मुझे बहुत अच्छी लगी , वेसे भी सादी फ़िल्मे मुझे बहुत अच्छी लगती है, ओर मेरे पास डी वी डी है सुर्क्षित रहती है, अब आप ने याद दिला दिया तो बस यह फ़ुट बाल खत्म हो जाये तो फ़िर से देखेगे, अभी तो दिन मै दो मेच देखते है
    आप का धन्यवाद

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  9. यह फिल्म तो हमने भी देखी थी और उस समय बहुत दिनों तक परेशान रहे..याद कर कर के...याद नहीं कि रोये थे या नहीं.

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  10. अजय भाई,
    यादो को भी ना बस कुछ ना कुछ बहाना चाहिए ..........जब देखो आ जाती है तंग करने या हमने रुलाने !

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  11. " नदिया के पार " अपने कस्बे के सिनेमा हौल में बीडी सिगरेट की गंध के बीच भीड़ भड़क्के में मुश्किल से टिकट लेकर देखी ....गाँव की सौंधी मिट्टी की खुशबू , भोलापन , रिश्तों की रेशमी गांठें , फागुन की मस्ती , क्या नहीं था इस फिल्म में ...
    बेटी की विदाई के समय गाने वाला गीत " जल्दी जल्दी चल रे कहारा, सूरज डूबे रे नदिया " ने रुलाया बहुत ...

    बाद में " हम आपके है कौन " भी इसी कहानी को लेकर बनी ...मगर वह कलात्मकता कहाँ ....इसमें तो सिर्फ विलासिता का प्रदर्शन ही रहा ...
    अच्छी पोस्ट ...

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  12. हम भी इहाँ परेशान है बहुत दिनों से कोई बढ़िया हिंदी फिल्म नहीं आ रही ....सब बकवास ही माल आ रहा है ....अब तो यही है कि पुरानी फिल्म देखो मस्त रहो ..नहीं तो अंगरेजी में बढ़िया फिल्म बन रही है. आजकल हिंदी में कम बजट कि फिल्म फिर भी बढ़िया होती है

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  13. याद ताजा हो गई ।
    इसी की रीमेक ’हम आपके हैं कौन ’भी हिट रही ।
    सचिन (चंदन ) से मुलाकात हो चुकी है ,वही सरल और भोला भाला व्यक्तित्व है ।

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  14. "नदिया के पार" तो हमारी भी पसन्द की फिल्म है अजय जी! वैसे तो राजश्री प्रोडक्शन की सभी फिल्में बहुत पसन्द हैं हमें किन्तु "गीत गाता चल" और "नदिया के पार" विशेष रूप से पसन्द हैं।

    फिल्म के बहाने संस्मरण बहुत अच्छा लगा।

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  15. मैं भी कुछ आपकी तरह से ही हूं। बार-बार अतीत में लौटता हुआ सा। आप शायद उतने पागल नहीं होंगे जितना मैं हूं। मुझे कुछ चीज याद आती है तो फिर मैं उसे देखने उसी वक्त निकल जाता हूं। एक बार बचपन का स्कूल याद आ गया। बस क्या था गाड़ी लेकर निकल पड़े स्कूल देखने।
    पुरानी फिल्में तो मैं घर पर लाकर देखता हूं। बच्चे चिल्लाते हैं पापा कब बैलबाटम वाले जमाने से बाहर निकलोंगे।
    अभी कुछ दिनों पहले ही आदमी सडक का, फकीरा,शर्त(संजय खान वाली) एक फूल दो माली, अब्दुला और राजश्री की दोस्ती देखी है। नदिया के पार को कम से कम से दस बार देख चुका हूं। ऐसी फिल्म जिसमें माटी की खूश्बू जुड़ी हो दोबारा नहीं बन सकती। आपने दिल खुश कर दिया

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  16. मेरी भी ये आदत है..कभी कभी इस तरह की फ़िल्में आती हैं...गाँव की मिटटी की महक लिए और फिर रिमोट मेरे कब्ज़े में....बच्चे जितना कुछ कह लें..कितने बहाने बना लें...पर मैं चैनल नहीं बदलती. कभी कभी वे भी मन मार कर देखने बैठ जाते हैं और इस फिल्म के होली दृश्यों को देख मेरे छोटे बेटे ने आश्चर्य से पूछा था..."लेडीज़ और मेन अलग अलग होली क्यूँ खेलते हैं?"
    मैने कहा,"वहाँ ऐसा ही होता है"
    "पर क्यूँ?" और मम्मी लोगों का अंतिम हथियार..."शोर मत करो,फिल्म देखने दो ":)
    सीधी सादी बहुत ही ख़ूबसूरत सी फिल्म थी ये.

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  17. ओह ! मुझे भी शहर से गाँव की यात्रा याद आ गयी. हमलोग पहले ट्रेन से जाते थे, फिर जीप पकड़ते थे और उसके बाद तांगा और फिर पैदल... हमारा गाँव शहर से तीस किमी अंदर है, एकदम इंटीरियर... पर पूरे रास्ते इतने घने पेड़ थे कि धूप लगती ही नहीं थी.
    और ये फिल्म ... इसके गाने सुनकर बचपन की यादें ताज़ा हो जाती हैं. रेडियो पर खूब बजते थे इसके गाने.

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  18. ओफ्फ...हद होती है भैया किसी चीज़ की भी ..क्या क्या याद दिलाया आपने...हालाँकि हम उतने पुराने ज़माने में तो नहीं रहे, लेकीन फिर भी हम बचपन में कुछ ऐसा ही मिलता जुलता देखें हैं...

    जैसा की आराधना जी ने कहा, वैसे ही...हम बस से या ट्रेन से जाते थे गांव, उसके बाद जीप लेते थे और फिर रिक्शा..:)

    और वैसे ई फिल्म तो अपनी भी टॉप लिस्ट में आती है :)

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  19. जब तक पूरे न हों फेरे सात
    तब तक दुल्हिन नहीं दुल्हा की
    तब तक बबुनी नहीं बबुआ की

    अबही तो बबुआ पहली भँवर पड़ी है
    अभी तो पहुना दिल्ली दूर खड़ी है
    पहली भँवर पड़ी है,दिल्ली दूर खड़ी है
    करनी होगी तपस्या सारी रात
    सात फेरे सात जन्मों का साथ...

    शानदार फिल्म.....
    जीवन की आपाधापी में
    कब वक्त मिले
    तो बैठ कहीं ये सोच सकूं
    जो किया कहा माना

    हम सबको सबकुछ याद है....पर दिखावा करते हैं कुछ न याद रखने का....हमारे पास वक्त भी होता है....पर बहाना करते हैं वक्त न होने का.....
    उसमें क्या भला बुरा....

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  20. इस फिल्म मे गाँव की पूरी न सही लेकिन एक तस्वीर तो थी ही ।

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  21. ओह! आप भी कहाँ खींच ले गए. बदन में सिहरन सी होने लगी

    यादें होती ही ऎसी है

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मैंने तो जो कहना था कह दिया...और अब बारी आपकी है..जो भी लगे..बिलकुल स्पष्ट कहिये ..मैं आपको भी पढ़ना चाहता हूँ......और अपने लिखे को जानने के लिए आपकी प्रतिक्रियाओं से बेहतर और क्या हो सकता है भला

साथ चलने वाले

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