इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.

शनिवार, 30 जनवरी 2010

नैतिकता, आनंद, दोयम दर्ज़ा , इन शब्दों पर फ़्लैशबैक के साथ ,कुछ ट्रेलर




ये तो मैं बहुत पहले ही समझ चुका था कि हिंदी ब्लोग्गिंग मे भी अन्य सभी समाजों की तरह मुद्दों की कंगाली का दौर तो आता जाता ही रहता है और उसी का ये परिणाम होता है कि फ़िर मुख्य धारा के विषयों, और आलेखों के ऊपर अक्सर वो कहते हैं अलाने फ़लाने..........या फ़लाने ढिमकाने वाले मुद्दे ही हावी हो जाते हैं । हिंदी ब्लोग्गिंग में जब से कदम रखा है और कुछ सीखा हो न हो इतना तो अंदाजा हो ही गया है कि यहां शब्दों का नित नया संधान और उपयोग होता है । उसका बहुत से अर्थों में उपयोग या आप दुरुपयोग भी मान सकते हैं , होता है या शायद किया जाता है । हमें भी कभी कभी ऐसा मौका मिल ही जाता है । पिछले दिनों एक से एक शब्दों पर काफ़ी विचार मंथन चल रहा है , कुछ हमारे भी हत्थे चढ गए ..हत्थे इसलिए क्योंकि पल्ले पडे नहीं सो मत्थे चढे नहीं ....।

पहले बात करते हैं नैतिकता की , हम और हमारे मित्र श्री लपटन जी अक्सर ही इन मुद्दों पर बतियाते हैं ....सो हमने उन्हीं से सारे घटनाक्रम पर उनके दिव्य ज्ञान से कुछ प्रकाश डालने को कहा । वे कहने लगे क्यों ..भाई ये आज अचानक नैतिकता की याद कैसे हो आई । अमां जब तुम लोग एक दूसरे की टांग खींचते रहते हो, अनाम शनाम , गुमनाम बनके एक दूसरे को बदनाम करने का पुनीत शुनीत काम बेहिचक और बदस्तूर करते हो , तब तो तुम लोगन को कोई नैतिकता नाम की चिडिया की याद नहीं आती अब ई अचानक कईसे जाग गई भाई ,...कौनो राज पिछले जनम का खुला है का ?

अरे नहीं लपटन जी, पाप ......ओह मेरा मतलब राज तो इसी जनम का है मगर आजकल इसका राजफ़ाश हो रहा है इसलिए याद आ रहा है ,आपही कुछ बताईये न इस बारे में , हम लपेटते हैं .....

अच्छा तो सुनो अथ कथा नैतिकता पुराण भाया लपटन .........देखो बहुत समय पहले की बात है ......यहां बहुत समय पहले का भावार्थ समझ गए न .........बहुत समय पहले मतलब एक आध साल पहले ...मगर इसका उपयोग इस तरह से किया जाता है ...जैसे युगों पहले कोई डायनासोर के पैदा होते समय ही ब्लोग्गिंग शुरू की गई हो , खैर , तो बहुत समय पहले की बात है .........कुछ बहुते साहित्यकार, लेखाकार,चिट्ठाकार, .....यार और जितने तरह के कार हैं ...सब लगा लो , ........

मतलब ..बेकार, मक्कार, धिक्कार, ...और

राम राम , अबे तुम तो चुप ही रहो , यहां बालकाण्ड शुरू हुआ नहीं डायरेक्ट लंका कांड पर पहुंच गए , चुपचाप लपेटो......तो कुछ उन लोगों ने जब लिखना पढना शुरू किया ....तो सोचा कि यार खाली लिखते पढते , फ़िर पढते लिखते ,,,और बस यही करते हैं चर्चा तो करते नहीं कोई भी ..इसी बात को ध्यान में रख कर चर्चा शुरू की गई । बस चर्चा की चर्चा चल निकली .........अमा ऐसे नहीं जैसे जलूस निकलता है ..ऐसे जैसे बारात निकलती है । मगर तब इत्ता आज जैसा अनैतिक समय कहां था , कि लोग बाग सिर्फ़ पोस्ट और टीप तक सीमित रह जाते , सो आगे बढ के बात घर द्वार , पडोसी, परिवार , समाज तक पहुंची , किसी को बलात्कारी घोषित किया गया तो किसी को व्याभिचारी, ...किसी का मोहल्ला बिगडा तो किसी का कुनबा , मगर मजाल है किसी की जो किसी ने .........वो क्या कह रहे थे तुम एक फ़ालतू सा शब्द ........हां नैतिकता ......की बात किसी ने की हो । अरे जरूरत ही नहीं थी भाई उसकी ।

फ़िर समय बदला ,और डायनासोर के साथ अन्य छोटे जीवजंतु भी पैर पसारने लगे , तब चर्चा को और विस्तार देने के ख्याल से उसका विस्तार करते करते निस्तार कर दिया गया । अब छोटे जीव जंतु तो उत्ते बडे साहित्यिक कलेजे वाले थे नहीं , मगर उनकी चर्चा भी जरूरी थी क्योंकि चर्चाकार के चर्चा करने का मकसद था , " हमें जिस चर्चा में आनंद आता था हम उसकी ओईसन चर्चा करने लगे " टाईप , की चर्चा । तो फ़िर उनकी चर्चा कैसी होती ...बस चर्चा का होई बेचारे जीव जंतु सब के चर्चे कम परखच्चे ज्यादा उडने लगे । अजी कभी स्टिंग , कभी कटिंग, कभी ...अरे छोडो यार अब कित्ते बहाने गिनाएं ....बस समझो कि होने लगी । मुदा तभियो ......मजाल है किसी की जो किसी ने .........वो क्या कह रहे थे तुम एक फ़ालतू सा शब्द ........हां नैतिकता ......की बात किसी ने की हो । अरे जरूरत ही नहीं थी भाई उसकी ।

इसके बाद फ़िर समय बदला ...छोटे छोटे जीव जंतु भी चर्चा करने की सोचने लगे .......फ़िर अलानी फ़लानी , ढिमकानी , बेगानी ........और जाने कैसी कैसी चर्चा करने लगे ...चर्चा ये भी चल निकली .........यार कमाल तो यही है इस देश समाज का कि ..खर्चा चाहे निकले न निकले ......चर्चा जरूर चल निकलती है ...तो बस चल निकली । बस इसके बाद सुगबुगाहट शुरू हुई ......अरोप , गंभीर आरोप , और गंभीरतम आरोप लगे ..........कहा पूछा जाने लगा ........अबे काहे की चर्चा बे , जाने किस किस , जिस तिस , अपने बेगानों की, दीवानों मस्तानों की, फ़लाने ढिमकानों की .........मतलब यार किसी की भी चर्चा कर दी कैसी भी कर दी कभी भी कर दी ....ऊपर से किसी का माखौल नहीं उडाया , किसी से मौज नहीं ली , किसी को ठेस नहीं पहुंचाई , तो फ़िर कैसी चर्चा जी । इस बीच रही सही कसर पूरी हो गई , जब सुना कि कोई शौपिंग मौल इसी नाम का किसी ने खरीद लिया ......अब खरीद लिया तो खरीद लिया ......अब किसी से पैसे से थोडे खरीदा ......न ही ऐसा कि किसी ने बयाना दिया हुआ था पहले .............बस जी हो गई स्केटिंग शुरू ।तो यहीं से हिंदी ब्लोग्गिंग के इतिहास में नैतिकता का इतिहास शुरू होता है

आगे की कथा के लिए देखना /पढना न भूलें ........अगला अध्याय

शुक्रवार, 29 जनवरी 2010

रोज़ नए दर्द, संभालता हूँ मैं

हर पल,
इक नया ,
वक़्त ,
तलाशता हूँ मैं॥

जो मुझ संग,
हँसे रोये,
वो बुत,
तराश्ता हूँ मैं॥

मेरी फितरत ,
ही ऐसी है कि,
रोज़ नए दर्द,
संभालता हूँ मैं॥

परवरिश हुई है,
कुछ इस तरह से कि,
कभी जख्म मुझे, कभी,
जख्मों को पालता हूँ मैं॥

सुना है कि, हर ख़ुशी के बाद,
एक गम आता है, तो,
जब भी देती है, ख़ुशी दस्तक,
आगे को टालता हूँ मैं॥

वो कहते हैं कि,
धधकती हैं मेरी आखें,
क्या करूं कि सीने में,
इक आग उबालता हूँ मैं॥


क्या करूं , ऐसा ही हूँ मैं....

बुधवार, 27 जनवरी 2010

वर्चुअल स्पेस बनाम फ़िजिकल एपियरेंस, चर्चा डोमेन मामला, ब्लोग्गर मीट ,.......इन्हीं संजीदा शब्दों पर कुछ असंजीदा और बकवास सी बातें



छत्तीसगढ की ब्लोग्गर्स मीट से बहुत कुछ अपेक्षित निकला , और कुछ ऐसा भी जो अपेक्षित नहीं था । इस मीट की रिपोर्टिंग की पोस्टों में कई सारी बातें निकल के आ रही हैं , और मुझे कोई आशचर्य नहीं कि हिंदी ब्लोग्गिंग की स्वाभाविकता के अनुरूप उस सम्मेलन की सकारात्मक बातों को दरकिनार करते हुए चर्चा डोमेन का मुद्दा ज्यादा हावी रहा या शायद उसे ज्यादा तरज़ीह दी गई है , और कहूं कि अब भी दी ही जा रही हैं । हालांकि एक अच्छी बात ये रही है कि नए ब्लोग्गर्स मित्र जिन्हें इस विवाद से कोई लेना देना नहीं है , और न ही उन्हें जो मजे से ब्लोग्गिंग कर रहे हैं , वे मस्त हैं , इश्वर करे कि वे मस्त ही रहें ताकि ब्लोग्गिंग के इस नकारात्मक पहलू मे आने से तो बचें ही । इस मीट की रिपोर्ट में संजीत भाई ने पोस्ट लगाई उसमें विनीत भाई ने टिप्पणी के रूप में जिन शब्दों का उपयोग किया वे थे वर्चुअल स्पेस बनाम फ़िजिकल एपियरेंस । हालांकि ब्लोग्गिंग को विनीत भाई जिस गंभीरता और संजीदगी से लेते हैं उससे कभी कभी रश्क होने लगता है कि क्या इतनी संजीदगी के लायक परिपक्व हुआ भी है हिंदी ब्लोग जगत ।

हां बात बेशक सुनने कहने में अच्छी न लगे , मगर है तो हकीकत ही , कम से कम मेरा तो यही निजि विचार है । अब बात करते हैं हिंदी ब्लोग्गिंग मे वर्चुअल स्पेस की , यहां बहस शुरू करने से पहले ये जानना जरूरी है कि जिस वर्चुअल यानि आभासी दुनिया की बात हो रही है क्या सच में हिंदी ब्लोग्गिंग अभी भी वर्चुअल रह गया है । जो मित्र इसे पश्चिमी देशों , अंग्रेजी भाषा या और अन्य किसी भाषा के अनुरूप हिंदी ब्लोग जगत को भी मात्र आभासी दुनिया मानने की भूल कर रहे हैं उन्हें ये बात अच्छी तरह समझनी होगी कि हिंदी ब्लोगजगत उन तमाम अन्य भाषाओं की ब्लोग्गिंग जैसा कभी भी मात्र आभासी नहीं रहा । पहले जब कुछ सैकडा ब्लोग्गर्स थे तब भी , आज जब हजारों ब्लोग्गर्स हैं तब भी और कल जब संख्या लाखों में पहुंचे तब भी । और फ़िर आखिर किन वजहों से यहां कोई मात्र आभासी बना रहना चाहेगा , क्या करने के लिए । यदि मुझसे ही पूछा जाए कि मैं आभासी बना रहता तो बहुत कुछ कर पाता शायद वो सब , जो अब अपनी पहचान बता कर नहीं कर पाता , या शायद कि करना नहीं चाहता । जब बडे बडे पहचान वाले नेता अभिनेता, कलाकार , साहित्यकार भी इस दुनिया में आने के बाद , जबकि हम जानते हैं कि बेशक अमिताभ बच्चन , या मनोज बाजपेयी के ब्लोग पर कुछ पढ के टीप आते हैं और शायद जीवन भर कभी उनसे रूबरू न हों मगर वे भी आभासी कहां रह पाए हैं , और उनकी भी फ़िजिकल एपियरेंस तो हो ही रही है इस समाज के बीच , ब्लोग्गिंग के समाज से निकल कर । हिंदी ब्लोग्गिंग में जब , किसी साहित्यकार पत्रकार का निधन होता है तो क्यों ये वर्चुअल संसार अपने फ़िजिकल अनुभवों , उनसे जुडे सभी बातों /यादों को अपनी पोस्टों के माध्यम से साझा करने लगता है । आखिर किसी त्यौहार पर, किसी के जन्मदिवस पर, किसी समारोह की सूचना पर क्यों संदेशों का आदान प्रदान होने लगता है , और सबसे बडी बात कि बधाई लेने देने वालों को बखूबी पता होता है कि वे किसे बधाई ले दे रहे हैं ? अभी उस वर्चुएलिटि के नाम पर यदि हिंदी ब्लोग्गिंग में कुछ हो रहा है तो वो है सिर्फ़ अनाम शनाम बन के किसी को गाली देना , भद्दे तरीके से उसकी आलोचना करना , किसी विवाद को बढावा देना, उकसाना , और अब तो वो भी फ़िजिकैलिटी तक पहुंच रहा है जी ।

अब बात चर्चा डोमेन की , हालांकि ये दो बेहद मजबूत ब्लोग पक्षों के बीच की बात है और मुझे पता नहीं कि आखिर मुझे यहां इस विषय में कुछ कहना चाहिए या नहीं मगर चूंकि वर्चुअल स्पेस बनाम फ़िजिकल अपियरेंस और चर्चा डोमेन विवाद लगभग संदर्भ में ही सामने आए हैं तो स्वाभाविक रूप से इसकी बात भी निकल ही आई । मुझे हैरत और अफ़सोस है कि जब किसी लटपट से मुद्दे पर हम इत्ता सारा पढ लिख जाते हैं तो फ़िर इस मुद्दे पर आखिर ये चुप्पी क्यों , जब यहां सबके मत जानने की बात हो रही है , सबकी राय पूछी जा रही है तो कहिए न खुल के । चर्चा डोमेन का मामला ( मैं मामला ही कहूंगा , विवाद नहीं क्योंकि जबरन उसे विवादित बनाने के बावजूद मुझे ये मामला ही लगता है ) जब शुरू हुआ और उसकी प्रतिक्रिया स्वरूप चिट्ठाचर्चा ब्लोग ने अपना प्रतिरोध दर्ज़ किया तो सबसे पहले तो मुझे थ्री इडियट के आमिर खान और पाईव प्वाईंट समवन के लेखक चेतन भगत की याद हो आई , यानि पूरी पिक्चर हिट होने के बाद विवाद की शुरूआत , मगर फ़िर इतने दिनों की चुप्पी क्यों , जैसा कि चर्चा डौट.कौम की तरफ़ से कहा गया है कि अब जबकि डेढ महीने तक उस पर काम होने के बाद ये बात उठी है .....। चलिए शुरू से शुरू करते हैं , मैं उतना तकनीक सबल नहीं हूं इसलिए ज्यादा नहीं जानता , अभी भी जब कोई नया ब्लोग बनाने की कोशिश करता हूं तो नाम डालने से पहले आता है ....संभावना जांचे ....यानि कि कहीं वो पहले ही तो नहीं दर्ज़ हो चुका है ....नहीं तो फ़िर आप उस नाम को ले सकते हैं । यहां वर्चुअल वाले ये स्पष्टीकरण दे सकें तो अच्छा होगा कि यदि सिर्फ़ यही criteria है नए डोमेन और ब्लोग बनाने का तो फ़िर इसमें फ़िजिकैलिटी की संभावना क्यों तलाश की गई .....मान लीजीए कि यदि अमेरिका से मि. रिचर्डसन ...या जांबिया से मि. हावर्ड ( जाहिर है वर्चुअल लोग , विशुद्ध वर्चुअल लोग तो आपको ऐसे ही मिलेंगे हिंदी ब्लोग्गिंग में ) चर्चा डोमेन को ले लेते तब भी यही दुहाई कोई दे पाता क्या ??? तो सिर्फ़ इसलिए न क्योंकि जिन्होंने लिया है उन्हें आप फ़िजिकली जानते हैं इसलिए आ गए आमने सामने ? अब बात करते हैं नैतिकता की ....हालांकि एक चर्चामंच के रूप में चिट्ठाचर्चा ब्लोग का अपना एक विशिष्ट स्थान रहा है और आगे भी रहेगा ...मगर जब इसे नैतिकता से जोडने की बातें होती हैं न ....तो मैं सोचता हूं कि ये बातें इतनी ही संजीदगी से तब क्यों नहीं होती जब ...चिट्ठाचर्चा में चर्चा के साथ और कई बार तो चर्चा के अलावा भी वो सब होता है चलता है या होने और चलने दिया जाता है जो किसी भी तरह से नैतिकता के दायरे में तो नहीं ही कहा जा सकता । और इन दिनों एक उंगली करता ब्लोग जब ....उन्हीं पुराने गरिमामय दिनों (जिन दिनों की दुहाई बार बार दी जा रही है )की टिप्पणियां ( जो कि जाहिर है सिर्फ़ उन्हीं लोगों की आपसी टिप्पणियां हैं जो तब ब्लोग्गिंग करते थे , पुराने ,वरिष्ठ ,और भी जो लगाना चाहें, वो ब्लोग्गर ) दिखा पढा रहा है तो लगता है कि पराकाष्ठा तो पहले ही हो चुकी है । चर्चा डोमेन मामले का फ़ैसला जो भी हो , मगर अभी से ये भी कह देना कि जैसा चिट्ठाचर्चा ब्लोग कर चुका है वो कोई और कर के दिखाए तो .......ये तो वक्त पर ही छोड दिया जाए तो बेहतर बात होगी । वैसे मेरी समझ में तो अब जितनी भी चर्चाएं इन दिनों प्रयोग के रूप में सामने आ रही हैं वे बखूबी अपना काम , कम से कम , साफ़ नीयत से तो कर ही रही हैं । आगे इस विषय पर होने वाले फ़ैसले की प्रतीक्ष तो रहेगी ही ॥

अब चलते चलते बात दिल्ली ब्लोगर बैठक की ........अरे रे रे...जब इतना पढ ही लिया तो ये भी झेलते जाईये न .....मैं ये बात उन लोगों के लिए कह रहा हूं जिन्हें शायद इस ब्लोगगर बैठक के आयोजन की घोषणा में भी कोई ......कुछ ढका छुपा , दिख रहा है ....उन्हें फ़िर से स्पष्ट कर दूं कि ये बिल्कुल उसी तरह से है जैसे मैंने आपको अपने घर पे चाय और खाने पर बुलाया है (घर छोटा है इसलिए उस निर्धारित स्थान को ही मेरा दालान मान लीजीए न ) और इसके लिए मुझे न तो कोई प्रायोजक मिला है न ही प्रभु की कृपा से मुझे इसकी जरूरत है ,बस जो भी हुआ या हो रहा है या कि आगे होगा वो अपनी गाढी कमाई ( जाहिर है कि ये कहने की जरूरत नहीं है कि इस ब्लोग्गिंग , ब्लोग्गर बैठक और इन क्रियाकलापों से मुझे कोई कमाई नहीं हो रही है , और न ही मेरा स्ट्टेस किसी बडे हीरो वाला हुआ या होगा )में से ही होगा तो फ़िर सबके साथ बैठ कर बतियाएने के लिए मुझे किसी एजेंडे या झंडे की जरूरत कभी महसूस नहीं हुई । सभी आमंत्रित हैं जो भी आना चाहें । फ़िलहाल तो बस इतना ही तय है कि राज भाटिया जी सात समुंदर पार से मिलने के लिए आ रहे हैं तो ये एक सुंदर बहाना बन गया है । इसलिए मन में सिर्फ़ मिलन की चाहत लिए इस ब्लोग्गर बैठक के आयोजन का निर्णय ले लिया है , उम्मीद है कि आपको अफ़सोस नहीं होगा मिलके । आज बहुत ज्यादा झेलना पडा न आपको .........मिलता हूं

मंगलवार, 26 जनवरी 2010

सिर्फ़ ब्लोग्गिंग ही सब कुछ नहीं है , अगली ब्लोगर्स बैठक की घोषणा



आज जब ये पोस्ट लिखने बैठा तो समझ ही नहीं पा रहा था कि लिखूं कैसे और क्या आखिर दो विरोधाभासी बातें एक पोस्ट में ही कहना करना ठीक होगा या नहीं , मगर फ़िर सोचा कि जब है तो है यही बात । और यदि इतना सोच नोच के लिखना होल तो ब्लोग्गिंग की स्वाभाविकता ही कम नहीं हो जाएगी सो जैसा का तैसा ठेल रहा हूं । इससे पहले कि बात को आगे बढाऊं ये बताता चलूं कि कल छत्तीसगढ में हुई ब्लोग्गर्स मीट के लिए सभी शामिल मित्र ब्लोग्गर्स को और पूरे हिंदी ब्लोगजगत को इसकी सफ़लता के लिए बधाई । ये मीट कई मायनों में अब तक की बहुत सी सफ़लताओं को अर्जित करने वाली पहली मीट रही , मसलन विशुद्ध रूप की ब्लोग्गर मीट, एक प्रांतीय इकाई के रूप में संगठित होते ब्लोग्गर्स, इसमें ब्लोग्गर्स के लिए कार्यशाला आयोजित करने जैसे निर्णय आदि । इश्वर करे कि ये यात्रा यूं ही निर्बाध गति से चलती रहे ॥

ब्लोग्गिंग में सक्रियता के हिसाब से पिछला साल मेरे लिए सबसे ज्यादा सक्रियता वाला रहा और ये थोडा स्वाभाविक भी था क्योंकि आखिर कैफ़े के एक घंटे और अपने घर के चौबीस न सही थोडे कम ही सही की ब्लोग्गिंग में एक बुनियादी अंतर तो आना ही था । जब ब्लोग्गिंग में ज्यादा समय दिया तो बहुत कुछ मिला , नए मित्र, साथी, ब्लोग्गिंग....हिंदी ब्लोग्गिंग के बहुत सारे पहलुओं को जानने समझने का मौका , ब्लोग्गर साथियों को करीब से जानने का अवसर, उनसे संवाद स्थापित करने का अवसर और ब्लोग्गिंग की एक अनोखी दुनिया , जिससे बाहर निकला बहुत कठिन है ........बहुत ही कठिन । सोचा था कि जब ब्लोग्गिंग में इतना रमे हैं तो कुछ न कुछ तो बदलने की कोशिश करेंगे ही , और यकीन मानिए प्रयास भी किए या कहूं कि अभी भी हो रहा है , मगर इतना तो इस बीच हुआ ही कि ब्लोग्गिंग को बदलने के चक्कर में ऐसा रमा कि खुद ब्लोग्गिंग ने मुझे ही बदल कर रख दिया । इसका एहसास तब जाके हुआ , जब अचानक पिछले दिनों शिकायत आई , " क्या झा जी आपने तो नई दुनिया में कदम रखते ही हमें बिसरा दिया , आपको याद है कि आपने पिछले पांच महीनों से कोई भी आलेख/व्यंग्य और कोई भी रचना नहीं भेजी है । " और फ़िर साल के अंत तक तो शिकायतों का पूरा पुलंदा ही बंध गया .....नववर्ष की बधाई के साथ एक शिकायत मुफ़्त ..मुफ़्त मुफ़्त ।

तो जी बस हमने भी अब फ़ैसला कर लिया है कि अब संतुलन बनाएंगे और सिर्फ़ एक ही पटरी पर गाडी नहीं दौडाएंगे । हालांकि इसके और भी कई कारण हैं , कुछ समय से लग रहा था कि ब्लोग्गिंग में रहते हुए लेखन का चरित्र और मिज़ाज़ /अंदाज़ भी ब्लोगनुमा होता जा रहा है । जो शायद मेरे प्रिंट माध्यम के लिए उपयुक्त नहीं है । इधर कुछ दिनों से देख रहा हूं कि हमारे कुछ ब्लोग्गर न जाने किस बात का गुस्सा / कौन सी भडास/ कौन सा द्वेष लिए अपने जाने किन उद्देश्यों के लिए , नकारात्मक रुख को तेज़ किए हुए हैं जो चाहे अनचाहे माहौल को दूषित तो कर ही दे रहा है । और इसीलिए मेरी तो सबसे यही गुजारिश है कि इस तरह के कथनों/पोस्टों/टिप्पणियों के लिए सबसे अच्छा ट्रीटमेंट है कि उन्हें बेदर्दी से मिटा दिया जाए , ताकि कम से कम उस लिखने वाले का जो समय लिखने में गया वो व्यर्थ जाता देख वो अपना सर पकड ले । ऐसे में स्वाभाविक रूप से थोडी सी निराशा तो होती ही है और शायद इसी का परिणाम है कि इन दिनों ब्लोग्गिंग में औसत टिप्पणियों में कमी देखने को मिल रही है । खैर ये तो चलता ही रहेगा , मगर मुझे पूरा यकीन है कि जिस तीव्र गति से हिंदी ब्लोग्गिंग विस्तार पा रहा है बहुत जल्दी ही एक बडा मुकाम हासिल करेगा ।

दिल्ली की अगली ब्लोग्गर्स बैठक ७ फ़रवरी को

अब बात कुछ अलग , यानि अगले ब्लोग्गर बैठक की ,वही विरोधाभास की , जी हां आप कहेंगे अभी तो ऊपर कहा है कि ब्लोग्गिंग में रफ़्तार को कुछ कम किया जाएगा और अब नए ब्लोग्गर्स बैठकी की घोषणा भी हो रही है । मगर क्या करें जी , पिछले बरस के वादे को कितना टाला जाए , ये तो टल भी जाता मगर अब जबकि राज भाटिया भाई साहब का आने का कार्यक्रम सुनिश्चित हो चुका है तो फ़िर देर किस बात की लीजीए नोट कीजीए

अगली दिल्ली ब्लोग्गर बैठक दिनांक 7 फ़रवरी 2010 को पूर्वी दिल्ली के लक्ष्मी नगर /शक्करपुर के मधुबन चौक पर स्थित जीजीएस कैफ़े एंड रेस्टोरेंट में , समय दिन के 11 बजे से शाम के 4 बजे तक ।

पहले ही कह चुका हूं को कोई एजेंडा नहीं , झंडा नहीं सिर्फ़ मुलाकात और बात होगी । फ़िर भी जिन्हें लगता है कि विषय हो तो बेहतर होगा वे अपने विचार , ब्लोग्गिंग में आने , ब्लोग्गिंग की मुश्किलें , मीडिया और ब्लोग्गिंग आदि विषयों पर हमसे बांट सकते हैं । सुना पढा कि अपने मित्र लोग माईक जी को देखते ही घिघिया जाते हैं , सो इसका भी पक्का इंतजाम है ..........यानि कोई माईक शाईक नहीं । अपने अपने सुर ताल , अपना अपना राग खुद ही गाईये हम उसी हिसाब से आनंद लेंगे ।जिन लोगों को ये लगता है कि ब्लोग्गर्स बैठक सिर्फ़ गुटबंदी के लिए होती है और जिन्हें ये आशंका हो रही है कि कहीं परिवार में होने वाली खींचतान और उठापटक ब्लोग्गिंग में भी न शुरू हो जाए .....उनके लिए सिर्फ़ इतना कि ..आप देखिएगा ...परिवार में सिर्फ़ खींचतान ही नहीं प्यार भी होता है , स्नेह भी होता है , एक दूसरे पर विश्वास भी होता है ......क्यों आप देखेंगे न ?

मेरा पूरा प्रयास है कि इस ब्लोगगर्स बैठक में हमारी महिला ब्लोग्गर्स भी भागीदारी करें और अपना विचार रखें । मुझे खुशी है कि मुझे इस दिशा में उनसे सकारात्मक जवाब मिला है । कौन कौन रहेगा , कौन कौन आएगा इसकी जानकारी समय आने पर दी जाएगी ॥

चलते चलते एक छोटी सी झलक दिखाता चलूं कि कौन कौन पधार सकते हैं

लखनऊ से : श्री महफ़ूज़ अली जी और रविंद्र प्रभात जी

राजस्थान से : श्री दिनेश राय द्विवेदी जी

जर्मनी से : श्री राज भाटिया जी

छत्तीसगढ से : श्री बी एस पाबला जी , ललित शर्मा जी , और कुछ और ब्लोग्गर मित्र गण

दिल्ली से : श्री अविनाश वाचस्पति जी, श्री खुशदीप सहगल जी ,कार्टूनिस्ट इरफ़ान जी , संभवत: डा. टी एस दराल जी , भाई विनीत उत्पल जी ,भाई मिथिलेश दूबे और हिंदी साहित्य मंच से जुडे नीशू तिवारी, श्री राजीव तनेजा जी, श्री नीरज जाट जी ,श्री प्रवीण पथिक , श्री आशीष अंशु, श्री मोईन शम्सी, श्री एम वर्मा, श्री पवन कुमार, श्री सतेन्द्र जी और भी बहुत से ब्लोग्गर मित्र जिन्होंने अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराने का वादा किया है ।तो मिलते हैं फ़िर ......................

रविवार, 24 जनवरी 2010

ब्लोग्गिंग में आए नए मित्रों के लिए कुछ जरूरी /गैर जरूरी बातें

"झाजी मैं ब्लोग्गिंग छोड रहा हूं , बस यार अब नहीं करना " मित्र सत्येन्द्र जी ने मुझे चौंका दिया । मैं सोचने लगा आयं ये क्या , इसे क्या हो गया , अभी तो कुछ समय पहले ही ब्लोग्गिंग में इन्हें हमने घुसेडा था मगर इत्ती जल्दी टंकी आरोहण ......हमें तो पूरा यकीन था कि इन्हें तो टंकी महात्म्य के बारे में पता भी नहीं होगा फ़िर .......अरे हुआ क्या आखिर .....कोई तल्ख टीप मार गया क्या ??? कुछ बताओ तो सही

"क्या बताऊं आपने तो ब्लोग्गिंग में आने से पहले पता नहीं क्या क्या सपने दिखा दिए थे , फ़लाना ढिमकाना , और तो छोडो बांकी बातें , आपने कहा कि लोग आपको पढके तुरंत ही उस पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं ,अजी क्या खाक करते हैं । पिछली सात पोस्टों से न तो किसी ने पढा और न ही कोई टिप्पणी की मेरा तो मन ही टूट रहा है इस ब्लोग्गिंग से "। इसके बाद मैं सोचने लगा कि ये बात तो हमने भी कभी सोची थी और शायद देर सवेर हरेक ब्लोग्गर के मन में आती ही होगी खासकर नए ब्लोग मित्रों के मन में ,अब तो जरूर ही , जबकि मैं पिछले कुछ समय से पुन: देख रहा हूं कि पोस्टों पर टिप्पणियों की संख्या में औसत कमी आई है । तो सोचा कि आज अपने नए ब्लोग्गर्स मित्रों से चंदा बातें उनके लिए की जाए ।

सबसे पहली बात तो ये कि ब्लोग्गिंग में सबके आने के अलग अलग कारण और बहाने होते हैं , कुछ लोगों को बाकायदा ये पता होता है ब्लोग्गिंग क्या है , उसके कायदे, उसके तकनीकी पक्ष, एग्रीगेटर्स आदि के बारे में पूरी जानकारी होती है , मगर अधिकांशत : हमारे जैसे ही लिखास और छपास के स्वाभाविक कीटाणु से उद्वेलित होकर कूद पडते हैं और मेरा अनुभव ये कहता है अधिकांशत: ये स्थिति उन्हीं के साथ होती है । तो अपने उन हमारे जैसे मित्रों के लिए ये जानना और समझना बहुत ही जरूरी है कि , यदि आप आमिर और शाहरुख नहीं , प्रियंका, एशवर्या भी नहीं हैं , प्रेमचंद. तेंदुलकर, आदि नहीं हैं तो फ़िर क्यूं भाई क्यों , आख्रिर क्यों आप ये उम्मीद लगा बैठते हैं कि इधर आप लिखेंगे और उधर उसे सब हाथों हाथ ले लेंगे ।इसलिए ये बात गांठ बांध लीजीए कि यदि टिप्पणियों के आने न आने से आपकी ब्लोग्गिंग प्रभावित होती है तो फ़िर आपको कम से कम थोडे दिन तो धैर्य धारण करना ही होगा ।

वैसे सारी गलती पाठकों की भी नहीं होती , बहुत बार तो होता ये है कि ब्लोग बनाने के बाद उसे ज्यादा ऐग्रीगेटर्स से जोडा ही नहीं जाता तो स्वाभाविक है कि पाठकों की पहुंच तो कम होगी ही और फ़िर टिप्पणी भी तो मेरी सलाह है कि आप सबसे पहले अपने ब्लोग को विभिन्न चिट्ठा संकंलकों से जोडें ,आपकी सुविधा के लिए मैं यहां कुछ संकंलंकों के लिंक दे रहा हूं :-

ब्लोगवाणी


चिट्ठाजगत

हिंदी ब्लोग्स


रफ़्तार

ब्लोगप्रहरी

अब एक और बात, जब भी नए ब्लोगस पर हम कोई टिप्पणी छोडने जाते हैं एक जिस बात से सबसे ज्यादा खीज होती है वो है वर्ड वेरिफ़िकेशन । मैं मानता हूं कि बहुत से ब्लोग्गर्स को ये पता भी नहीं होता कि ऐसी कोई बला पाठकों को उनकी पोस्ट पर टीपने में व्यवधान डालता है , और बहुत अच्छी बात ये है कि हमारे बहुत से साथी ब्लोग्गर्स अपने स्वागत संदेश के साथ उन्हें ये वर्ड वेरिफ़िकेशन हटाने की न सिर्फ़ सलाह देते हैं बल्कि उन्हें हटाने की विधि भी बता देते हैं तो सबसे पहले तो नए ब्लोग्गर्स बंधुओं को ये वर्ड वेरिफ़िकेशन हटाने पर ही ध्यान देना चाहिए ॥

चलिए ये तो हुई कुछ प्रायोगिक बातें जो नए ब्लोग्गर्स को करनी चाहिए और देर सवेर वो कर ही लेता है ।अब आपको कुछ छोटे शार्टकट्स भी बता देते हैं । हालांकि इसे सूत्र वाक्य तो कतई न मानें मगर फ़िर भी आजमाया तो जा ही सकता है ।

ब्लोगजगत में होने वाली चिट्ठाचर्चाओं को अवश्य ही पढें और देखें ,इससे न सिर्फ़ आपको एक साथ ढेर सारी अच्छी पोस्टें पढने को मिल जाएंगी बल्कि , चूंकि चर्चा हमेशा ही पाठकों के बीच आकर्षण का केंद्र रही है इसलिए आपको उनके बीच परिचय बनाने और उनका परिचय जानने में भी आसानी होगी ।

ब्लोगजगत में चल रहे गंभीर और अगंभीर लेखन के बीच में कुछ ब्लोगों द्वारा नियमित /अनियमित/दैनिक/साप्ताहिक ...और बेहद रोचक ,ज्ञानवर्धक पहेलियों का आयोजन किया जाता है । य़े पहेलियां बहुत कम समय में ही लोकप्रियता के नए आयाम गढ चुकी हैं । नए ब्लोग्गर्स को प्रयास करना चाहिए के वे इनमें भाग लें । इसे इस तरह से देखें कि ये उनके लिए एक प्लेटफ़ार्म की तरह काम करेगा सबसे परिचय के लिए ॥

तो आज के लिए बस इतना ही, शेष फ़िर कभी ...

बुधवार, 20 जनवरी 2010

खुशियों की होम डिलीवरी


जी हां मैं समझ रहा हूं कि आप लोग सोच रहे होंगे कि आज तो पिज्जा की होम डिलिवरी का जमाना है और वो भी बाकायदा पेमेंट करके मिलती है ।और यदि मुफ़्त में किसी चीज़ की होम डिलिवरी होती है तो वो है तनाव /दुख / गम और इनके ही भाई बंधु .........॥ तो ऐसे में यदि खुशियों की होम डिलिवरी की जाए , या कोई आपके पास करे तो .......कैसा लगता है ,....अच्छा लगता है टाईप फ़ीलींग होगी न । तो कीजीए न आप भी , अरे इसमें कौन सी मुश्किल है ॥

अपनी किताबों की आलमारी /मेज की दराज या ऐसे ही खजाने छुपाने वाली जगह को टटोल के देखिए ,अरे नहीं नहीं कोई खास काम नहीं कह रहा हूं करने को , कोई किताब पढ के उसका विश्लेषण करने को भी नहीं कह रहा , बस इतना कीजीए कि कोई बरसों पुराना कोई धूल में अटा, कहीं से फ़टा , मुडा तुडा खत , कोई पोस्टकार्ड, कोई प्यारा सा खत पा कर देखिए , उसे निहारिए और फ़िर पढ के देखिए । मुझे पूरा यकीन है कि आपको न सिर्फ़ पुराने दिन याद आ जाएंगे बल्कि बहुत कुछ रुमानी हो जाएगा । हुई न खुशियों की होम डिलिवरी .......। चिट्ठी नहीं मिली , कोई बात नहीं , इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं , अब तो डाकिया भी चिट्ठी के अलावा सब लाने को तैयार है ।

चलिए फ़िर एक काम कीजीए , आप अपना पर्स खोलिए , अरे नहीं नहीं जी कोई पार्टी नहीं देनी है , अरे चंदा भी नहीं देना है । आप तो बस ये कीजिए कि पर्स को खंगाल के कोई ऐसा फ़ोन नं निकालिए जिसे आपनी जाने अनजाने नोट कर लिया , किसी यार दोस्त के नाम का नंबर , किसी अपने बेगाने का नं , और कोई तो ऐसा नंबर जिसके लिए आप जानते ही नहीं या भूल गए हैं कि है किसका .........मिलाईये न ..........जाने आपके यहां या उसके जिससे बात हुई उसीके यहां हो जाए खुशियों की होम डिलिवरी ।

चलिए
ये न सही तो फ़िर ऐसा करते हैं , पडोस के शर्मा अंकल , मिश्रा आंटी, तिवारी चाचा, पांडे काका , किसी का कोई ऐसा काम कर देते हैं जो कराने के लिए वे बेचारे कब से परेशान हैं । डाक्टर के पास ले जाना, कोई दवाई ला देना , या शायद पिछले काफ़ी समय से उनका फ़ोन का , या पानी का , बिजली का कोई बिल पेंडिंग है ...भई जमा करवाने वाला तो लंदन/अमरीका/फ़्रांस या आस्ट्रेलिया चला गया है , उसे ही जमा करवा दिया जाए । देखिए करके ......खुशियों की होम डिलिवरी ।


चलिए पास के पार्क में चलते हैं , अपने बच्चों और बहुत सारे बच्चों को बुला कर , उनके साथ कोई दिलचस्प खेल खेलते हैं ,छुपन छुपाई , पकडम पकडाई ,पिट्ठू गरम या कोई और खेल खेला जाए । जानते हैं मैंने अक्सर ये बात गौर की है कि जब जब मैं ऐसा करता हूं तो जितनी खुशी मुझे होती है , उससे ज्यादा आनंदित और उत्साहित तो बच्चे हो जाते हैं । और बीच बीच में फ़ूल पौधों से बात करने का आनंद तो अनुपम होता ही है , हां मगर अब चिडियों की चहचहाहट नहीं मिलती , .मगर खुशियों की होम डिलिवरी तो हो ही जाती है ।

अरे
मारिए गोली , आप एक काम कीजीए , सर्दी की धूप में छत पर बैठ जाईये ( और ऐसी ही सलाह गर्मी के समय में किसी दिन जब हवा चल रही हो मंद मंद , के लिए भी है ) और रेडियो सुनिए । अरे नहीं नहीं जी कोई समाचार नहीं , कोई ऐफ़ ऐम भी नहीं , विविध भारती सुनिए , भूले बिसरे गीत सुनिए ....और सुनिए हवामहल । फ़िर कहिएगा कि ....हुई न खुशियों की होम डिलिवरी ॥
अरे बहुत सारे नुस्खें है जी एकदम कमाल कमाल , आप कोशिश तो कीजीए । जिंदगी बहुत ही छोटी है , यदि प्यार से जीनी हो तो और भी छोटी , तो फ़िर एक एक पल ऐसा हो , या ऐसी कोशिश तो हो कि खुशियों की होम डिलिवरी होती रहे ...होती रहे ॥

रविवार, 17 जनवरी 2010

अंत में फ़ुनसुक बांगडू बनना जरूरी है !!!!



आमिर खान की पिक्चरें , पहले की भी और अब की तो निश्चित रूप से मुझे प्रभावित करती रही हैं । बेशक उनसे जुडे विवादों और उन पर आमिर के घोर व्यावसायिक रुख के बावजूद , सिनेमा के साथ उनके द्वारा, उनकी टीम द्वारा किए जा रहे प्रयोग बहुत कुछ देखने वाले को दे जाते हैं । ऐसा ही कुछ कुछ ये हालिया पिक्चर थ्री इडियट्स के साथ हुआ । इस पिक्चर को अब तक पूरे नौ बार देख चुका हूं और हर बार अलग अलग बातें मिल रही हैं । एक सिनेमा में ही इतनी कुछ है और इसलिए मुझे हर बार कुछ नया ढूंढने में कोई दिक्कत नहीं होती । इस बार देखा तो ये समझा कि यदि आखिर में बाबा रणछोडदास श्यामलदास चांचड .................फ़ुनसुक बांगडू नहीं निकलता तो । हां ...सोच के देखिए न किस जिस चतुर रामलिंगम ने पांच साल पहले शर्त लगाई थी कि वो अपने तरीकों से ज्यादा सफ़ल होगा यदि अंत में सिर्फ़ एक संवाद में ही आमिर खान ये नहीं बताता कि वो खुद से भी सफ़ल जिस व्यक्ति को ढूंढ रहा है पागलों की तरह वो असल में उसीका सहपाठी ..फ़ुनसुक वांगडू है तो ........तो भी क्या हम इस कहानी को उसी तरह से देख पाते ???? वो सारी तरकीबें , वो सारे नए फ़लसफ़े , वो सारे तर्क जो पूरी पिक्चर के दौरान रखे गए क्या उनसे उसी तरह सहमत हुआ जा सकता था ?????? शायद नहीं न ।

मतलब ये कि सफ़लता ही आखिरी मंजिल है और इसके आगे सब गौण है । जब हम कुल लगभग १६ साथी ग्रेजुएशन के बाद दिल्ली पहुंचे थे तो सभी की आखों में एक ही सपना था ...अपने प्रयासों से सफ़लता हासिल करना और उस समय हमने ,हम सबने ही खूब जी तोड मेहनत की थी । हमारे एक सीनीयर हुआ करते थे जिन्होंने मुझे कुछ बातें बताई , जाने पिक्चर देखते हुए और उसके बाद भी याद आईं सोचा बताता चलूं

वो कहते थे कि जितना ये जानना जरूरी है कि क्या करना चाहिए या कि क्या पढना चाहिए उससे ज्यादा जरूरी ये जानना है कि क्या नहीं करना या क्या नहीं पढना है

यदि ज्ञान पाने के लिए पढना है तो उसकी तैयारी अलग तरह करनी होती है , यदि सफ़ल होने के लिए तो उसकी तैयारी अलग तरह से करनी होती है ये खुद तय करो कि क्या और कैसे करना है ??

यदि ज्ञान पाने के लिए पढोगे तो जब वो मिल जाएगा तो देर सवेर तुम्हें सफ़लता भी मिलेगी ही , मगर यदि सिर्फ़ सफ़लता के लिए पढोगे तो फ़िर निश्चित रूप से उसमें जो सीमीतता होगी वो तुम्हारे ज्ञान को भी एक हद तक समेट कर रखेगी

और अंतिम बात ये कि , सफ़लता ही अंतिम मंजिल है दुनिया चाहे जो भी कहे मगर यथार्थ की दुनिया में तो सच यही है कि जो सफ़ल है वही सफ़ल है ज्ञान तो तुम्हारा भी तभी दिखेगा जब सफ़ल होगे


पता नहीं कि कौन सी बात कितनी ठीक थी कितनी गलत ????मगर जेहन में अब तक गूंजती है । सोचता हूं कि ये तो सच है ही कि सफ़लता के बिना सब बेमानी है । देखिए न अब हो सकता है कि आमिर खान ने मशीन की परिभाषा को चतुर रामलिंगम से ज्यादा बेहतर बताया मगर यकीनन ही परीक्षाओं में तो उसे भी उसी परिभाषा को शायद किसी बेहतर तरीके से मगर उसी भाषा में लिखना पडा होगा । और ये भी कि यदि आज मैं भी सफ़ल नहीं होता कम से कम इतना कि अपने पैरों पर खडा सरकारी अधिकारी के रूप में कार्यरत तो ......क्या फ़िर भी यूं मजे से ब्लोग्गिंग कर रहा होता ?????सोच रहा हूं !!!!!

शुक्रवार, 15 जनवरी 2010

मैं ........एक चिट्ठाचर्चाकार के रूप में ! (झा जी अब नहीं कहिन )




कल अपनी दो लाईनों की पटरियां बिछाने के थोडी देर बाद ही कल्पतरू वाले विवेक भाई की पोस्ट आई , जिसमेंउन्होंने चिट्ठाचर्चाकारों द्वारा अपनी पोस्ट का जिक्र किए जाने पर अफ़सोस जताया था , और अपना दुख जतायाथा हालांकि मैं अकेला ही एक ऐसा ब्लोग्गर नहीं हूं जो दिन भर ब्लोगजगत में आई पोस्टों की चर्चा करता हूं , बल्कि सच कहूं तो जैसा कि मैंने कहा भी थी कि एक अर्थ में तो मैं चिट्ठाचर्चाकार हूं ही नहीं , बस अपनी दो पंक्तियोंजिन्हें कोई तुकबंदी कहता है , कोई दो लाईना , और मैं खुद ब्लोग पटरियां ) में उस पोस्ट का ट्रेलर दिखाते हुएउन्हें पूरी पिक्चर देखने के लिए प्रोत्साहित या कहूं कि उकसाने की (यदि किसी के उकसावे पर मैं कोई पोस्ट पढनेजाऊं तो मुझे उस उकसाने वाले पर गुस्सा नहीं आएगा , ऐसा मुझे लगता है ) कोशिश करता हूं और ये तो नहींजानता कि मैं कितना सफ़ल या असफ़ल होता हूं जितना समय इस विश्लेषण में लगाऊंगा ,उतने में तो जानेकितना पढ लिख जाऊंगा , और यही बेहतर भी लगता है मुझे मगर कल शाम की पोस्टों और उन पर आईप्रतिक्रियाओं ने मुझे ये सोचने पर मजबूर तो जरूर किया कि मैं खुद को एक चर्चाकार के रूप में अपना सब कुछआपके सामने रख सकूं

मुझे कहने में कोई संकोच नहीं कि जब ब्लोग्गिंग शुरू की थी तो ,चिट्ठाचर्चा नाम या उसके स्वभाव से परिचित भीनहीं था ।मगर ब्लोग्गिंग में नियमित होते ही इसका अंदाज और महत्व , सबसे बढ कर इसकी रोचकता और लोकप्रियता ने मुझे काफ़ी प्रभावित किया अब ये स्वाभाविक भी था , जब हम अपनी पोस्ट पर आई टिप्पणियोंको पढ के इतने खुश होते हैं , तो फ़िर जब अपनी पोस्ट की ही चर्चा हो तो कैसे नहीं खुशी मिलेगी और समय था कि चिट्ठाचर्चा ब्लोग में अपने ब्लोग की चर्चा होना बहुत ही प्रसन्नता का बायस होता था , और मैं भी इसकाअपवाद नहीं था चिट्ठाचर्चा के दूसरे स्तंभ ,अपने महेन्द्र मिश्रा भाई से परिचय हुआ , और सच कहूं तो तभी मुझे लगा कि कुछ नया और रोचक किया जा सकता है चर्चा के बहाने चिट्ठाचर्चा शुरू करने के पीछे तब एक और बडाकारण जो था वो था , ब्लोग पाठको को चर्चा का एक और विकल्प उपलब्ध कराना मगर मेरी मुश्किल ये थी किमैं तकनीकी रूप से इतना ही काबिल था कि मुझे लिंक तक लगाना नहीं आता था , सो सबसे पहले ब्लोग साथियोंसे मदद मांगी सभी ने सलाह के साथ साथ ,अविनाश वाचस्पति भाई ने फ़ोनिया के बिल्कुल लाईव क्रिकेटस्टाईल में मुझे लिंक बनाना सिखाया और फ़िर सिर्फ़ कुछ मिनटों में पहली चिट्ठी चर्चा दो लाईना तैयार हो गई

मुझे गुमान नहीं था कि अलग शैली और अंदाज के कारण या एक और विकल्प होने के कारण आप सबको ये पसंदआई बस जब आप सबको पसंद आई तो फ़िर मैं तो वैसे भी रवानी में था ही तो बस चल पडी रेल कुछ ही दिनोंकी नियमित/अनियमित चर्चा के बाद चिट्ठाचर्चा से जुडने का आदेश हुआ ।मगर मैंने हमेशा बंधनमुक्त रहने औरकोई भी जिम्मेदारी से बचने के प्रयास में सप्रेम और सादरपूर्वक इंकार किया इसके बाद समय असमय चर्चा चलती रही, हालांकि बीच बीच में मुझे ये प्रतिक्रिया भी मिली कि ,ये कोई अच्छी बात नहीं है और इससे बेहतर हैकि मैं कोई और रचनात्मक लेखन करूं अब मैं समझ नहीं पाया कि भले इन दो पंक्तियों को लिखने में शायद कोईरचनात्मकता होती हो मगर ये मेरे लिए बहुत ही आसान और स्वाभविक सा हो गया था जैसे कोई नहाते नहातेगुनगुनाता है मगर जब ऐसा एक से ज्यादा बार हुआ तो मैंने इसे रोकने की इच्छा जताई मगर सबके प्यार नेमुझे अपने निर्णय को बदलने पर विवश कर दिया

आज देखता हूं तो मुझे बहुत ही खुशी होती है कि जिस विकल्प की बात मैं कर रहा था , तो उसकी भरमार ही भरमार है आज चर्चा की कोई कमी नहीं है और ही चर्चाकारों की , मंच भी माशाअल्लाह बढते ही जा रहे हैं ,औरजैसा कि मैं शुरू से कहता जा रहा हूं कि यदि हमारा ब्लोग परिवार बडा हो रहा है तो ये जरूरी है कि ये विस्तार हरजगह और हर पहलू पर हो फ़िर चाहे चो चर्चा हो या संकलक और ये बहुत ही अच्छी बात है कि इस दिशा में कामहो रहा है और प्रतिफ़ल भी रहा है एक चिट्ठाचर्चाकार के रूप में मैं अपनी बात रख चुका हूं कई बार इससेपहले भी जब एकल्व्य जी ने ऐसा ही एक प्रश्न पक्षपात को मुद्दा बना कर कही थी और अब विवेक भाई ने भी कमोबेश अप्रत्यक्ष रूप से यही कहा है

तो अब जबकि कुछ समय तो हो ही गया है इन पटरियों पर गाडी दौडाते हुए ,और जब मुझे महेन्द्र भाई नेसमयचक्र पर चर्चा करने का आमंत्रण भेजा था तो यही सोच कर स्वीकार किया कि यहां पर इसी बहाने कुछ अलग प्रयोग कर सकूंगा
मगर फ़िलहाल की स्थितियों में अब लगता है , और मन कह रहा है मैं अपनी चर्चा को स्थाईविराम दूं इसलिए झा जी कहिन पर अब आपको हम जबरिया दो लाईनों पर नहीं दौडाएंगे जी और हां भगवानके लिए अब ये मत कहियेगा कि ,उसे जारी रखिए , बस इतना ही समझिए कि ब्लोग पोस्टों की चर्चा करने वालाभी तो आपके हमारे बीच का ही कोई ब्लोग्गर साथी है भाई , फ़िर उसकी निष्ठा, और उसकी नीयत पर शक क्यों।अरे भई हमारे पास भी और गम हैं चर्चाने के सिवा आप लोगों ने अब तक जितना प्रेम हमारी दो लाईना को दियावो अनमोल है हमारे लिए मेरी शुभकामना है अन्य सभी चिट्ठाचर्चाकारों और भविष्य में आने वाले सभी चर्चाकारों के लिए भी

सबसे बडी बात , चिट्ठाचर्चा में अपने ब्लोग का नाम आना, या उसकी चर्चा होना ,मुझे खुद कभी भी पोस्ट के बहुत नायाब, बेहतरीन , उम्दा या इन सबके उलट कभी भी नहीं लगा ।और हां पढता तो मैं रहूंगा ही चर्चा भी करूं तो क्या , और लिखते तो सब रहेंगे ही, चर्चा भी हुई तो क्या

बुधवार, 13 जनवरी 2010

ब्लोग चोरों के हक में एक आंदोलन





आखिर नए साल में शास्त्री जी ने एक ब्लोग चोर को पकड के, उदघाटन कर ही दिया , वैसे भी जाने कितने दिन बीत गए थे कोई भी चोर पकडे हुए । चलिए अच्छा हुआ जो साल के पहले ही पखवाडे में हमने सफ़लता हासिल कर ली । और जब से उन्हें पकडा गया है तब से अब तक जाने कितनी पोस्टें और जाने कितनी टिप्पणियां उनको समर्पित करके लिखी जा चुकी हैं और अभी तो पिक्चर बांकी है मेरे दोस्त । ब्लोग पोस्ट चोरों की तरफ़ से एक सादर निवेदन टाईप की रिक्वेस्ट आई ,कहा गया था कि सर जी इतने सारे जने मिल के हमारा सामूहिक चीरहरण जैसी सेवा कर रहे हैं । आप तो फ़ूंफ़ां हो ,कुछ हमारी तरफ़ से रखो न , कोई अपना एंगल डालो न हमारे लिए ताकि सबको हमसे कुछ सहानुभूति सी हो जाए । हमने कहा लो ये कौन मुश्किल है जी । सहानुभूति तो वैसे भी सबको हो रही होगी (जैसे किसी के मरने पर होती है )वैसे वाली । मगर फ़िर भी हमने सोचा कि जब इत्ती रिक्वेस्ट हो ही रही है तो फ़िर एक पोस्ट उनके लिए हमारी तरफ़ से भी सही ।

उनकी तरफ़ से जारी याचिका को आप सबकी अदालत में रखा जा रहा है विचार दिया जाए ॥

१. ऐग्रीगेटर्स से आग्रह है कि , वे मुख्य पृष्ठ पर एक कोना ,एक गोला या कोई भी डिब्बा टाईप का प्लौट उनके लिए निर्धारित करें जहां पर विशेष रूप से उनके लिए एकदम चटक रंग में हाईलाईटेड रूप से उनकी पोस्ट को लगाया जा सके ॥

२. सभी ब्लोग्गर्स से आग्रह है कि ,नियमित लिखें अरे अपने लिए न सही कम से कम उनके लिए तो जरूर ही जो बेचारे आपकी पोस्टों के सहारे अपनी दुकान चला रहे हैं ।

३. भई , सभी चर्चाकारों से गंभीर टाईप रिक्वेस्ट है कि , अपनी अपनी चर्चाओं में , उनकी पोस्ट , मेरा मतलब उनकी इन्सपायर्ड पोस्ट का जिक्र जरूर करें , बेशक असली वाली का जिक्र हो या न हो ,क्योंकि उनका तो हो ही जाएगा किसी न किसी चर्चा में । ब्लोगपोस्ट चोरों को ये फ़ैसिलिटी बहुत कम मिलती है ॥

४. उन तमाम ब्लोग लेखकों , जो पहेली प्रतियोगिता का आयोजन करते या करवाते हैं ,उनसे भी खासखासम खास गुजारिश है कि उनकी भी नजरे इनायत हो इन पर तो क्या बात हो । और फ़िर सोचिए न कितना मजा आएगा , जब पोस्ट दिखा कर पूछा जाएगा , बताईये फ़लाना चोर ने ये रचना किस ब्लोग से चुराई है ???


और भी योजनाएं हैं उनके वैलफ़ेयर की मगर पवार जी ने कहा है कि सारी की सारी अभी नहीं चलाई जाएंगी, थोडा "चीनी कम " हो जाए फ़िर आगे की एक्सक्लुसिव योजना बताई जाएगी ॥

एक वैधानिक सूचना :- इस पोस्ट के लिए हमें ब्लोग पोस्ट चोरों की तरफ़ से एक ब्लैंक चैक दिया गया है जो हिंदी में एडसेंस चालू होने पर कैश हो जाएगा । और कंप्लीमेंटरी पुरस्कार के रूप में उन्होंने हमारी भी कुछ पोस्टें चुराने ,का आश्वासन दिया है ॥जय हो ब्लोग चोर आंदोलन की ॥

सोमवार, 11 जनवरी 2010

फ़ूंफ़ां ब्लोग्गिंग बनाम गंभीर लेखकिंग



पिछले साल का अंत हिंदी ब्लोग्गिंग में जितना उठापटक वाला रहा था ,उससे ये तो अंदाजा था कि नये साल मेंबहुत कुछ और बहुत सारा होने वाला है, मगर ये गुमान कतई नहीं था कि समुद्र मंथन की तरह ब्लोग्गिंग मंथन भीशुरू हो ही जाएगा और आजकल तो खूब मजा रहा है, जब ब्लोग्गिंग में ब्लोग्गिंग की बात हो तो उससेमजेदार कुछ भी नहीं लगता , फ़िर बात जब मजे से ज्यादा गंभीरता/विश्लेषण/तर्क चिंता तक पहुंच जाए तो समझजाना चाहिए कि अब वास्तव में परिवर्तन की चाहत दिख रही है सबसे ज्यादा खुशी मुझे इस बात की हुई कि , इस बहस में, हालांकि ये कोई आयोजित/ प्रायोजित बहस नहीं थी , नये पुराने, बडे छोटे, नवोदित , नियमित/अनियमित ...कहने का मतलब कि सभी ब्लोग्गर्स ने अपने अपने विचार एक दम ठां करके रख दिए और यही तो खासियत है इस ब्लोग्गिंग की इसी संदर्भ में कहीं पढा कि फ़ूंफ़ां ब्लोग्गिंग से ब्लोग्गिंग का स्तर गिर रहा है और अच्छा होगा, बल्कि कहें कि कहा तो ये गया कि ब्लोग्गिंग की बेहतरी इसी में है कि सिर्फ़ गंभीर लेखकिंग की जाए देखिए अब ये मत कहिएगा कि ये क्या लेखकिंग ..अजी गंभीरता आएगी तो शोध तो होंगे ही नवशब्दावेषण नहीं हुए तो काहे कि गंभीरता जी

तो फ़िर वही चिर प्रश्न सामने आके खडा हो गया , यक्ष प्रश्न की तरह , कि आखिर तय कौन करेगा अब तो स्थापित और मान्य स्तंभ भी अपनी जडें बचाने में लगे हैं जाने किन निरे तूफ़ानों ने उनकी जडों को हिला कररख दिया या शायद इसलिए भी कि बरगद सरीखे उन वृक्षों को नई पौध की लंबाई से भय का एहसास होने लगा था जबकि उन्हें तो अपने ऊपर ये भरोसा रखना चाहिए था कि वे वट वृक्ष हैं खैर ये तो वैसे भी क्षरण का दौर है , प्रकृति के लिए भी और शायद साहित्य के लिए भी मगर इस क्षरण के लिए हिंदी ब्लोग्गिंग को ही जिम्मेदार ठहराने का कोई वाजिब कारण अभी तो मुझे नहीं मिला है इसलिए यदि आज ब्लोग्गिंग में सक्रिय और असक्रिय हजारों ब्लोग्स में से किसी एक को भी फ़ूंफ़ां ब्लोगर नहीं कहा जा सकता तब भी नहीं जब खुद प्रेमचंद आकार ब्लोग लिखने लगें हालांकि मुझे लगता है कि यदि प्रेमचंद ब्लोग लिखते तो वे भी बहुत सफ़ल नहीं होते ...उतनेतो कतई नहीं जितने कि सफ़ल वे साहित्य में हुए और ये भी हो सकता था कि कोई फ़ूंफ़ां ब्लोग्गर उन्हें कई मायनों में पीछे छोड जाता मगर इसके बावजूद प्रेमचंद तो वे रहते ही क्योंकि असली प्रेमचंदत्व तो उनमें इसलिए नहीं निकल जाता कि वे ब्लोग्गिंग कर रहे हैं

वैसे भी ब्लोग्गिंग का एक सबसे शक्तिशाली पहलू जिसे अक्सर इस बहस में दरकिनार कर दिया जाता है वो है ब्लोग्गिंग का निरंकुश होना हां निरंकुश ही तो है ब्लोग्गिंग , तभी तो कभी कोई मनोज वाजपेयी , या रवीशकुमार को कंमेंटियाते वक्त ये नहीं सोचता कि वो सीधा उनसे रूबरू है जिनसे यथार्थत: अपने जीवन में शायद ही वोसब कह पाए इस निरंकुशता की कोई हद भी नहीं है , हालांकि अभी गनीमत ये तो है ही कि हमारे संकलक उनबहुत से बेकार /अश्लील /अधकचरे ब्लोग्स ( जो कि बदकिस्मती से हिंदी में भी हैं ) को हम तक पहुंचने देकरएक छन्नी का काम तो कर ही रहा है मगर इसका दूसरा पक्ष ये भी है कि इस निरंकुशता की ताकत को पाकरकई बंधु ब्लोग्गर ठीक उसी तरह उन्मादित हो जाते हैं जिस तरह से कोई रिपोर्टर उस समय हो जाता है जब उसेकिसी एक्सक्लुसिव खबर लाने को कहा जाता है जिस पर शायद उसका स्थाईकरण या इंसेंटिव टिका होता है औरफ़िर सिलसिला शुरू होता है खबर लाने के बदले खबर बनाने का ठीक इसी तरह कभी किसी का नाम लेकर / तोकभी किसी की टिप्पणी को मुद्दा बना कर/ कभी किसी की पोस्ट को ही मुद्दा बना कर धूम धडाम लिखने कीकोशिश की जाने लगती है मुझे लगता है कि निरंकुशता में भी ये गलत परंपरा तो है ही

मुझे लगता है कि एक ही ब्लोग्गर में फ़ूंफ़ां और गंभीर टाईप के लेखन दोनों के स्वाभाविक जीवाणु होते हैं और जबजो हावी होता है , उसका प्रतिफ़ल पोस्ट के रूप में हमारे सामने आता है हां मेरे जैसे लिखने पढने और सच कहूंतो इसे गीजने की हद तक घुसने वाले के लिए जब एक साथ कई मूडों और एक साथ ही कई बातों को अलग अलगअंदाज, और अलग अलग सवरूप में कहना हो तो फ़िर वो ढेरों ब्लोग बना के उन्हें उडेलता रह सकता है मुझे तोकभी कभी लगता है कि आखिर कर क्या रहा हूं मैं , जाने कितने ब्लोग बनाता जा रहा हूं , अलग अलग विषय औरअलग अलग फ़्लेवर के लिए , मगर हर लिहाज से वो हैं तो ब्लोग्गिंग के दायरे में ही और फ़िर मैं क्यों बांटूं उन्हेंफ़ूंफ़ां कैटेगरी या कि गंभीरनेस वाले चोले में ????, फ़िर रिटायरमेंट के बाद जब असली ब्लोग्गिंग शुरू होगी वो फ़ुल टाईम जौब वाली तब तो इतने भी कम पडेंगे ।


कभी कभी ....कुछ यूं भी कहने लिखने का मन करता है सो कह दिया ......ठीक किया न ???

साथ चलने वाले

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...