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गुरुवार, 21 अक्तूबर 2010

सपनों का घर , कमाल के नन्हें पौधे ...और होशियारपुर के बारे में कुछ रोचक बातें ...पंजाब यात्रा -२



सुबह सुबह की हल्की ठंड में जब होशियारपुर बस अड्डे पर उतरा तो पौ नहीं फ़टी थी ..जैसा कि पहले ही सोच चुका था कि इस बार तो मैं हर पल को सहेजने की कोशिश जरूर करूंगा और देखिए न मेरी कोशिश का नतीजा आपके सामने है ......मैं वहां पहुंच तो चुका था मगर जाने क्या सोच कर सिर्फ़ चंद कदमों पर दूर साढू साहब के घर पर तुंरत जाने से बेहतर मुझे बस अड्डे के कोने पर बनी चाय की दुकान में सुबह की पहली चुस्की लेना बेहतर लगा । मैंने वहीं ठंडे पानी से हाथ मुंह धोया और बैठ कर चाय की चुस्कियां लेने लगा । सुबह सुबह की बस पकडने वाले , दिल्ली के लिए जो बसें निकलने वाली थीं ..उनमें दिल्ली दिल्ली की आवाज लगने लगी थी ।




चाय वैगेरह पीकर , मैं पैदल ही निकल पडा । घर पर सभी सुबह उठने वाले थे सो जाग हो चुकी थी । साढू साहब के घर के बारे में क्या कहूं । अभी कुछ समय पहले ही अपने पुश्तैनी मकान से हट कर अपने लिए अलग से एक मकान बनाया है उन्होंने । सच कहूं तो घर देख कर ऐसा ही लगा एकबारगी कि ये सचमुच ही सपनों का घर जैसा है । हालांकि पिछले एक साल से चल रहा निर्माण कार्य अभी पूरी तरह से बंद नहीं हुआ है ।




और धीरे धीरे सब कुछ चल ही रहा है ....मगर इतना तो हो ही गया है कि मैं घूम घूम कर पूरे घर की छवि उतार सकता ..फ़ुर्सत के क्षणों में सुकून पहुंचाते हैं ऐसे दृश्य । सुबह ही उनके छत पर चढ कर लिए गए आसपास के दृश्य मुझे इतने भाए कि मैं लगाता ही उन्हें कैमरों में कैद करता चला गया ।




श्रीमती जी की दीदी जी को पौधों से बडा प्यार है । और ये मेरे लिए बडे ही ताज्जुब और खुशी का विषय था कि उनके यहां , मुझे कमाल के हैरान कर देने वाले नन्हें पौधे मिले । नींबू का छोटा सा पौधा ..जिसमें पत्ते तो कम थे मगर नींबू भरपूर थे ..और नींबू भी बहुत ही खुशबूदार और अनोखे । हमारे बिहार में बरसों पहले ऐसे ही नींबू बचपन में खाए थे जिन्हें हम शायद जमीरी नींबू कहते थे .


..एक बित्ते भर का अमरूद का पौधा ..जिसमें पत्ते भी थे और पूत के पांव पालने में ही दिखाई देते हैं ......की तर्ज़ पर एक अमरूद भी ।


जब बातों का सिलसिला चला तो साढू साहब से मैंने होशियारपुर के बारे में जानना चाहा । बस यही वो पल था जब मेरे लिए जैसे जानकारी का खजाना खुल गया था । होशियारपुर किन किन बातों के लिए मशहूर हुआ करता था , प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का कॉलेज और जिस गली से वे पैदल पढने जाया करते थे वो प्रोफ़ेसर गली , होशियारपुर और उसके आसपास से निकलने वाली सैंकडों नहरें , होशियारपुर ही वो शहर है जहां के प्रतिनिधि पंजाब प्रांत के अधिकांश महत्वपूर्ण मंत्री तथा अन्य पदों पर बैठे हैं , एक सौ बीस साल पुराना एक स्कूल और उसके पास स्थित उतना ही पुराना एक बरगद का पेड ,भगवान बाल्मीकि चौक , घंटाघर और जाने क्या क्या ..अजी जल्दी क्या है अभी तो यात्रा अपने पहले पडाव पर ही है ...अभी तो आपको मेरे साथ जाने क्या क्या देखना है और घूमना है.........


बुधवार, 20 अक्तूबर 2010

सरकार द्वारा लुटना ..आम आदमी द्वारा लुटने से बेहतर है ..पंजाब यात्रा का पहला सबक ...और एक नए ब्लॉग की शुरूआत



यूं तो मैं किसी नए सफ़र पर निकलने को हमेशा ही लालायित रहता हूं ..मगर चूंकि अलग अलग वजहों से पिछले एक डेढ माह में मैं पंजाब विशेषकर ...जालंधर , होशियारपुर....और अलावलपुर (वहीं समीप ही एक कस्बा ) जा चुका था इसलिए जब इस बार पुन: बच्चों और श्रीमती जी को वापस लाने का कार्यक्रम बना तो कुछ अरुचिकर सा लगा । कुछ घरेलू समस्याओं के कारण और सफ़र की थकान का सोचकर इस बार मन उत्साहित नहीं था ...मगर बीच में जब श्रीमती जी ने सूचना दी कि इस बार ..अमृतसर जाने और स्वर्ण मंदिर , जालियांवाला बाग तथा दुर्गयाना मंदिर देखने जाने का विचार बन रहा है ..या कहें कि तैयारी की जा चुकी है तो मन कई बातें सोच कर थोडा सा हुलसित जरूर हुआ । अमृतसर मैं शायद तब गया था जब सिर्फ़ सात वर्ष का था और इसके बावजूद मुझे जालियांवाला बाग के शहीदी कुआं की कुछ धुंधली याद तो थी ही मुझे ...अमृतसर वो पहला शहर होने जा रहा था जिसे पहले बचपन में और अब पुन: दोबारा देखने जाने का मौका मिलने वाला था मुझे । एक नया शहर ...और बहुत कुछ नया देखने जानने को मिलेगा ..यही सोच कर मन को संतोषित कर लिया ।

सफ़र में मेरा एक फ़ंडा है ..और वो ये कि ..अकेले सफ़र करना है तो न बस की परवाह न रेल यात्रा की ..कहने का मतलब ये कि ....मुझे कोई टेंशन नहीं होती ....चाहे जिस माध्यम से रास्तों को नाप लूं ..हां मगर कोशिश सिर्फ़ ये रहती है कि ...दिन और रात के सफ़र को अपने हिसाब से करूं । तो अब तय ये हुआ कि ..चूंकि सफ़र रात को करना था तो फ़िर शाम को चल कर पूरी रात बस में सोते जगते बिता कर सुबह तडके ही होशियापुर पहुंचा जाए । मैं शाम को तकरीबन आठ बजे निकल कर साढे आठ बजे तक ..दिल्ली के अंतर्राज्यीय बस अड्डे पर पहुंच गया । तो तय ये किया कि रात में दिल्ली बस अड्डे से चंडीगढ के लिए काफ़ी बसें चलती हैं जो वातानुकूलित भी होती हैं और बेहद आरामदायक भी ...और चंडीगढ से मैं होशियारपुर के लिए निकल सकता हूं ..मगर रास्ते में ऑटो वाले सत्यप्रकाश जी से बहुत सी दिलचस्प बातें हुईं ...। पहले दिल्ली की बदलती सडकों से लेकर राष्ट्रमंडल खेलों तक की बातें । सत्यप्रकाश जी ने मेरे द्वारा दिल्ली के विकास के सभी तर्कों को सिरे से खारिज करते हुए ये कहा कि ...साहब ये कोई ऐसा काम नहीं था जिसके लिए राष्ट्रमंडल खेलों का बहाना तलाशना जरूरी । मुझे इस बात की जानकारी थी कि कुछ निजि बसें लालकिले से भी निकलती हैं ..इसलिए मैंने पूछा कि क्या लाल किले से बस लेना ठीक होगा । सत्यप्रकाश जी ने कहा नहीं साहब , कहां उनके चक्करों में पडिएगा ..वे तो सब के सब ठग है दूना चौगुना किराया भी वसूलेंगे और कोई गारंटी भी नहीं । मैंनें कहा ....मगर लूटते तो ये सरकारी वाले भी हैं सत्यप्रकाश जी । ..सही कह रहे हैं साहब ..........मगर यहां लुटने से इतनी तसल्ली तो होगी न ..कि आपको सरकार ने खुद लूटा है ....न कि आप जैसे ही किसी व्यक्ति ने .......। मैं अवाक था उसके लाजवाब तर्क से ।

मगर चंडीगढ जाने वाली बस के लिए लगी टिकट की लाईन में अचानक ही अपने एक सहयात्री से पूछ बैठा कि बस चंडीगढ कब तक पहुंचा देगी ..उत्तर मिला ज्यादा से ज्यादा चार पांच घंटे ....ओह तो फ़िर तो मेरा सारा कैलकुलेशन ही गडबड हो जाएगा ..अब रात एक दो बजे तक चंडीगढ पहुंचने का मतलब है कि समय से पहले ही पहुंच जाना । इसलिए फ़ौरन उस लाईन छोड के निकलना पडा । थोडी बहुत भाग दौड के बाद पता चला कि एक बस सीधा होशियारपुर के लिए भी निकलने वाली है .....लगभग दस बजे के करीब । सुबह पांच बजे तक होशियारपुर पहुंचा देगी । बस बस ..यही सर्वथा उपयुक्त है ..ये सोच कर काउंटर से टिकट लेकर हम्लगे घूमने बस अड्डे पर ही चारों तरफ़ ।

अच्छी अच्छी किताबें हमेशा से ही मेरी कमज़ोरी रही हैं और यदि अकेले सफ़र करना हो फ़िर इससे बेहतर सहयात्री और कोई हो भी नहीं सकता । घूमते घामते बुक स्टॉल पर पहुंचा तो जिस किताब पर नज़र पडी ..वो थी फ़ाइव प्वाइंट समवन । नाम खूब सुन रख था थ्री इडियट्स भी कई बार देख रखी थी ..सो लपक लिया । किताब की प्रस्तावना और शुरूआत के कुछ पन्नों को पढ कर ही लग गया कि ये पुस्तक उस पिक्चर से भी ज्यादा आनंद देने वाली है ।हालांकि उस समय उससे ज्यादा पढ भी नहीं सका क्योंकि बस में रोशनी बंद कर दी गई थी ।मगर एक ख्याल मेरे मन में तभी आ गया था कि लौट कर अपने पास रखी एक हज़ार से अधिक पुसत्कों को पढ कर उन पर कुछ लिखने के लिए एक अलग ब्लॉग बनाऊंगा ..।


बस में मेरे साथ जो सहयात्री मिले वो थे मनदीप सिंह जो , होशियारपुर से भी आगे मुकेरियां जा रहे थे । मनदीप ने मुझे न सिर्फ़ पूरे रास्ते में पडने वालों शहरों के बारे में कुछ न कुछ बताया बल्कि अपने बारे में भी थोडा झिझकते हुए बताया । यहां से मेरे भीतर छुपी एक पत्रकार की आत्मा जाग चुकी थी जिसने आगे जाकर क्या क्या देखा और दिखाया ..अगली पोस्टों में जिक्र करूंगा ।

बस थोडी देर बाद ही दिल्ली हरियाणा की सीमा पर खडी थी जहां कतार में खडे सैकडों ट्रक दिखे । वे सब दिल्ली में प्रवेश के लिए प्रतीक्षारत थे । मैं उन्हें देख कर सोच रहा था ...आह ! इनकी जिंदगी ..चार पहियों पर दौडती । एक जगह से दूसरी जगह ..कभी दीवाली ...कभी होली ...तो कभी कोई और त्यौहार छूटते छोडते .....कैसी चलायमान सी होगी । सोचता हूं कि काश कोई ट्रक डाइवर भी ब्लॉग लिखता तो जाने कितनी ही बातें हम जान पाते उनके बारे में । बस वहां से निकलने के बाद रात तकरीबन दो बजे तक कुरुक्षेत्र बस अड्डे पर रुकी




कुरूक्षेत्र बस अड्डा अंधेरे में


रविवार, 17 अक्तूबर 2010

इस पिक्चर को हिट होने से कोई नहीं रोक सकता ..ट्रेलर ही सुपर हिट है जी ....देखिए न एक प्रिव्यू







पहले ही कहा था कि , इस बार ये सफ़र बहुत कमाल का रहने वाला है , पूरे छ: सौ बार कैमरा बोला "क्लिक " और जुडती गई एक नई कहानी ...हर तस्वीर के साथ ...। और बहुत ही अनोखा अनुभव रहा ..शहीदी कुआं , स्वर्ण मंदिर , होशियारपुर दशहरा मेला , एक सौ बीस साल पुराना स्कूल , प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह के कॉलेज और वहां पहुंचने वाली प्रोफ़ेसर गली , एक अनोखे हनुमान जी ....और जाने क्या क्या ...देखिए न फ़िर पूरी पिक्चर किस्तों में ..फ़िलहाल सिर्फ़ ..एक प्रिव्यू





एक अच्छा डायरेक्टर हमेशा ही सफ़र में अच्छी अच्छी पुस्तकें पढता रहता है ..

जब सफ़र की बात चली है तो देखिए , बस अड्डा , दिल्ली

लोकेशन (होशियारपुर ) पर पहुंच कर एक दृश्य ऊपर से


नए सैट पर पहुंच कर डायरेक्टर साहब , पोज़ देते हुए

होशियार पुर दशहरा मेले की कुछ झलकियां

वो बडे वाले जाएंट व्हील के ऊपर से कैमरे की हद चैक करते हुए ...फ़िल्माया गया एक सीन

अगले दिन , स्वर्ण मंदिर , अमृतसर , पिक्चर हिट होने की प्रार्थना के लिए ..

डायरेक्टर साहब , असिस्टेंट डायरेक्टर साहब के साथ

फ़ायनेंसर साहब (बुलबुल जी ) मत्था टेकते हुए

शहीदों की याद में , एक नमन

प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह का कॉलेज , जहां पढे भी , और पढाया भी


प्रधान मंत्री मनमोहन जी की कक्षाएं



होशियारपुर में घर घर जाते हनुमान जी ..

वापसी का सफ़र ...

और अंत में खुद डायरेक्टर साहब ......

मंगलवार, 12 अक्तूबर 2010

ब्लॉगिंग को किसी न तो किसी आचार संहिता की जरूरत है न ही किसी दंड संहिता की ......अभी हिंदी ब्लॉगिंग को जरा जवां तो होने दीजीए हुजूर .....तब तक लडकपन चलने दीजीए न ....



मुझे ब्लॉगरों का एक साथ बैठना ...चाहे फ़िर आप कोई मीट का नाम दे या साग भात का ..चाहे बैठकी हो ..या मिलन ..मगर जब आभासी दुनिया के लोग आपस में एक दूसरे के आमने सामने बैठ कर रूबरू होते हैं ...तो हरेक के न सिर्फ़ मन में बल्कि ....आत्मा के भीतर एक अनोखी ही चमक देखने को मिलती है ..मुझे यकीन है कि ..ऐसी हर उस ब्लॉगर ने महसूस किया होगा ..जो कभी न कभी इनका हिस्सा बना है ..। और वही क्यों ..जब उन बैठकों की रिपोर्टें ..उनकी तस्वीरें ..पोस्ट के माध्यम से अंतर्जाल पर आती हैं ..तो चाहे कोई लाख इस बात को झुठलाए ..और लाख तर्क कुतर्कों से इसकी मीनमेख निकाले ..मगर लोकप्रियता ही बता देती है कि ..ये खूब पसंद की जाती हैं । हाल ही में वर्धा में एक वृहत सम्मेलन का आयोजन किया था ..जहां तक मुझे याद है कि ..ये ऐसा दूसरा सम्मेलन था जिसमें ..आयोजन कर्ता की भूमिका में सरकार भी कहीं न कहीं जुडी थी .....जाहिर है कि इसकी रूपरेखा तैयार करने वाले और संचालन करने वाले मित्र तो इसके लिए बधाई के पात्र हैं ही ..क्योंकि यदि सरकारी राशि का कुछ प्रतिशत यदि ब्लॉगर हित में लगवाया जा सका है तो ये कोई कम बडी उपलब्धि नहीं कही जा सकती .....हां इसका प्रभाव और परिणाम कितना सकारात्मक निकला या निकलेगा ..अभी इस पर कुछ भी कहना तो जल्दबजी ही होगी....ऐसा ही एक सम्मेलन पिछले वर्ष ...इलाहाबाद में भी हुआ था । इस बार इसका विषय रखा गया था " ब्लॉगिंग में आचार संहिता की आवशयकता " ।

हालांकि इसमें बहुत बडी संख्या में कई वरिष्ठ साथी ब्लॉगर शरीक हुए थे , मगर अभी तक आई रिपोर्टों में विस्तार से जानने को नहीं मिल पाया है कि , सम्मेलन में इस विषय पर क्या क्या बहस हुई और किसने क्या क्या विचार व्यक्त किए ....और यदि कोई निष्कर्ष निकला तो वो क्या रहा । मगर इन सबके बीच ही ..अंतर्जाल पर लिख पढ रहे अन्य हिंदी ब्लॉगर साथी ऊपर लिखित विषय को बहस का आधार बना कर अपने विचार रखने लगे थे और शायद अभी तो आगे भी बहुत कुछ पढने लिखने को मिलेगा । वैसे ये विषय ऐसा है कि जिस पर मेरे विचार से हरेक ब्लॉगर को खुल कर राय जरूर व्यक्त करना चाहिए । आखिर यही छोटे छोटे प्रयास कल के लिए ब्लॉगिंग की दिशा तय करने वाले कदम साबित होंगे ।

इस मुद्दे पर सोचने बैठा तो सबसे पहले जो बात मेरे जेहन में आई ..वो ये कि आखिर ..आज ऐसी आवश्यकता ही क्यों पडी कि सिर्फ़ पांच सालों की यात्रा के बाद ही ब्लॉगिंग को , वो भी सिर्फ़ हिंदी ब्लॉगिंग को , क्योंकि मुझे ये ज्ञात नहीं है कि अन्य भाषाओं में किसी आचार संहिता की कोई जरूरत पडी है , या कोई है भी , जबकि संख्या में वे इतने आगे हैं कि अभी तुलना करना ही बेमानी होगा ..हां तर्क देने वाले ये तर्क जरूर देंगे कि ...हिंदी ब्लॉगिंग का भी निरंतर विस्तार हो रहा है और कल को ये संख्या निश्चित रूप से बहुत बडी संख्या होगी ..मगर क्या तब तक अन्य भाषी ब्लॉग्स रुके रहेंगे वे भी तो निरंतर बढ रहे हैं न । यहां एक कौतुहल मन में जाग उठा है कि ....तो फ़िर यदि उन्हें इन विषयों पर बात करने की जरूरत नहीं महसूस नहीं होती तो आखिर वे कौन सी बात करते हैं अपने ब्लॉगर बैठकों में ..ये तो वही बता सकते हैं जो कभी इनमें शामिल हुए हों । तो प्रश्न ये कि , आखिर इतनी जल्दी हिंदी ब्लॉगिंग को आचार संहिता की जरूरत क्यों महसूस होने लगी ...जवाब सीधे सीधे आए तो आएगा ..कोई जरूरत नहीं है..। मगर ठहरिए ..मामला उतना भी आसान नहीं है जितना दिखता है । मुझे स्मरण है कि जब २००७ में मैंने ब्लॉगजगत में पदार्पण किया था ..तो कम से चार या पांच एग्रीगेटर्स अपनी सेवाएं दे रहे थे ..। और बाद में ये जान पाया कि , उन सबके बंद होने के पीछे ..कहीं न कहीं , या कहूं कि लगभग पूरा का पूरा हाथ....जी हां आप ठीक समझे ..खुद हिंदी ब्लॉगर्स का ही था ।हाल ही में बंद हुई ब्लॉगवाणी के बंद होने से पहले की स्थितियों से कौन वाकिफ़ नहीं है ?? हालांकि इसका एक और कारण शायद ये भी रहा कि इन सभी संकलकों से जुडे लोग या तो खुद भी ब्लॉगर थे या फ़िर उनसे जुडे हुए अवश्य थे ...दूसरी और अहम बात ये कि ..मुफ़्त ही सेवाएं दे रहे थे ...। इसका परिणाम ये हुआ कि ..अपनी आदत के मुताबिक ..हिंदी ब्लॉगर ने इन संकलकों को भी ..देश की सडक समझ कर ....सुलभ शौचालय की भुगतान कर ..विसर्जन करने वाली सेवा करने से ..आसान पाया और खूब किया भी ..पसंद नापसंद ...हॉट ..आदि जैसे सेवाओं के उपयोग और दुरूपयोग से ..और ये नहीं कह रहा कि ..मैं भी और आप भी ..यानि हम सब ही इसमें परोक्ष प्रत्यक्ष रूप से शामिल थे ।

मगर इन सबके बावजूद ..ब्लॉगिंग में किसी तरह की कोई आचार संहिता का बनना ....और उससे भी बढकर पालन किया जाना ..फ़िलहाल तो बचकाना सा ही लगता है । इसके बहुत से वाजिब तर्क दिए जा सकते हैं ।उदाहरण के लिए , अभी हुए वर्धा सम्मेलन को ही लें .....सबसे पहले तो यही प्रश्न सामने आएगा कि ...क्या आज मौजूद हिंदी के हर चिट्ठाकार ने ऐसी कोई सहमति दी है ......कि इस सम्मेलन में उपस्थित विद्वान साथियों द्वारा जिस भी आचार संहिता का निर्माण किया जाएगा उसका वे भी पालन करेंगे ...हर चिट्ठाकार न सही ..एक बहुत बडी संख्या ही सही .....अरे सबको छोडिए ..चिट्ठाजगत में अधिकृत पंद्रह बीस हज़ार में से नियमित लिखने पढने वाले पांच सौ या एक हज़ार चिट्ठाकारों ने भी ....और दूसरी बात ये कि ....यदि वहां ऐसी किसी आचार संहिता का निर्माण हो भी जाता ..या कि ऐसे किसी सम्मेलन में कर भी दिया जाए ..तो उस सम्मेलन में ..उपस्थित हर ब्लॉगर क्या उस आचार संहिता को माने जाने का शपथ पत्र दाखिल कर लेगा अपने आप से .....नहीं कदापि नहीं ..मेरा अनुभव तो इस मामले में कुछ अलग ही रहा है ...मैंने तो साथी मित्रों को ..बिना किसी मुद्दे मकसद और एजेंडे के बुलाया था ....और कुछ दोस्तों को उसमें से भी कोई बू दिखाई दे गई .....खैर । हां यदि ऐसी कोई आचार संहिता .....भारतीय सरकार बनाती है ..कल को गूगल या वर्डप्रैस बनाते हैं ..तो उसे मानना हर ब्लॉगर की मजबूरी होगी और तभी इसका अनुपालन हो सकेगा ।


अब बची बात ये कि यदि आचार संहिता न बन पाती है , नहीं लागू हो पाती है तो फ़िर क्या आज की जो स्थिति है वो कल को और भी बदतर नहीं होगी न ..तो होने दीजीए न ....। मैं पहले से ही कहता रहा हूं कि ,ब्लॉगिंग का एक ही चरित्र है ..वो है उसका निरंकुश चरित्र .....बेबाक , बेखौफ़ ,...बेरोकटोक के ...और खालिस बिंदास ....। एक व्यक्ति अपने ब्लॉग पर रोज एक खूबसूरत चित्र लगाता है प्रकृति का ..उसे क्या लेना देना आपकी हमारी इस आचार संहिता से ...एक ब्लॉगर ....रोज अपनी डायरी का एक पन्ना चिपका देता है ब्लॉग पोस्ट बना कर .....तो उसकी निजि डायरी में आपकी आचार संहिता को वो क्यों घुसेड दे ....। इसको भी जाने दीजीए ..वो जो सिर्फ़ पाठक हैं....जो सिर्फ़ पठन रस लेने के ही ब्लॉग दर ब्लॉग घूमते हैं ..उनपर आप कौन सी आचार संहिता लागू करेंगे ?? और सबसे अहम बात कि ..आखिर वे हैं कौन ..जो ऐसी स्थिति के लिए जिम्मेदार हैं ..क्या कभी स्कॉटलैंड के किसी ब्लॉगर ने की ऐसी कोई टिप्पणी जिससे विवाद उठा ...तो ऑस्ट्रेलिया वाले किसी ब्लॉगर ने अपने चिट्ठे को चर्चा में जगह न मिल पाने की शिकायत की हो ...नहीं न ...और तो और ये बात भी सब भलीभांति जानते हैं कि ....अनाम , बेनाम , गुमनाम और नकली प्रोफ़ाईल धारी ब्लॉगर्स भी हमारे आपके बीच से ही है .....तो आप उन दिखने लिखने वाले ब्लॉगर्स पर तो आचार संहिता लागू कर सकते हैं ....मगर उनके भीतर बैठे ....उन अनाम सुनाम ब्लॉगर पर नहीं । फ़िर एक सबसे जरूरी बात ,,,,,आखिर कुछ सोच कर ही मोडरेशन वाला विकल्प , सार्वजनिक और निजि का विकल्प , अनाम को बाधित किए जाने का विकल्प ही सही मायने में ..आचार संहिता की नौबत तक न पहुंचने देने के हथियार तो हैं ही न ???

मुझे इस बात से कोई परहेज़ नहीं है कि इस मुद्दे को उठाया गया है ,लेकिन मेरी समझ से इससे बेहतर भी हैं कई उपाय जो किए जाएं तो ज्यादा सार्थक हो सकते हैं । चाहे एक मिनट के लिए आचार संहिता न भी बना पाएं , न लागू कर पाएं , मगर उन पर विचार तो किया ही जा सकता है , क्योंकि कल को जब ..मीडिया के दबाव में ( मुझे अब ये पूरी उम्मीद है कि यदि कल को हिंदी ब्लॉगर्स के प्रति भारत सरकार का नज़रिया और नीति , जो कि अभी है ही नहीं , बदलती है तो वो हिंदी मीडिया की पहल पर ही होगा । आज हिंदी ब्लॉगिंग उनके लिए ही सबसे बडी चुनौती के रूप में निकली है , तो उस समय सरकार के सामने उस संहिता के उपबंधों को रखा जाए । एक काम और हो सकता है , जिसके लिए किसी आचार संहिता दंड संहिता की जरूरत नहीं है । उन बातों को जो कि सकारात्मक हैं ..जो कि सही हैं ...उन्हें पर्याप्त समर्थन दिया जाए ..कम से कम उतना तो जरूर ही कि ..उसे किसी कदम पर लडखडाहट न ..और ऐसा ही तब हो जब कुछ गलत हो रहा हो ...मगर यहां कुछ लोगों को ये शिकायत रहती है कि..जब मेरे साथ फ़लाना हुआ तब तो कोई नहीं बोला ..जब ऐसा हुआ तब तो नहीं कहा किसी ने कुछ ..तो उन मित्रों से कहना चाहूंगा कि ऐसी स्थिति में ..सिर्फ़ दो बातें हो सकती हैं ...पहली ये कि या तो उनको सही पाकर लोग खुद बखुद उनके साथ जुडते चले जाएं ..या नहीं तो वे खुद ये प्रयास करें कि उनकी लडाई को उनके नज़रिए को ...उनके साथी ब्लॉगर्स भी उसी नज़रिए से देखें जिससे वे देख रहे हैं । अब यहां कुछ सवाल ऐसे उठ सकते हैं कि फ़िर तो इसके लिए आपका एक ग्रुप होना चाहिए ..या गुट बनाना चाहिए ....तो इसमें अस्वाभाविक कौन सी बात है ?? चलिए एक उदाहरण लेते हैं ..आज जितने भी पंजीकृत ब्लॉगर्स हैं ......उनमें से जो नियमित हैं सिर्फ़ वही एक दूसरे की पोस्ट को पढ लिख रहे हैं ..ये पांच सौ हों य छ: सौ ..तो बांकी बचे हुए हजारों अनियमित ब्लॉगर्स के लिए ..तो ये पांच छ: सौ वाला नियमित समूह ...एक ग्रुप ही बन गया न । और ये नहीं भूलना चाहिए कि परिवार में रहने वाले भाईयों में भी उन्हीं में पटती है जो एक जैसी विचारधारा वाले हों ...,,,,,और विपरीत विचारधारा वालों के सामने रहती पाई जाती है । नहीं नहीं होगा क्या ..क्या होगा आखिर ?? क्या ब्लॉग पर होने वाली बहस का परिणाम ...गुजरात के गोधरा से , १९८४ के सिक्ख दंगों से , जम्मू में रोज मारे जा रहे लोगों से अधिक भयंकर होगा ....नहीं न । तो फ़िर चलने दीजीए इसे निर्बाध और अनवरत ।

जनाब तभी तो कहता हूं कि ब्लॉग जगत को पहले ठीक से जवां तो होने दीजीए ..अभी तो इतना लडकपन है कि .

.किसी ब्लॉगर के साथ हुई दुरघटना को भी लोग सहनुभूति से नहीं शक की नज़र से देखते हैं ...क्यों है न ..पता नहीं कितना और क्या क्या लिख गया .....मगर माफ़ करिएगा हुजूर ...मैंने पहले ही कह रखा है ..कुछ भी कभी भी कहूंगा ,,,,सो कह दिया ...

शनिवार, 9 अक्तूबर 2010

दुर्गा पूजा ..वो रामलीला के दिन ..हल्के ठंड का मौसम ..लखनऊ, , पूना ,दानापुर , मधुबनी से दिल्ली तक ...झा जी ..औन नौस्टैलजिक राईड ..





वैसे तो बरसात के मौसम की विदाई के साथ ....धूप की चटकीली चमक जैसे जैसे बढती जाती है .....उन तमाम लोगों के मन पर शायद मेरी तरह एक उदासी की पर्त जमने लगती है .....जो कहीं न कहीं ..अपने परिवार ....अपनी जडों से दूर कहीं जडें जमाने की जद्दोज़हद में लगे हुए हैं ....और वो चरम पर तब पहुंच जाती है जब हम जैसा कोई ..टेलिविजन पर दुर्गा पूजा की कवरेज देख देख ....उस पल को कोस रहा होता है ...जिसमें उसे ऐसे महानगरों में आने को अभिशप्त होना पडा था । खैर अब तो ये दस में नौ न सही तो आठ की नियति तो बन ही चुकी है ..।

दुर्गा पूजा से जुडी यादों को टटोलने बैठा तो ..याद आया वो १९८० से १९८३ का जमाना ...वो लखनऊ की रामलीला ....उस समय भी शहरों खासकर ..बिहार बंगाल के अलावा ..में शायद दुर्गा पूजा से ज्यादा ..सक्रियता रामलीलाओं की ही होती थी .....। शायद वो चौथा दिन होता था ..जब रामलीला देखने जाने की शुरूआत हो जाती थी । घर के पास ही तोपखाना बाजार के साथ वाले खुले मैदान में रामलीला हुआ करती थी ...और ये वही समय था ..जबकि आम लोगों ने ...रामानंद सागर के राम जी को एक ही तीर से सैकडों राक्षसों को मारने का सीन नहीं देखा था ...इसलिए उस समय सारा मजा इसी में आना होता था और कहूं कि आता भी था । शाम को आठ नौ बजे तक खाना पीना निपटा कर चाचा के साथ हम दोनों भाई उनके दोनों तरफ़ से दोनों हाथ पकड के चल देते थे ....और फ़िर वापसी तो छोटे महाराज की चाचा जी के कंधे पर ही होती थी ....मगर क्या मजाल जो एक दिन भी छूटा हो वहां जाना । ये वही समय हुआ करता था ...जब नवरात्रि में स्वेटर और शॉल निकल जाया करते थी और खत्म होते होते तो बात रजाई कंबल तक भी पहुंच जाती थी । राम सीता, रावण और हनुमान जी के अलावा हमारे लिए वहां का आकर्षण हुआ करता था ...वो छोटी सी लोहे वाली ...पटाखे वाली पिस्तौल , रंगीन गुब्बारे ,,या कोई चूंचूं चींची करता खिलौना ..। ओह क्या दिन थे वे भी ।

इसके बाद मुझे थोडा बहुत याद है पूना की दुर्गा पूजा भी ..शायद कोई चतुरसिंही मेला लगता था वहां , ठीक ठीक तो याद नहीं है अब , मगर ये वो साल था जब इंदिरा गांधी की हत्या हुई थी यानि उन्नीस सौ चौरासी ...का साल । वहां न तो रामलीला थी न ही दुर्गा पूजा ..मगर नहीं नहीं शायद उस चतुरसिंही मेले में दुर्गा देवी की प्रतिमाएं होती थीं ...एक बहुत ही बडे मैदान में ..उन दिनों में भी बहुत बडा चकाचक मेला लगता था ..खूब बडे वाले झूले लगते थे ....देखिए न आज टटोलने बैठा तो ..बरसों पुरानी एक तस्वीर मिल गई ..। ये तस्वीर उसी मेले में ...वो फ़ोटोग्राफ़र होते थे न ..जो सामने बैठा कर ..खुद एक बडे से काले कपडे में अपनी मुंडी घुसेड कर फ़ोटो खींचते थे ....देखिए


बाएं से मेरा अनुज संजय , बीच में स्वर्गवासी दीदी अंजु और सबसे दाहिने मैं खुद ...


दुर्गा पूजा और उससे जुडी हुई यादें सबसे ज्यादा समेटी हमने पिताजी की पटना दानापुर की पोस्टिंग के दौरान ....वहां बिताए पांच छ; सालों में दुर्गा पूजा के सारे रंग देख डाले । ऐसा हालांकि कई कारणों से हुआ ..जिसमें से पहला था कि ..उन दिनों से ही या शायद उससे पहले से ही ..दुर्गा पूजा के दौरान ..स्कूल कॉलेजों यहां तक कि शायद बहुत से दफ़्तरों की भी छुट्टियां हो जाती थीं और फ़िर काम ही क्या बचता था । साल भर सहेजे गए ..बढिया बढिया कपडों को निकाल कर बाहर किया जाता और मजेदार बात ये होती थी कि गर्मी की विदाई और शीत ऋतु का आगमन हो रहा होता था इसलिए गर्मी सर्दी के कपडों का कंबीनेशन कमाल का फ़्यूजन बनाता था । और क्या घुमाई होती थी ..शाम को ही निकल जाया जाता था । बी आर सी मंदिर वाली मूर्ति और पंडाल , दानापुर बाजार वाली मूर्ति और पंडाल , तिरहुत कॉलोनी , एल आई सी कॉलोनी ....और जाने कहां कहां ..रोज कम से कम चार पांच जगह का कार्यक्रम बना रहता था । खाना पीना ..और पिक्चर देखना ( उन दिनों तो स्पेशल शो चलाए जाते थे वो रात बारह से तीन वाले भी , पता नहीं अब चलते हैं कि नहीं ) और फ़िर सप्तमी से तो घुमाई ..एकदम एक्स्ट्रीम लेवल पर होती थी ..पटना , कंकडबाग , राजा बजार , कदमकुंआ, दानापुर ..मजाल है जो कोई छूट जाए ...और यही वो समय होता था जब परिवार के परिवार ..इन पंडालों में एक समाज का रूप ले चुके होते थे ...। कहीं शिव जी की जटा से निकलता हुआ पानी आकर्षण बना हुआ रहता था ..तो कहीं रूई से बने हुए उंचे उंचे पहाड ..कहीं माचिस की तीली से मूर्ति बनी होती थो कहीं ....कहीं छोटे बल्बों की रोशनी से ..कहीं पर छोटे छोटे ..हनुमान जी की टोली ..आनंद का पर्याय बनी हुई रहती थी तो कहीं .....निरंतर घूमता हुआ सुदर्शन चक्र ....और इन सबके बीच ....चौधरी जी की दुकान के ..वो समोसे को तोड कर उसके साथ ..चटनी , और मसाले डाल कर बनाई गई चाट या फ़िर साधउ होटल के वो बडे वाले गुलाब जामुन । कुल मिला के ..वो दस दिन ...सच में ही शहर के लिए . और हर शहरवासी के लिए उत्सवमय हो जाते थे । मुझे याद है कि इन छुट्टियों के बाद जब स्कूल खुला करते थे तो ..सब बच्चों के पास दिखाने के लिए कई खिलौने और सुनाने के लिए बहुत सारे किस्से होते थे ।

इसके बाद अगले कुछ सालों तक गांव की दुर्गा पूजा देखने का समय आया । पहले दिन से ही जब वो लकडी के बडे से तख्ते पर कुछ बडी मजबूत से बेंत लगा कर मिट्टे के बडे लोए धर देता था ....इसके बाद उधर से आते जाते नज़र अनायास भी ..उन मूर्तियों पर पडती थीं .....और देखते जाते थे ..आज आठ भुजाएं बन रही हैं ...आज उनके शस्त्र , आज मस्तक बन रहा है ..आज कुछ अन्य देवताओं की मूर्तियां । फ़िर होता थी उन दिनों की शुरूआत जब गांव के हर घर को होता था इंतज़ार ...किसी का बेटा आ रहा है ..किसी का दामाद , किसी का भाई ....आ रहा है , किसी को दुख है कि उसकी बहू और पोते पोतियां नहीं आ रहे हैं इस बार ..तो किसी की बेटी ससुराल से इसलिए नहीं आ रही है क्योंकि उसकी सास की तबियत नहीं ठीक है और मां का मन कचोट रहा है । गांव के यूं तो हरेक घर में उन दिनों उत्सव का ही माहौल रहता था ...सभी घरों से निकलती धूप अगरबत्ती की खुशबू ,.,,,और घंटियों की आवाज ....शाम को सभी महिलाओं का गीत गाते हुए ....कुल देवता डीहबाड बाबा के मंदिर तक ..मिट्टी का ताजा ताजा बनाया हुआ दिया लेस कर आना .वो घर घर में लगातार कई कई घंटों तक ..दुर्गा सप्तशती का पाठ ..


.कुल मिला कर यदि कोई आंख बंद करके भी समझ सकता था कि ..दुर्गा पूजा चल रही है और इसके अलावा जिस एक बात में सभी युवा बहुत ही जोश से लगे होते थे वो थी ..आखिरी के चार पांच दिनों में होने वाले नाटकों का मंचन । ओह उन नाटकों पर तो अलग से ही किसी अन्य पोस्ट में लिखना बेहतर होगा ......। पूजा के दौरान ..चो चौकी पर लगी छोटी छोटी दुकानें ..किसी पर मीना बाजार सजा हुआ है तो किसी पर छल्ला फ़ेंको और ईनाम जीतो लगा हुआ है ...चाय पान की गुमटियां तो खैर ...युनिवर्सली और बाय डिफ़ॉल्ट लगी होती ही थीं । बाद के सालों में जब नाटकों से डायरेक्टली दायित्व वाली ड्यूटी से थोडे से फ़्री हुए तो ..दोस्तों के साथ ...पैदल ही घूमते हुए आसपास के कई गावों ..कोईलख , पट्टी टोल , सिंगियौउन , केथाही , रामपट्टी, भगवतीपुर , कोठिया ..आदि में जाकर वहां के कार्यक्रमों को देखते थे ।


यहां रहते हुए एक दशक से ज्यादा हो चुका है , मगर अब जहां रह रहा हूं वहीं पास में ही रामलीला मैदान है जहां रामलीला चल रही है और मेला भी ...सोचता हूं कि एक दिन हो ही आऊं ...मगर फ़िर भी वो दिन ..वो रामलीलाएं .. वो दुर्गा पूजा और सबसे बढकर ..उन दिनों पडने वाली ठंड को कहां तलाश करूं ?????

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