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सोमवार, 23 दिसंबर 2013

खाली करो सिंहासन कि जनता खुद जनार्दन बनी है





लो जी और ताव दिलाओ , आम आदमी को , वो सलमान खान का नयका वाला डायलॉग सुने हैं कि नहीं ,

"आम आदमी सोता हुआ शेर है , उसे उंगली मत करो , जाग गया तो चीड फ़ाड कर रख देगा "

और फ़िर जब शेर भी ऐसा कि पिछले साठ सालों से लगभग कोमा में जाकर सो गया था । जंगल में रोज़ आग लगती , रोज़ बुझाई जाती , मगर शेर था कि जागने को तैयार ही नहीं । पिछले दिनों अचानक ही नींद से झिंझोड के जगाया गया उसे , और फ़िर तो जैसे खुद पर लगे किसी खरोंच तक का बदला लेने पर उतारू हुआ ये शेर , आए दिन अपनी उनमत्त दहाड से अरण्य से लेकर प्राचीरों तक को थर्राने लगा ।

जंगल के पुराने भिडैतों ने सोचा अगर इतने दिनों से अफ़ीम पिला कर सुलाए जा रहे शेर को सीधे सीधे लडने और जीतने की चुनौती दे दी जाए तो मामला चित्त हो सकता है , शेर अभी अभी तो जागा है । जब तक अपने दांत पैने करने की सोचेगा तक तक तो उसे लंगडी मार के दोबारा गिरा के सुला देंगे । और फ़िर खासकर तब तो ये बिल्कुल ही आसान साबित होगा जब कि लडाई भिडैतों के तरीके वाली होगी । शेर को चैलेंज़ पे चैलेंज़ । शेर ठहरा शेर , फ़िर वो भी जगा हुआ शेर ।

वही हुआ जिसका अंदेशा तो था मगर अंदाज़ा नहीं था । कुछ जुनूनी और जोशीले लोगों ने न सिर्फ़ अपने दम पर समर क्षेत्र में कदम रखा बल्कि , ताल ठोंक ठोंक के सभी बडे पहलवानों को ही चुनौती दे दी , सही भी था जब बदलने का ही ठान के कदम रखा है तो फ़िर यहीं से क्यों न शुरू किया जाए। ये देश की प्रजातांत्रिक व्यवस्था की ताकत और लोगों की वैचारिक भिन्नता का ही प्रमाण है कि , जनादेश कुछ ऐसा निकल कर आया कि सबको फ़िर मौका मिल गया , शेर की मूंछे मरोड कर उसकी पूंछ बना देने का ।

स्थितियां सबके सामने थीं और नीयत भी सबको पता होने के बावजूद फ़िर से सारा ठीकरा आम आदमी के सिर पर ही फ़ोडने में कोई कोर कसर नहीं रखी जा रही थी । हर तरफ़ उन्हें ही निशाने पे लिया जा रहा था और कमाल की बात है कि एक जिसे पचास साल तक राज़ करने का मौका मिला और दूसरी वो जिन्हें पहले और आगामी आम सभी चुनावों में भी देश में मौजूदा एक बेहतर विकल्प होने के कारण शायद दोबारा भी मौका मिलने की पूरी संभावना होने के बावजूद भी , अपेक्षित रूप से बिना कोई बडप्पन दिखाए , सभी राजनीतिक दांव पेंच और चौसर के पासे आम आदमी के सामने फ़ेंके जा रहे थे ।

एक समय ऐसा भी आया जब यही लग रहा था कि छोडो क्यों ली जाए ऐसी जिम्मेदारी , जिसे कंधा देने वाले उसे मैय्यत को कंधा देने टाईप की भावना से कंधा देने की धमकी दे रहे हैं , मगर जब कदम आगे बढा ही दिया तो फ़िर करो सिंहासन खाली , बैठ कर भी दिखा ही देते हैं । लो जी करो अब खाली सिंहासन कि जनता खुद जनार्दन बनी है और हां रही बात वायदों और करारों की तो सिर्फ़ दो बातें याद दिलाते चलें , अबे तुम होते कौन हो बिना अभी कुछ किए ही फ़ेल मार्क्स वाली मार्कशीट जारी करने वाले जबकि तुम्हारे वादों की असलियत को कई बार पर्दे फ़ाड कर टपक टपक कर गिरती है समाज के चेहरे पे तेज़ाब की बूंदों की तरह । और हां होने को क्या नहीं हो सकता , अगर आम आदमी ने ठान लिया कि सभी ये जो "खास" वाली केंचुली पहन के बुलेट और बैलेट प्रूफ़ हुए घूमते हो न ससुरी इस केंचुली को ही कुतर कुतर के चीथडा कर दिया जाए ।

इस देश में जब तक एक भी भूखा इंसान , भूख , गरीबी , बेकसी , बीमारी से टूट कर जूझ कर मर रहा है तब तक कोई भी कैसे खास बना रह सकता है । बिजली पानी , स्कूल अदालत , एक भी , कहा तो ऐसी एक भी समस्या नहीं है जिसे जड से खत्म न किया जा सके बेशक मगर बहुत अधिक कमज़ोर जरूर किया जा सकता है । फ़िलहाल तो सभी समर्थनकारी चित्कार मार मार कर अपना असली तेवर और रंग रूप दिखा रहे हैं , दिखाइए दिखाइए कि लोग अब सचमुच देख सुन रहे हैं ..............

शुक्रवार, 13 सितंबर 2013

"मत्युदंड या उम्रकैद" आप क्या चाहते हैं





आज दिल्ली बलात्कार कांड पर आरोपियों की सज़ा का निर्णय आ सकता है । मौजूदा कानूनों के अनुसार चारों को ही " मृत्युदंड या आजीवन कारावास" में से कोई एक सज़ा सुनाई जाएगी । मैं आप सबसे सिर्फ़ एक सज़ा चुनने को कहूंगा और ये भी कि सिर्फ़ यही सज़ा क्यूं । शाम को , इन्हें सुनाई गई सज़ा और उसका प्रभाव और जो सज़ा इन्हें नहीं दी गई , दोनों पर एक कानूनी पोस्ट लिखूंगा , मैं यहां आप सबकी राय भी लेना चाहता हूं ............आप देंगे न ।


शुक्रवार, 30 अगस्त 2013

कैमरामैन लुट्टन के साथ चंपू जी ,चिंचपोकली "प्याज तक"




टीवी न्यूज़ एंकर चंपू जी : "ये है दरभंगा का वो सुलभ शौचालय जहां पर बताया जाता है कि एक बार यासिन भटकल ने छी छी किया था , आइए पूछते हैं दरबान जी से कुछ खास इस बारे में

दरबान जी बताइए , क्या आपको लगा था कि उस दिन भटकल ने कुछ खास किया था आपके शौचालय में ?

दरबान जी " हां सर , भटकल ने कुछ तो ऐसा किया था उस दिन कि हमारा पूरा सीवर ही अटकल हो गया था उस दिन के बाद

तो देखा आपने किस तरह से हमने एक्सक्लुसिवली आपको बताया कि भटकल ने सुलभ शौचालय में भी अपना दरभंगा मौडयूल छोडा था ।

कैमरामैन लुट्टन जी के साथ मैं ,चंपू जी , सुलभ शौचालय , दरभंगा ,"प्याज तक "

ब्रेक के बाद फ़िर जारी हैं पत्रकार चंपू जी नई रपट के साथ  
न्यूज़ चैनल के पत्रकार चंपू जी : भटकल के अब्बा लटकल से : क्या आपको लगता है कि आपका बेटा बेगुनाह है ?

टीवी दर्शक : चंपू जी , क्या आपको लगता है कि इससे भी बडा बेवकूफ़ी का सवाल कोई और रिपोर्टर पूछ सकता है , या आपने सबसे बडा पूछ लिया ?

चंपू जी : नहीं नहीं , अभी तो इंडिया टीवी वाला रिपोर्टर का भी पूछना बांकी है :)

स्टूडियो से मैं  झिंगुर चौधरी इसी के साथ आपको बताता चलूं कि आज के लिए यही विषय होगा हमारी "हडबडी बहस"  के लिए , तो देखना न भूलें आपके अपने चैनल ,

कल से लेकर आज तक , एक ही चैनल "प्याज तक "


सोमवार, 26 अगस्त 2013

कुछ भी , कभी भी .........




आज देश की सर्वोच्च विधायी संस्था , संसद में ,मांग उठाई गई कि देश के एक स्वनाम धन्य संत आसाराम बापू पर लगे बलात्कार जैसे संगीन अपराध वो भी उनकी ही एक नाबालिग अनुयायी के साथ , के मामले पर सरकार सिर्फ़ इस वजह से गंभीर नहीं है क्योंकि उनके साथ " धर्म " और उनके अंधानुयायियों का भारी दबाव काम कर रहा है जो शायद पुलिस प्रशासन और सरकार को सीधे सीधे उस कानूनी कार्रवाई को करने से रोक रहा है जो उन्हें करना चाहिए । ये स्थिति अपने आप में ही सारी बातों को स्पष्ट करने के लिए काफ़ी है ।



इसी के समानांतर , महानगर मुंबई में एक फ़ोटो पत्रकार का बलात्कार , जिसके पांच आरोपियों को पुलिस जीतोड कोशिश के बाद देश के अलग अलग कोने से गिरफ़्तार करने में सफ़ल हो जाने की खबरें भी आम लोगों को मिलती हैं । अब आम आदमी के सामने ये प्रश्न खडा हो जाता है कि आखिर धर्म की ढाल क्या इतनी मज़बूत हो गई है आज कि पुलिस और प्रशासन तक इतने पंगु दिखाई दे रहे हैं कि संसद जैसी राष्ट्रीय संस्था को अपने सभी जरूरी काम काज को छोडकर इस मुद्दे की ओर ध्यान खींचना पडा । जो भी हो आज प्राथमिकी दर्ज़ कराए इतना समय तो हो ही गया है कि कम से कम पुलिस उस स्थिति में खुद को ला पाती कि या तो आरोपी को गिरेबां से धर के अदालत की चौखट तक खींच लाती या फ़िर सीधे सीधे ये साबित कर पाती कि आरोप उस हद तक मिथ्या या संदेहास्पद हैं कि अन्य कानूनी विकल्पों का सहारा लिया जाए । इस पूरे मामले में आगे कब क्या होगा कैसे होगा और क्या परिणाम निकलेगा ये तो भविष्य की बात है किंतु इतना तो तय है कि आज कानून और इसके निगेहबान , लाख दलीलों तर्कों से आम आदमी को ये भरोसा नहीं दिला सकते कि कानून सभी के लिए समान है ।





अब बात करते हैं दूसरे घटनाक्रम की , जो इत्तेफ़ाक से धर्म के इर्द गिर्द ही घूमता फ़िरता प्रतीत होता है बेशक उसके आगे पीछे कोई राजनीतिक , या कैसी भी कोई और सोच हो । उत्तर प्रदेश में संतों द्वारा  परंपरागत रूप से की जाने और बरसों से चली आ रही चौरासी कोस परिक्रमा किए जाने की घोषणा की जाती है । इस परिक्रमा से जुडे मिथक और सत्य का सारा सच तो  संत समाज ही बेहतर जान समझ सकता है लेकिन कुल मिलाकर इसे आम अवाम के सामने इस तरह प्रस्तुत किया जाता है मानो ये इस समय किया जाने वाला सबसे पहला और आखिरी जरूरी धार्मिक कृत्य था जिसका अभी और सिर्फ़ अभी पूरा होना ही नितांत आवश्यक था ।


उत्तर प्रदेश की राज्य सरकार जो पहले से ही  मुस्लिक तुष्टिकरण के आरोपों तले किसी तरह से अपना कार्यकाल एक एक दिन आगे बढा रही थी और जिस पर ताज़ा ताज़ा एक अन्य घटना के कारण भी भारी दबाव था अपेक्षित प्रतिक्रिया दिखाते हुए , इस यात्रा को सुरक्षा मुहैय्या कराके फ़ौरन पूरी करा देकर किसी अनावश्यक और अप्रिय स्थिति को टालने के विकल्प के मौजूद होने के बावजूद भी , न सिर्फ़ इस पर सिरे से प्रतिबंध लगाने का मन बना लिया बल्कि इसे करते हुए ऐसा प्रदर्शित किया मानो प्रदेश पर चीन या पाकिस्तान के हमले को विफ़ल करने जैसा काम कर लिया हो । ये आग अभी तो सुलगी है और जब तक सब कुछ ठंडा होगा तब तक ये दावानल क्या कितना खाक करेगा ये वक्त ही बताएगा ।
"यहां एक सवाल जो मन में कौंध उठा अचानक कि क्या अच्छा होता यदि ऐसी कोई परिक्रमा यात्रा , अभी हाल ही में टूट कर बिखर चुके राज्य उत्तराखंड के प्रभावित गांव कस्बों की ओर कूच करके पूरी की जाती । जाने वाले लोग अपने साथ वहां जिंदगी को दोबारा पटरी पर लौटाने के लिए जूझते अपने जैसे ही कुछ इंसानों की मदद के लिए जो भी संभव होता वो ले जाते , श्रम करते , सहायता करते । क्या उससे मिला सुकून इस परिक्रमा से मिले सुकून से कम होता ? क्या किसी राज्य सरकार , किसी केंद्र सरकार , किसी कानून , किसी धर्म में इतनी हिम्मत थी कि मानवीयता /इंसानियत को बचाने बसाने के लिए की जाने वाली इस परिक्रमा को टेढी नज़र से भी देख पाती ?"

गुरुवार, 27 जून 2013

लानत भेजिए , और शाबाशी दीजीए ...........



पिछले दस दिनों से लगातार नज़रें , और कान सिर्फ़ उत्तराखंड त्रासदी की दर्द नाक खबरें , ही टटोल रही हैं , किसी अन्य बात की तरह ध्यान ही नहीं जा रहा है , चाह कर भी । घर पर , आसपास और भी बहुत सारी गतिविधियां चल रही हैं , क्रिकेट मैच से सीरीयल तक सबकुछ देखा जा रहा है । मगर मैं बार बार घर पर आए सारे समाचार पत्रों को उलटता पुलटता हूं , मौका मिलते ही खबरिया चैनलों पर बार बार दिखाए जा रहे लगभग एक जैसे समाचार और खबरों को ही बार बार और जाने कितनी ही बार देखता हूं । इस बीच फ़ेसबुक ब्लॉगस और अन्य सभी प्लेटफ़ार्मों पर भी पहुंचता हूं , वहां भी यही सब कुछ । ऐसा शायद इसलिए हो रहा है क्योंकि , अपने गृह प्रदेश बिहार में 1987 , में आई प्रलयकारी बाढ और अगले ही साल यानि 1988 , में आए विनाशकारी भूकंप के दर्द को बिल्कुल करीब से महसूस किया था मैंने । जाने कितने ही आंगन कफ़न के थान के थान लील कर सफ़ेद हो गए थे उस बार भी । और यकीन जानिए ये दर्द सिर्फ़ और सिर्फ़ जिसने झेला , जिस पर बीती सिर्फ़ वही जानता है अन्य कोई नहीं , कोई नहीं । 

जो बात अब तक मैं समझ पाया हूं वो ये कि उत्तराखंड की इस आपदा के बाद हज़ारों घर और हज़ारों आखें हमेशा के लिए खुली रहने वाली हैं उन अपनों के इंतज़ार में , जिनका पता कभी नहीं चलेगा , सरकारी आंकडों में तो नहीं ही , न ही अन्य किसी माध्यम में ....कभी नहीं और ये दर्द अब उनके जीवन के लिए सबसे बडा नासूर बन जाएगा । इन सबके बीच मुझे कुछ ऐसा भी महसूस हुआ कि जिन पर लानत भेजी जानी चाहिए और कुछ ऐसा भी जिन्हें शाबासी और दुआ दी जानी चाहिए ............

लानत भेजिने इन्हें

केंद्र और राज्य सरकार को , दोनों ही सरकारें , जबकि इत्तेफ़ाकन दोनों स्थानों पर एक ही दल की सरकार है , तब भी , या शायद तभी , दोनों ही सरकारें इस आपदा के बाद इतनी असंवेदनशील और अकर्मठ निकलीं कि जहां केंद्र सरकार ने राहत और मदद भेजने के लिए आठ दिनों का लंबा समय सिर्फ़ इसलिए लिया क्योंकि उनके महासचिव और उनके अनुसार देश के तथाकथित भावी युवराज विदेश यात्रा से लौट कर उस राहत दल को हरी झंडी दिखाने वाले थे । रही बात राज्य सरकार तो जो सरकार आपदा के एक सप्ताह बाद भी मृत व्यक्तियों की संख्या पांच सौ मात्र बताने में ही लगी भिडी हुई थी , उस सरकार ने कहीं कहीं पीडितों को 2700/- रुपए मात्र की भारी भरकम राहत राशि दे कर अपनी पीठ ठोंक ली । राज्य सरकार के इंतज़ाम का आलम यही था कि अब तक देखे सुने पढे सभी समाचार सूत्रों में एक भी , गिनती के एक भी पीडित , घायल , फ़ंसे , वापस आए , किसी एक ने भी राज्य सरकार व प्रशासन की मदद तो दूर उपस्थिति के बारे में भी कुछ ज़िक्र किया होता तो बात थी , इसलिए इन्हें भरपूर लानत भेजी जानी चाहिए । 

राजनेता व राजनीतिक दल :- इस देश में इन्हें तो सतत लानत भेजा जाना चाहिए , क्योंकि इनका स्वार्थ और घटिया नीति हमेशा ही ऐसी आपदाओं में खुल कर सामने आ जाती है । सांसदों का आपसी झगडा हो या , फ़िर मदद राहत के नाम पर एक दूसरे पर की जाने वाली छींटाकशी ,या फ़िर हवाई दौरों से जमीनी दर्द का आकलन विश्लेषण करने का इतना बरसों पुराना रवैया , हर घटना , हर व्यवहार इनका ऐसा ही होता आया है कि इन पर जितनी लानत भेजी जाए कम है । और लोग बाग गुस्से में अब भेज भी रहे हैं , बानगी देखिए।


 धन कुबेर :- आपने हमने अक्सर ये देखा है कि विश्व में जब धन कुबेरों की सूची छपती है तो उसमें ये जरूर ज़िक्र होता है कि फ़लाना ढिमकाना जी ने अरबों खरबों की संपत्ति बना कर विश्व के धन्ना सेठों  में नाम लिखा लिया है , इतना ही नहीं हमारे खिलाडी , अभिनेता , और बहुत सारे अधिकारी तक के पास अरबों खरबों के वारे न्यारे होने की खबरें मिलती हैं । हाल का ही उदाहरण देखिए न , अभी हाल ही में क्रिकेट चैंपियनशिप जीतने वाली टीम के खिलाडियों को करोडों रुपए की राशि बतौर इनाम दी गई है , लेकिन हाय रे इन धन कुबेरों का दिल । न ही किसी ने दो बोल बोले न ही किसी ने मदद का कोई हाथ बढाया , इन्हें तो लानत भेजी ही जानी चाहिए । 

मीडिया :- देश का मीडिया विशेषकर इलेक्ट्रॉनिक अभी बहुत अपरिपक्व है , जबकि आज चौबीसों घंटों प्रसारित होने वाले समाचार चैनलों की संख्या सैकडों के भी पार है । आज सबके पास अथाह धन , श्रम व संसाधन होने के बावजूद सबका रवैय्या , खो खो खेल रहे बच्चों की तरह दिखाई देता है , खासकर ऐसे संवेदनशील समय में तो ये और ज्यादा बचकाना व्यवहार करने लगते हैं । इसमें कोई संदेह नहीं कि अब मीडिया सिर्फ़ स्टूडियोज़ में बैठ कर वातानुकूलित रिपोर्टिंग करने से आगे जाकर ऑन द स्पॉट जीवंत रिपोर्टिंग की तरफ़ बढ चले हैं मगर , पहले मैं पहले मैं की बचकानी होड , इन्हें अब भी हास्यास्पद बना दे रही थी । एक विशेष बात और ये तमाम मीडिया कर्मी , पत्रकार , कैमरामैन और समाचार चैनल ऐसी घटनाओं , आपदाओं और खबरों की रिपोर्टिंग के लिए अपने निजि हेलीकॉप्टरों का इस्तेमाल क्यों नहीं करते , क्यों नहीं खरीदते , वायुसेना और अन्य राहत हेलीकाप्टरों पर सवार होकर जाना आना ऐसे समय में उचित नहीं लगता है , थोडी लानत इनके हिस्से भी । 

आपदा प्रबंधन :- इस पूरी व्यवस्था पर लाखों करोडों रुपए का खर्च प्रति वर्ष दिखाया जाता है जबकि असलियत में जब जब इनकी जरूरत महसूस हुई है ये हमेशा ही एकदम फ़ेलियर साबित होते आए हैं । आपदा के लिए दूरगामी नीतियां और योजनाएं तो दूर , आपदा में फ़ंसे हुए लोगों को सुरक्षित निकालना , हेलीकॉप्टर , सेटेलाइट फ़ोन , राहत सामग्रियां , आदि तमाम मूलभूल वस्तुएं भी इनके पास नहीं होती जरूरत के समय और तो और ले देकर जो सहायता फ़ोन नंबर उपलब्ध कराए जाते हैं उनकी वास्तविकता भी किसी से छुपी नहीं है इनकी भी लानत मलामत की जानी चाहिए । 

अब उनकी बात जिन्हें शाबाशी दी जानी चाहिए :



हमारी सेना :- भारतीय सेना , जिसने इतिहास से लेकर वर्तमान तक और युद्दकाल से लेकर शांति काल में आई ऐसी आपदाओं तक में अपने हौसले, अपनी हिम्मत , अपनी ताकत और अदम्य इच्छा शक्ति के दम पर रुख ही बदल कर रख दिया है , इस बार भी जो काम किया है वो पूरी इंसानियत के माथे पर ताज़ धरने जैसा है । इससे ज्यादा और क्या हो सकता है कि बेहद खराब मौसम में अपने जान की बाज़ी लगाकर फ़ंसे हुए लोगों को निकालने का ऐसा जुनून कि वो खुद को मौत के मुंह में लेकर चले गए , ऐसी सेना , ऐसे जवानों को कोटि कोटि नमन और सतत नमन । 

हेलीकॉप्टर : सोचता हूं कि जब इस देश में वैज्ञानिक ये संदेश देते हैं कि हम चांद पर पहुंचने वाले हैं , नाभिकीय शक्ति में हम विश्व के गिने चुने देशों में से एक हैं तो फ़िर ऐसे में , सेना के साथ कदम से कदम मिला कर मानव और इंसानियत को बचाने में अपना सवर्स्व लुटा देने वाले इन हेलीकॉप्टरों की संख्या सिर्फ़ इतनी ही क्यों ??????? क्यों नहीं इनका एक इतना बडा बेडा तैयार किया जाता जो ऐसे विपदाकारी समय में सबसे अचूक साधन बन कर उभरता आया है । बाढ , भू स्खलन ,  दुर्घटानाओं और इन जैसी अन्य सब आपदा-विपदाओं में हेलीकॉप्टरों का योगदान सबसे ज्यादा अचूक और अतुलनीय होता है । इसलिए ये भी शाबासी के योग्य है , नि:संदेह हैं । 

मीडिया : जी हां , मीडिया , बेशक मैंने ऊपर कहा कि उसके कुछ अपरिपक्व और बचकाने से कदम उसकी स्थिति को हास्यास्पद बना देते हैं किंतु , इस आपदा में भी जिस तरह से मीडिया ने पीडितों , वहां फ़ंसे हुए लोगों , सरकार प्रशासन की उदासीनता , सैनिकों की जांबाजी और कई अनकही अनछुई दास्तानों की पल पल की खबरों को पूरे देश और विश्व तक पहुंचाया वो काबिले तारीफ़ है । कई बार हमने पत्रकारों को रोते , सिसकते और रुंधते हुए देखा । मीडिया के इस जज़्बे को भी सलाम  और शाबासी । 


सोमवार, 24 जून 2013

दो टूक ......




देश और दुनिया ने पूरे वैश्विक भूगोल में बढती हुई प्राकृतिक आपदाओं में से एक और आपदा झेली , उत्तराखंड में इस प्राकृतिक आपदा को बीते एक सप्ताह हो चुके हैं मगर उसका दंश अब भी लोग झेल रहे हैं । इस आपदा से जुडी तमाम खबरों , बहसों के बीच कुछ बातें तो बिल्कुल तो टूक समझने वाली हैं

*प्राकृतिक आपदाएं इस पृथ्वी पर नियमित रूप से आती रही हैं , इनका सटीक अनुमान लगाने में अब तक इंसान और विज्ञान पूरी तरह से विफ़ल रहा है । इतना ही नहीं प्रकृति के पांच प्रमुख तत्वों से बना हुआ इंसान कितना ही शक्तिशाली और प्रबल विज्ञानी हो जाए मगर सच यही है कि प्रकृति के किसी एक तत्व अकेले मात्र जैसे , हवा , पानी , मिट्टी ,आदि से ही नहीं जीत सकता तो यदि सर्वतत्व विध्वंसक रूख अख्तियार कर लें तो महाविनाश या महाप्रलय कोई आश्चर्य की बात नहीं रहेगी ।


*भारत और भारत जैसे देशों के राजनीतिज्ञ आज संवेदनहीनता के उस बिंदु को छू रहे हैं जहां से वे मिट्टी में दबे कुचले लोगों और पानी में डूबते टूटते इंसानों का दर्द महसूस करने के लिए हवाई दौरों पर लाखों रुपए खर्च हुआ दिखा भर सकते हैं , इससे ज्यादा यदि उम्मीद की जा सकती है , तो वो है सेना और सेना के जवान ।

*देश का समाज आज इतनी तेज़ी से अंधा होकर उपभोक्तावाद और विलासी जीवन शैली की तरफ़ बढ रहा है कि , बार बार प्रकृति द्वारा वो खुद और उसके अपनों को भी ऐसी चेतावनियां देने के बावजूद भी कहीं कुछ भी गंभीर सोचता करता नहीं दिखाई दे रहा है । आज की नस्लें , मिट्टी, पेड, पानी , पौधे , पक्षी सबके प्रति उपेक्षित और संवेदनहीन व्यवहार रख रही हैं ।


* प्राचीन काल से ही प्रकृति का एक शाश्वत नियम चलता चला आ रहा है , जो लड के बचेगा वही जिंदा रहेगा और इतिहास और खुद प्रकृति भी इस बात का गवाह रही है कि सृष्टि से सृजन से लेकर अब तक जाने कितनी ही बार उसने इस जीवन चक्र को खत्म होते , दोबारा जन्म लेते , पनपते , पकते और फ़िर खत्म होते देखा है और निरंतर देखती चली आ रही है । इसलिए यदि इंसान खुद पहाड पत्थर , पेड , नदी , समुद्रों के साथ दु:साहस करेगा तो प्रकृति भी अपना प्राकृतिक व्यवहार करके पारस्परिकता और संतुलन बनाएगी ही ।

* विकसित और पश्चिमी सभ्यता ने इतिहास से एक सबक बहुत अच्छी तरह से सीखा है और वो है जितना हो सके प्राणि मात्र के जीवन की रक्षा करना । इसके विपरीत अभी दुनिया के बहुत सारे देशों , जिनमें एक भारत भी है , का शासन और प्रशासन अभी इतना परिपक्व ही नहीं हुआ है कि आपदाओं के लिए की जाने वाली तैयारियां तो दूर उनसे जूझने और निपटने की सोच भी विकसित नहीं कर पाया है । भारत जैसे सवा अरब की जनसंख्या बाहुल्य देश में , आपदा नियंत्रण का पहला नियम - प्राणिमात्र के जीवन की रक्षा ,का नियम और तैयारी ऐसी होनी चाहिए कि लोगों को हज़ारों की संख्या में एकसाथ बचाया जा सके ,वो भी आठ दस दिन का लंबा समय लेकर नहीं , तुरंत से भी तुरंत ।  यदि सेना अपने दम , अपनी हिम्मत , अपने जज़्बे और उपलब्ध संसाधनों से जानों को लगातार बचाती आ रही है तो फ़िर " आपदा नियंत्रण " की पूरी कमान भारतीय सेना को सौंप दी जानी चाहिए , और साधन और संसाधन जुटाने की शक्ति भी । 



*सच तो ये है कि , प्राकृतिक आपदाओं की रफ़्तार , अब तेज़ होने लगी है , विश्व भर से लगातार ऐसी दुर्घटनाओं के समाचार मिल रहे हैं । उससे बडा सच ये है कि इन सबके बावजूद इंसान निरा मूरख , अब भी लगातार , बहुत बार तो बेवजह भी , प्रकृति को ललकारता , छेडता और उपेक्षित कर रहा है । सबसे बडा सच ये है कि इस धरती पर सभ्यताओं के सृजन और विनाश की सैकडों दास्तानें लिखी हुई है सदियों से , सिर्फ़ समय , प्रकृति और ये धरती ही इन सबकी गवाह रही हैं जब उसने इंसान से कई गुना बडे और ज्यादा शक्तिशाली जीवों को विलुप्त कर दिया तो फ़िर .............................



*पहाड , नदियां , पेड , मिट्टी, हवा , धूप , बारिश , ये मानव सभ्यता के वो बुजुर्ग हैं जिनके कोमल स्वरूप के कारण ही आज इंसानी सभ्यता इस स्थिति में पहुंच चुकी है कि वो खुद ही सारे भस्मासुरी प्रयोग करके अपने जीवदायी कारकों को नष्ट कर देने पर तुली है तो प्रतिकार में इन बुजुर्गों के क्रोध की प्रतिक्रिया ऐसी ही होती आई है इसलिए इंसान को अब भी इनकी इज़्ज़त करनी सीख लेनी चाहिए ।

रविवार, 5 मई 2013

कसाब को फ़ांसी का बदला : सरबजीत का कत्ल



उस दिन सुबह सुबह जब मुझे सफ़र के दौरान पाबला जी का मैसेज मिला शायद सुबह आठ सवा आठ का कोई वक्त रहा होगा , मैं ट्रेन की खिडकी पर बैठा बैठा चौंक पडा था और मेरे हावभाव देख कर सहयात्री भी । मेरे मुंह से निकला ओतेरे कि ! कसाब को टांग दिया " । सहयात्री हैरान मेरा मुंह देखने लगे । पूरी खबर जानने के लिए मोबाइल में भास्कर डॉट कॉम देखना शुरू किया , सिलसिलेवार खबर मिल गई , और निरंतर मिलती गई । सहयात्रियों में बातचीत शुरू हो चुकी थी , और मेरे मुंह से बेसाख्ता निकला ," कसाब को टांग दिया गया , ठीक हुआ , लेकिन अब शायद सरबजीत की रिहाई नहीं होगी कभी " । साथ बैठे सहयात्री ने कहा , " हां असर तो पडेगा " मैंने कहा नहीं , यही होगा , मुझे आभास हो रहा है।


फ़िर कसाब के बाद अफ़ज़ल की बारी आई । इस बीच दिमाग से सरबजीत का मुद्दा निकल चुका था कि अचानक ही फ़िर से समाचार चैनलों में सरबजीत का नाम चमकने लगा , वजह भी पता लग गई और अपने आभास पर यकीन भी हो चला । मुझे लगा कि ये आभास मुझे अकेले को ही नहीं हो रहा था शायद , खैर ।
सरबजीत पर हमले की आशंका के बाद उसका गहन चिकित्सा कक्ष में रखे जाने की खबर मुतमइन सा कर गई , क्योंकि अस्पतालों में आईसीयू की रेपुटेसन अब कैसी है किसी से छुपी नहीं है इसलिए सच या झूठ कहा ये भी गया कि मौत तो पहले ही हो चुकी थी , लेकिन पहले न सही बाद में तो वो निश्चित कर ही गई । लेकिन शरीर के घर पहुंचने पर पता चला कि जीवन रक्षक कुछ अंगों को पहले ही निकाल लिया गया है , अब बेशक पाकिस्तान से बयान आ सकता है कि वे अंग तो सरबजीत के शरीर में कभी थे ही नहीं ।


मौत के साथ सरबजीत की जिंदगी खत्म हो गई , मगर इस देश में तो सियासत फ़ौजियों के कफ़न और ताबूत तक में हो चुकी है तो फ़िर ये तो मौत भर थी । सियासत और सरकार ने गरीब देश के गरीब खजाने से , जो कि हमेशा घाटे में ही चलता है , करोडों लाखों की पोटली , उस गमगीन परिवार के माथे पर रख दी । बिना ये सोचे कि सरबजीत के जैसे सैकडों कैदी अभी भी पडोस के जेल के किसी साथी की दो चार ईंटों से सर फ़ुटवाने की राह देख रहा है , बिना ये सोचे कि पोटली , किसी शहीद फ़ौजी के परिवार के माथे पर रखी पोटली से ज्यादा कम भारी तो नहीं हो गई , लेकिन जितनी बडी सियासत , उतनी बडी पोटली ।


इधर जाने कहां से इस हत्या के बाद सरबजीत की मौत को शहादत न मानने और उसे कतई भी शहीद तो नहीं ही , माने जाने का वैचारिक द्वंद भी शुरू हो गया । सरबजीत के रूप में एक भारतीय का कत्ल वो भी चिर दुशमनों के हाथों , अब चाहे लाख क्रिकेट  और म्युज़िक के पुल बनाकर इन्हें दोस्ती के फ़ट्टे पर बिठाइए पर असल में उस फ़ट्टे के नीचे दो तलवारें आपस में तनी ही मिलेंगी , जैसा दिल से सोचने वाले इसे उसकी शहादत ही मान रहे हैं जबकि इसे दूसरे नज़रिए से देखने दिखाने वाले ..सीधे सीधे सरबजीत को आतंकी कहने से जरा बच ही रहे हैं । यूं असल में देखा जाए तो सरबजीत की हत्या और मौत पर बोलने का हक सिर्फ़ और सिर्फ़ उसके परिवार को ही है । इसके फ़ौरन बाद भारत में भी एक पाकिस्तानी कैदी के साथ मारपीट करने की खबर भी आ ही गई , यानि अभी ये सिलसिला एकदम से थम नहीं जाएगा ।


अब बात कानून की , पडोसी देश की जो अदालत , पाकिस्तानी हुक्मरान तक को दुम दबा कर भागने पर मजबूर कर दे रही हो , उसे आखिर ये तथाकथित मंजीत और सरबजीत वाली थ्योरी दिखी या दिखाई क्यों नहीं दी , समझने की कोशिश हो रही है । वैश्विक कानून और अंतरराष्ट्रीय विधि , विषयों और देशों के आचरण और उनकी शक्ति के अनुसार ही लागू होती है , ये पिछले दिनों इटली के आरोपी सैनिकों वाले मामले और अब सरबजीत के मामले में स्पष्ट दिख ही रहा है । जो भी प्राकृतिक कानून भी यही कहता है कि न्याय सिर्फ़ होना नहीं चाहिए बल्कि न्याय होते हुए महसूस भी होना चाहिए

शनिवार, 13 अप्रैल 2013

बेटा डोइचेवैले ! पटना, दिल्ली , नखलऊ होते तो .........ढिच्क्याउं , ढुम ढुम ढुम



पहिले तो हम आपको ई डोइचे वेले से परिचय कराते चलें , नहीं नहीं जी बिल्कुल नहीं , आजकल जिस तरह से इस डोइचेवेले को लेकर पकेले से थकेले टाइप का घमासान छिडा हुआ है उससे आपको इहे फ़ील हो रहा होगा कि जरूर ई कोई वेल्ले टाईप का कुछ होगा । मगर जो भी कहिए , ई टॉपिक से वेल्ले से ढिल्ले तक सब हल्ले गुल्ले में व्यस्त हो गए हैं ई क्या कम है । खैर तो हम आपका इंटोडक्शन डोइचेवैले से करवा रहे थे ।
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डोइचेवेले से मेरा परिचय रेडियो डोइचेवेले हिंदी सेवा के एक श्रोता के रूप में लगभग बीस साल पुराना है , समझिए कि हमारे उन दिनों के साथी भजार हैं जब रेडियो को गलबहियां डालते हुए समाचार से लेकर कमेंट्री तक सब उन्हीं के मुंह जबानी सुनते थे और न सिर्फ़ सुनते थे बल्कि घनघोर रूप से चिट्ठियाते भी रहते थे । बाद में जब सारी विश्व प्रसारण सेवाओं की हिंदी सेवा का शटर डाउन हुआ तो इनका भी हो गया लेकिन यहां भी हमने इन्हें धर लिया । 
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अब अचानक देखने पढने और सुनने को मिला कि इनके कोई बॉब जी हैं जिन्होंने अलग अलग कटेगरियों में बहुत सारे ब्लॉग्स की सूची में ऊंची वोटिंग वाले को ईनाम शिनाम देने की घोषणा कर डाली है । जियोह्ह्ह! रे करेजा फ़ाड हिम्मत दिखाइस हो जी । पुरस्कार की घोषणा ऊ भी बोटिंग और घुडसवारी करा करा के । हां हां समझ गिए बेट्टा ! तुमको हिंदी ब्लॉगिंगि की रवायत की जानकारी न थी न न त ई कवायद न करने पाते । चलो बॉब भईया जब ठान ही लिए हो , यानि कि जब ओखलिया में सर डाल ही दिए हो तो मसूलवा से क्या डरना जी । 
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ई बात पे एकठो घटना/दुर्घटना हमें भी याद हो आई , अरे नहीं जी पुरस्कार बनाम तिरस्कार वाया बहिष्कार का फ़ार्मूल्ला तो जमाने से हिट आउर फ़िट है अपने ब्लॉगजगत में । फ़िर मुहब्बत की रीत देखिए इहां कि चाहे किसी का ढेर तिरस्कार हो /अपमान हो /जूतम पैजार हो , ..पूरा बिलागजगत ..एकदम पिरधान मंत्री हो जाता है 


" तुम्हारे लाख सवालों से मेरी खामोशी अच्छी,
अबे जो सुननी पडे कविता तुम्हारी ,हमारी बेहोशी अच्छी :) "


लेकिन मजाल है कोइयो का कि कोई हिंदी ब्लॉगिंग , हिंदी ब्लॉग या हिंदी ब्लॉगर के सम्मान की बात सोचे ,बिलागजगत ..बिलबिला के आगजगत में फ़ौरन ही तब्दील हो जाता है । अरे घटनवा तो भुला ही गया बताना । अईसे ही एक बार एक ठो होडम होड में सब बताने लगे कि उन्हें अलेक्सा ने फ़लानी ढिमकानी रैंकिंग दी है , हमें पहले तो यही पता नहीं चला कि ई रैकिंग से प्रमोशन या इंक्रीमेंट टाइप का कुछ मिलने वाला है क्या , मगर ई सोच कर पहुंचे कि काहे नहीं मिस अलेक्सा को अपने ब्लॉग का नाम भी जबरिया इंटोडूस करा दिया जावे । मगर धत्त तेरे कि , ई तो कौनो कंपूटर गणित निकला जी , हमसे सीधा गणित का सवाल हल नहीं होता तो कंपूटर गणित की कौन कहे । खैर !


तो भईये डोइचेवेले बॉब जी , आपने जो भी रायता फ़ैलाया है उसकी फ़ैल से ब्लॉगजगत में पहले ही बहुत सी रेलमपेल फ़ैल चुकी है । घनघोर पोस्टें , और उससे भी घनघोर इंटरभू , विद क्रिया एंड प्रतिक्रिया भी आनी चालू हो गई हैं , और ताज़ा ताज़ा जानकारी मिलने तक बोले तो लेटेस्ट अपडेट मिलने तक नौबत मानहानि तक भी जा पहुंची है तो हमारा आपसे सिर्फ़ इत्ता सा कहना है कि भईये सोचो कि जर्मनी के बॉन्न के बॉब हो तब त तुम्हरा इत्ता भकमोच्चड छोडा दिया है भाई लोग अगर पटना , दिल्ली आ नखलऊ के होते नू बाबा .........त बस ढिच्क्याउं ..ढुम ढुम ढुम ढुम ...ढिच्क्याउं ..ढुम ढुम ढुम ढुम :) । 

अब सीरीयस नोट पर कुछ बातें , ये छिछालेद्दर और ढिंच्चक ढपाक ढिंच्चक ढपाक तो पहले भी खूब हुआ है और आगे भी होता रहेगा , अब जबकि मामला देसी आंगन से निकल कर अंतरराष्ट्रीय फ़लक पर पहुंच चुका है तो बेशक आपको लगता हो कि ये बॉब का जॉब , बिल्कुल फ़ितूर और फ़िज़ूल है , बेशक आपको लगता हो कि जब वे हमें धेले भर का नहीं मानते जिन्हें इस सूची में स्थान मिला है तो हमहीं इस अवसर पर क्यों चूकें , बेशक अभी ही तमाम बडी बडी समाचार एजेसियां और पोर्टल आपसे इसी समय और इसी मसले पर आपका इंटरभू छापें और आप उसमें खुल कर अपने उदगार व्यक्त करें , आप बेशक आलोचना -प्रतिआलोचना करें , हानि और मानहानि भी करें , मगर ये हर हाल में याद रखें कि इसमें कहीं से भी हिंदी का नुकसान और अपमान नहीं होना चाहिए , विशेषकर अंतरराष्ट्रीय फ़लक पर । इसलिए चाहे गुस्से में फ़ूल कर कुप्प बैठें , चाहे तिलमिला कर चुप्प बैठें इस समय और इस अवसर को छीछालेदर के मौके के रूप में कतई न भुनावें ।

आप न चाहें न वोट करें , लाख गलतियां नोट करें ,
मगर ध्यान सिर्फ़ ये रहे , हिंदी पर न कोई चोट करें ॥


बहुत दिनों बाद इस ब्लॉग पर पोस्ट की वापसी हुई है , यूं होगी सोचा न था ..चलिए अब तो मिलते रहेंगे और कहते सुनते रहेंगे ...कुछ भी , कभी भी ।




साथ चलने वाले

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