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बुधवार, 29 जनवरी 2014

"असहयोग द्वारा समर्थन" देने का गजब फ़ार्मूला





दिल्ली में रहते हुए अब ये सोचता हूं कि आखिर वो क्या वजह है कि "खबरों के संसार" के अधिकांश "देश" दिल्ली के गलियारों जैसे लगने लगते हैं ।और फ़िर इन दिनों तो यहां झाडू फ़िराई का कार्य प्रगति पर है । पॉलिटिकल स्ट्रैटजीज़ राजनीतिक मान्यताएं बगावत पर उतारू हैं , कहीं न कहीं लोग बाग खुद ही अब अपनी पूछों में आग लगाने को आतुर हो उठे हैं , उकताहट तो यकीनन ही हो गई है इस व्यवस्था से ।

दिलचस्प बात ये है कि आगामी लोकसभा चुनावों की अहमियत के दबाव के चलते कुल मिला कर कोई चीख चीख कर कुछ न कुछ कहना चाह रहा है । झुंझलाहट इतनी तीव्र है कि मुकाबले में दंगों के दर्द को उतारा जा रहा है जाने दीजीए साहेब वक्त से जुदा खुद अपनी नस्ल द्वारा सुनाई जाने वाली सबसे भयानक और पाश्विक सज़ा है जिस पर बीती हो वही जानता है ।

सबसे जुदा बात ये है कि इस शहर की राजनीतिक आबो हवा क्या बदली है मानिए जैसे सियासी ज़लज़ला सा चल रहा है देश में । जिस दिन से नई सोच नए विकल्प ने राजनीति में दखल दिया जाने कितने ही चक्रव्यूह लगातार रचे जा रहे हैं । हर कोई अपने मोर्चे खोल के बैठा है  ।

वे बडे पुख्ताई तरीके से बताते हैं कि कुछ नहीं जी सब हमारा चांस ससपिशियस करने केल इए मिल कर किया जा रहा है अगले दूसरे ही पल नई कैग जांच बिठा देने की घोषणा कर डालते हैं , फ़ंडा सिर्फ़ एक है "जो भी अपनी कमाई से ज्यादा की औकात में दिखे मिले , उसकी जांच तो बनती ही है बॉस। और बात इनती ज्यादा तीखी है कि पुलिस, प्रशासन , आयोग तक इन्हें बगावती अराजक आरोपी और दोषी साबित किए दे रहे हैं ,सभी ने जैसे "असहयोग द्वारा समर्थन" देने का गजब फ़ार्मूला ईज़ाद किया है ।


कोई करोडों बकाए का नोटिस थमा रहा है तो कोई तीस दिन के सरकार से पांच दस साल का रिपोर्ट कार्ड दिखा कर उसे मुर्गा बनाने पर उद्धत है । महामहिम का दफ़्तर चंद फ़ाइलें निपटान में इतनी देर किए रहा कि उसका फ़ायदा सीधे सीधे फ़ांसी पाए दुर्दांत अपराधियों को हुआ मगर महामहिम ने "अराजकता की चपत" आम आदमी के गाल पे जड दी ,वो भी मुस्कुराते हुए :) :) और इस रस्साकशी के बीच अच्छी बात ये है कि लोग अब अपने राजनीतिक विकल्प के प्रति ज्यादा संज़ीदा दिखाई दे रहे हैं । भारतीय राजनीति करवट ले रही है उम्मीद की जानी चाहिए कि उस करवट हसीन सपने सिर्फ़ पैदा नहीं होंगे वे , बढेंगे और बनेंगे भी ..................

3 टिप्‍पणियां:

  1. हम क्या जाने, राजनीति की घातें और प्रतिघातें

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    1. हां हम क्या जानें रमेश बाबू , एक चुटकी सिंदूर की कीमत

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मैंने तो जो कहना था कह दिया...और अब बारी आपकी है..जो भी लगे..बिलकुल स्पष्ट कहिये ..मैं आपको भी पढ़ना चाहता हूँ......और अपने लिखे को जानने के लिए आपकी प्रतिक्रियाओं से बेहतर और क्या हो सकता है भला

साथ चलने वाले

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